चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 555, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] विमानस्थानम १३७
हेतु है । इसलिये समान-वात-पित्त-कफ प्रकृति के भी मनुष्य होते हैं । परन्तु
वातप्रकृति, पित्तप्रकृति, और कफप्रकृति के मनुष्य नहीं होते हैं । उस उस
दोष की अधिकता से मनुष्यों की २-वह दोष-प्रकृति कही जाती है । विकृत
(विषम ) हुए दोषों को 'प्रकृति' नहीं कहा जा सकता, ( क्योंकि दोषों की
समान अवस्था का नाम 'प्रकृति' है ) । इसलिये वातप्रकृति आदि प्रकृतियाँ
नहीं हैं । हां, वातल, पित्तल, और श्लेष्मल ( वात-बहुल, पित्त-बहुल, श्लेष्म-
बहुल ) मनुष्य हैं । इन को 'अप्रकृतिस्थ' (प्रकृति में न रहने वाले ) समझना
चाहिये, ये 'विकृतिस्थ' हैं ॥ ११ ॥
तेषां तु खलु चतुर्विधानां पुरुषाणां चत्वार्यनुप्रणिधानानि श्रेयस्क-
राणि । तत्र समसर्वधातूनां सर्वाकारसमं अधिकदोषाणां तु त्रयाणां
यथास्वं दोषाधिक्यमभिसमीक्ष्य दोषप्रतिकूलयोगीनित्रीण्यनुप्रणिधा-
नानि श्रेयस्कराणि भवन्ति यावदग्नेः समीभावात्, समेतु सममेव
कार्यम्, एवं चेष्टा भेषजप्रयोगांश्चापरे, तान् विस्तरेणानुव्याख्या-
स्यामः ॥ १२ ॥
इन चार प्रकार के ( सम प्रकृति, वात, पित्त, कफ एवं तीक्ष्ण, मन्द, विषम
और समाग्नि ) प्रकृति वाले पुरुषों को आगे कहे जाने वाले चार प्रकार के
अन्न-पान का सेवन करना हितकारी होता है । इन में सम सर्वधातु ( दोषों )
वाले पुरुषों को सब प्रकार का सेवन समान रूप में करना श्रेयस्कर है । शेष
अधिक दोषों वाले वातल, पित्तल, श्लेष्मल तीनों को उन २ के दोषों की अधि-
कता को देखकर दोष के प्रतिकूल वस्तुओं का तब तक सेवन करना चाहिये
जब तक अग्नि समान अवस्था में न आये । समान अवस्था में आने पर बन्द
कर सब का समान रूप में सेवन करना चाहिये । इसी प्रकार धातुओं को समान
करनेवाले अन्यान्य भेषज प्रयोग भी अभीष्ट हैं। उन का विस्तार से वर्णन करेंगे ॥
त्रयस्तु पुरुषा भवन्त्यातुराः, ते त्वनातुरास्तन्त्रान्तरीयाणां भिषजाम् ।
तद्यथा—वातलः पित्तलः श्लेष्मलश्चेति । तेषां विशेषविज्ञानं—वात-
लस्य वातनिमित्ताः, पित्तलस्य पित्तनिमित्ताः, श्लेष्मलस्य श्लेष्मनिमित्ता
व्याधयः प्रायेण बलवन्तश्च भवन्ति ॥ १३॥
वातल, पित्तल और श्लेष्मल ये तीन प्रकार के रोगी होते हैं । अन्य तन्त्र-
कर्त्ताओं के मत से ये रोगी नहीं हैं । यथा—वातल, पित्तल और श्लेष्मल ।
इन के मत में ये भी प्रकृतियां हैं । इस प्रकार से सात प्रकृतियां हैं । इन में
यह बात विशेषकर जानने योग्य है कि वातप्रकृति को वायुजन्य, पित्तल को पित्त-
जन्य और श्लेष्मल को कफजन्य रोग प्रायः और बलवान् रूप में होते हैं ॥१३॥