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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 639 में से

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पृष्ठ 458

४४० चरकसंहिता [ अ० ४ ]


प्रसादमेह, (५) शुक्लमेह, (६), शुक्रमेह, (७) शीतमेह (८) सिकतामेह (६)
शनैर्मेह और (१०) आलालमेह ।
ये कफजन्य दस प्रमेह साध्य हैं। क्योंकि कफ और मेद के गुण एवं स्थान
समान हैं, तथा कफ की प्रधानता होने से और कफ और मेद की चिकित्सा
के समान होने से कफप्रमेह साध्य है ॥ १२॥
तत्र श्लोकाः श्लेष्मप्रमेहविज्ञानार्था भवन्ति ।
कफप्रमेहों को बताने के लिये श्लोक कहते हैं—
अच्छं बहुसितं शान्तं निर्गन्धमुदकोपमम् ।
श्लेष्मकोपान्नरो मूत्रमुदमेही प्रमेहति ॥ १३ ॥
अत्यर्थमधुरं शीतमीषत्पिच्छिलमाविलम् ।
काण्डेक्षुरससंकाशं श्लेष्मकोपात्प्रमेहति ॥ १४ ॥
यस्य पर्युषितं मूत्रं सान्द्रीभवति भाजने ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहुः सान्द्रमेहिनम् ॥ १५ ॥
यस्य संहन्यते मूत्रं किंचित् किंचित्प्रसीदति ।
सान्द्रप्रसादमेहीति तमाहुः श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥
शुक्लं पिष्टनिभं मूत्रमभीक्ष्णं यः प्रमेहति ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहुः शुक्लमेहिनम् ॥ १७ ॥
शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा मुहुर्मेहति यो नरः ।
शुक्रमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १८ ॥
अत्यर्थशीतमधुरं मूत्रं मेहति यो भृशम् ।
शीतमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥
मूर्तान्मूत्रगतान्दोषानणन्मेहति यो नरः ।
सिकतामेहिनं विद्यान्नरं तं श्लेष्मकोपतः ॥ २० ॥
मन्दं मन्दमवेगं तु कृच्छ्रं यो मूत्रयेच्छनैः ।
शनैर्मेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ २१ ॥
तन्तुबद्धमिवाऽऽलालं पिच्छिलं यः प्रमेहति ।
आलालमेहिनं विद्यात्तं नरं श्लेष्मकोपतः ॥ २२ ॥
(१) उदकमेह—उदकमेह का रोगी कफ के प्रकोप के कारण बहुत स्वच्छ,
बहुत सफेद, शीतल, बिना गन्ध का, पानी के समान मूत्र करता है यह उदक-
मेह के लक्षण हैं।


  • मूत्रमार्ग से शुक्र का मूत्र से पृथक् रूप में जाना यह शुक्रदोष
    इसका प्रमेह में अन्तर्भाव नहीं होता ।