चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० चरकसंहिता [ अ० १
रंग का उत्पन्न हो जाना, बल वर्ण और इन्द्रियों मे हीनता का आ जाना, ये
आयु के क्षय के लक्षण हैं ॥ ११-१२ ॥
यच्चान्यदपि किंचिद्वर्णवैकृतमभूतपूर्वं सहसोत्पद्येतानिमित्तमेव हीय-
मानस्याऽऽतुरस्य शश्वत्, तच्चारिष्टम् । इति वर्णाधिकारः ॥ १३ ॥
इनके अतिरिक्त और जो कोई वैकृतिक वर्ण, जो पहिले कभी भी नहीं था
ऐसा बिना कारण के सहसा उत्पन्न हो जाये, इसको निश्चय रूप से मृत्यु का
लक्षण समझना चाहिये ॥ १३ ॥
यह वर्णाधिकार समाप्त हुआ ।
स्वराधिकारस्तु—हंस-क्रौञ्च-नेमि दुन्दुभि-कलविङ्क-काक-कपोत-झर्झ-
रानुकाराः प्रकृतिस्वरा भवन्ति, यांश्चापरानुपपेक्षमाणोऽपि विद्यादनूक-
तोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः ॥ १४ ॥
स्वराधिकार—मनुष्यों का जो स्वर हंस, क्रौञ्च, नेमि, दुन्दुभि, कलविङ्क-
आदि के स्वर और कौवा, कबूतर इनके स्वर के समान हो, उसको प्राकृतिक
स्वर समझना चाहिये । इनके अतिरिक्त इन स्वरों के समान जो प्रकृति स्वर यहां
पर नहीं कहे गये और देखने में आवें या सादृश्य से या जिनको तत्त्वज्ञानी
लोग बतलावें उनको भी जाने ॥ १४ ॥
एडक-कल-ग्रस्ताव्यक्त-गद्गद-क्षाम दीनानुकीर्णास्त्वातुराणां स्वरा
वैकारिका भवन्ति । यांश्चापरानुपपेक्षमाणोऽपि विद्यात्प्राग्विकृतानभूत्वो-
त्पन्नान् । इति प्रकृतिविकृतिस्वरा व्याख्याताः ॥ १५ ॥
वैकृतिक स्वर—रोगी का स्वर एडक (मेडा) के समान, भे भे की सी
आवाज़ हो, अस्पष्ट, गद्गद (भरा हुआ), क्षाम (निर्बल), दीन (दुःख से
बोला जाने वाला), कल (सूक्ष्म), ग्रस्त (निगली सी आवाज, मुख से शब्द
न निकले), रोगियों के इस प्रकार के शब्द विकृति के होते हैं। इसी प्रकार जो
स्वर प्राकृतिक स्वर से विपरीत अथवा नये प्रकार के देखने में आवें जो पहिले
कभी न उत्पन्न हुए हों, उनको भी वैकृतिक स्वर समझे । इस प्रकार से प्राकृतिक
और वैकृतिक स्वरो का वर्णन कर दिया ॥ १५ ॥
तत्र प्रकृतिवैकारिकाणां स्वराणामाश्वभिनिर्वृत्तिः स्वरानेकत्वमेकस्य
चानेकत्वमप्रशस्तम् । इति स्वराधिकारः ॥ १६ ॥
जो स्वर प्रकृति और वैकृतिक स्वरो का शीघ्र उत्पन्न होना अथवा एक
स्वर का कभी एडक की भांति और कभी दीन या क्षाम हो जाना, यह अमगळ
सूचक है । यह स्वराधिकार समाप्त हुआ ॥ १६ ॥