चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 617, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी ऊंचाई ४, चौड़ाई ६ और लम्बाई चौदह अंगुल हो। टांगें (घुटने से
नीचे टखने तक का भाग) लम्बाई में अठारह अंगुल, घेर में १६ अंगुल, घुटने
लम्बाई में ४ अंगुल और घेर में १६ अंगुल, जांघें घेर में ३० अंगुल, लम्बाई
में १८ अंगुल, वृषण ६ अंगुल लम्बे और गोलाई में आठ अंगुल,
शिश्न (लिंग) छ अंगुल लम्बा और गोलाई में पांच अंगुल (सुश्रुत में चार
अंगुल), भग (स्त्रीगुह्यांग) १२ अंगुल, कटी १६ अंगुल चौड़ी, बस्ति का
शिर (मेढू की जड़ से नाभि प्रदेश तक पेडू) १० अंगुल लम्बा, नाभि से
ऊपर और छाती से नीचे लम्बाई में पेट १२ अंगुल लम्बा और १० अंगुल
चौड़ा, पार्श्व (दोनो पार्श्व) १० अंगुल चौड़े और १२ अंगुल लम्बे, स्तनों
के बीच का अन्तर १२ अंगुल चौड़ा, स्तनप्रान्त दो अंगुल छाती १२ अंगुल
ऊंची, २४ अंगुल चौड़ी, (सुश्रुत में १८ अंगुल चौड़ी छाती कही है, यह स्त्री
की समझनी चाहिये), हृदय दो अंगुल, स्कन्ध ८ अंगुल, भुजःसंधि (अंस)
६ अंगुल, प्रबाहू (कंधे से नीचे कोहनी तक का भाग) १६ अंगुल, प्रपाणि
(कलाई से कोहनी तक का भाग, प्रकोण्ठ) १५ अंगुल, हाथ १० अंगुल,
(उसमें भी मध्यम अंगुलि ५ अंगुल, प्रदेशिनी और अनामिका ४।। अंगुल,
कनिष्ठा और अंगुष्ठ ३।। अंगुल), दोनो कक्षा ८ अंगुल, त्रिक १२ अंगुल
ऊंचा, पीठ १८ अंगुल ऊंची, ग्रीवा ४ अंगुल ऊंची और घेरा २४ अंगुल,
मुख (मस्तक से ठोड़ी तक) १२ अंगुल और २४ अंगुल घेर वाला, खुला मुख
५ अंगुल, चिबुक, (दाढ़ी) कान, ओष्ठ, आंखों के बीच का मध्य भाग,
नासिका और ललाट ये प्रत्येक चार अंगुल, शिर १६ अंगुल लम्बा, ऊंचा और
३२ अंगुल घेर वाला होता है। इस प्रकार से पृथक् पृथक् अंगों का माप कह
दिया है। सम्पूर्ण शरीर पांव से आरम्भ करके शिर तक सारा ८४ अंगुल होता
है (सुश्रुत में एक सो बीस अंगुल लम्बाई कही है। यह परिमाण पांव की
अग्र-अस्थि से लेकर हाथों को ऊंचे उठाये हुए पुरुष का समझना चाहिये।)
प्रमाण तीन प्रकार का है, सम, हीन और अधिक। इनमें जो शरीर
लम्बाई और विस्तार में उपरोक्त कहे हुए प्रमाण के समान हो वह 'समप्रमाण'
समझना चाहिये। इस प्रकार के समप्रमाण वाले शरीर में आयु, बल, ओज,
सुख, ऐश्वर्य्य, धन और अन्य शुभ भाव रहते हैं। इस समपरिमाण से हीन
वा अधिक में ये गुण (आयु आदि) नहीं रहते ॥ ११७ ॥
सात्म्यतश्चेति—सात्म्यं नाम यद्यत्सातत्येनोपयुज्यमानमुपशेते ।
तत्र ये घृत-क्षीर-तैल-मांस-रस-सात्म्यास्सर्व-रस-सात्म्याश्च, ते बलवन्तः