चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] सूत्रस्थानम् ३१
कडुवी ) ये दस वस्तुएँ कफपित्त जन्य व्याधि में अथवा आमाशय में आश्रित
व्याधि की अवस्था में, शरीर को हानि किये बिना वैद्य वमन के लिये देवे ।
इनमें मदन, मधुक, जीमूत, कृतवेधन, कुटज, इक्ष्वाकु और धामार्गव
इनका फल लेना चाहिये और पिप्पली इलायची का भी फल तथा नीम की छाल
लेनी चाहिये ॥ ७-८ ॥
विरेचन द्रव्य—
त्रिवृतां त्रिफलां दन्तीं नलिनीं सप्तलां वचाम् ।
कम्पिल्लकं गवाक्षीं च क्षीरिणीमुदकीर्यकाम् ॥ ९ ॥
पीलून्द्यारग्वधं द्राक्षां द्रवन्तीं निचुलानि च ।
पक्वाशयगते दोषे विरेकार्थं प्रयोजयेत् ॥ १० ॥
त्रिवृत ( निशोथ ) त्रिफला ( हरड, बहेड़ा, आंवला ), दन्ती ( जमाल-
गोटा ), नीलिनी ( नील का मूल ), सप्तला ( शिकाकाई ), वच, कम्पिल्लक
( कमीला ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), क्षीरिणी ( दूधी ) उदकीर्य्या ( नाटा
करञ्ज ), पीलू फल, आरग्वध ( अमलतास ), द्रवन्ती ( बड़ा जमाल गोटा ),
निचुल ( हिज्जल फल ), ये वस्तुएं दोष के पक्वाशय में स्थित होने पर विरेचन
के लिये देनी चाहिये ( शरीर में अन्यत्र स्थित होने पर नहीं ) ।
इन में त्रिवृत, नागदन्ती, सप्तला गवाक्षी, क्षीरिणी, और द्रवन्ती का मूल
लेना चाहिये, और नलिनी, तथा वच का भी मूल और शेषों का फल ग्रहण
करना चाहिये ॥ ९-१० ॥
आस्थापन और अनुवासन के द्रव्य—
पाटलां चाग्निमन्थं च बिल्वं श्योनाकमेव च ।
काश्मर्यं शालपर्णीं च पृश्निपर्णीं निदिग्धिकाम् ॥ ११ ॥
बलां श्वदंष्ट्रां बृहतीमेरण्डं सपुनर्नवम् ।
यवान् कुलत्थान् कोलानि गुडूचीं मदनानि च ॥ १२ ॥
पलाशं कत्तृणं चैव स्नेहांश्च लवणानि च ।
उदावर्ते विबन्धेषु युञ्ज्यादास्थापने सदा ।
अत एवौषधगणात्संकल्प्यमनुवासनम् ।
मारुतघ्नमिति प्रोक्तः संग्रहः पाञ्चकर्मिकः ॥ १३ ॥
पाटला ( पाढल ), अग्निमन्य ( अरणी ), बिल्व ( बेल ), श्योनाक ( टेंटू,
सोनापाठा ), काश्मरी ( गम्भारी ), शालपर्णी ( सलवन ), पृश्निपर्णी ( पोठा-
पर्णी ), निदिग्धिका ( कटेरी, भटकटैया ), बला ( खरैंटी ), श्वदंष्ट्रा ( गोखरू)