चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 466, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें५४८ चरकसंहिता [ अ० ५
कुष्ठ सात धातुओं में अपना प्रभाव प्रकट करता हुआ सम्पूर्ण शरीर को
पीड़ित करता है ॥ ३॥
न च किंचिदस्ति कुष्ठमेकदोषप्रकोपनिमित्तं, अस्ति तु खलु समान-
प्रकृतीनामपि समानां कुष्ठानां दोषांशांश-विकल्प-स्थान-विभागेन वेदना-
वर्ण-संस्थान-प्रभाव-नाम-चिकित्सित-विशेषः ॥ ४ ॥
कोई भी कुष्ठ एक दोष के प्रकोप से उत्पन्न नहीं होता । सातों प्रकार
के कुष्ठों में प्रकृति के समान होने पर दोष, अंश, बल, विकल्प तथा
स्थान भेद से, वेदना, १ रंग, स्थिति, प्रभाव एवं नाम से चिकित्सा में भेद
आजाता है ॥ ४ ॥
स सप्तविधोऽष्टादशविधोऽपरिसंख्येयविधो वा भवति । दोषा
हि विकल्पैर्विकल्प्यमाना विकल्पयन्ति विकारान्, अन्यत्रासाध्यभा-
वात्; तेषां विकल्प-विकार-संख्यानेऽतिप्रसंगमभिसमीक्ष्य सप्तविधमेव
कुष्ठविशेषमुपदेक्ष्यामः ॥ ५ ॥
इस प्रकार से कुष्ठ सात प्रकार का, अठारह प्रकार का अथवा असंख्य
प्रकार का हो जाता है ।
कुष्ठ के सात भेद—दोष अनेक प्रकार की विकल्पनाओं के कारण
भिन्न होते हुए नाना प्रकार से नाना रोग उत्पन्न कर देते हैं । अर्थात्
व्याधि, करण और दोष इनके भेद से कार्यरूप व्याधि के भी बहुत से भेद
हो जाते हैं । इसलिये दोषभेद से उत्पन्न भेदों को असाध्य भेद में नहीं गिना
जाता । अतः इन कुष्ठों के भेदों की गणना को बहुत विस्तृत जान कर यहां
पर केवल सात प्रकार के कुष्ठों का उपदेश करेंगे ॥५॥
इह वातादिषु त्रिषु प्रकुपितेषु त्वगादींश्चतुरः प्रदूषयत्सु वातेऽ-
धिकतरे कापालकुष्ठमभिनिर्वर्तते, पित्ते त्वौदुम्बरं, श्लेष्मणि मण्डल-
कुष्ठं, वातपित्तयोर्ऋष्यजिह्वं, पित्तश्लेष्मणोः पुण्डरीकं, श्लेष्ममारुतयोः
सिध्म, सर्वदोषाभिवृद्धौ काकणकमभिनिर्वर्तते; इत्येवमेष सप्तविधः
कुष्ठविशेषो भवति ॥ ६ ॥
स चैष भूयस्तरमतः प्रकृतौ विकल्पमानायां भूयसीं विकारवि-
कल्पसंख्यामापद्यते ॥ ७ ॥
१. वेदनाविशेष—कापालं तोदबहुलम् । वर्णविशेष—काकणन्तिकावर्णम्
संस्थान—ऋष्यजिह्वासंस्थानम् । प्रभाव—साध्यताऽसाध्यतादि । नामविधे-
कापालः, —ये उदाहरण हैं ।