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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 639 में से

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पृष्ठ 403

अ० २९] २५ सूत्रस्थानम् १८४
होते हैं और शाखाओं से जिस प्रकार कोष्ठ में आते हैं, विशद और अविदाह
की भिन्नता, स्वस्थ और रोगी के लिये जो कुछ हितकारी है, वह सब 'विविधा-
शितपीतीय' अध्याय में कह दिया ॥ ४४-४७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतुष्के
विविधाशितपीतीया नाम अष्टाविंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २८ ॥
समाप्तमिदं सप्तममन्नपानचतुष्कम् ।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।
अथातो दशप्राणायतनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब आगे 'प्राणायतनीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
दशैवायतनान्याहुः प्राणा येषु प्रतिष्ठिताः ।
शङ्खौ मर्मत्रयं कण्ठो रक्तं शुक्रौजसी गुदम् ॥ ३ ॥
तानीन्द्रियाणि विज्ञानं चेतनाहेतुमामयम् ।
जानीते यः स वै विद्वान् प्राणाभिसर उच्यते ॥ ४ ॥ इति ॥
प्राण जिन स्थानों पर आश्रित हैं वे दस स्थान हैं । यथा ( १-२ ) शंख-
प्रदेश ( कनपटी ) दो, ( ३-५ ) तीन मर्म-हृदय, वस्ति और शिर, ( ६ ) कण्ठ,
( ७ ) रक्त, ( ८ ) शुक्र, ( ९ ) ओज और ( १० ) गुदा ये दस प्राणों के
स्थान हैं।
इन दस स्थानों को, इन्द्रियों ( आध्यात्मिक ), चेतनाहेतु ( आत्मा )
और रोगों के कारण, लक्षण और ओषधि-चिकित्सा को जो विद्वान् जानता है,
वही 'प्राणाभिसर' कहलाता है ॥ ३-४ ॥
द्विविधास्तु खलु भिषजो भवन्त्यग्निवेश ! प्राणानामेकेऽभिसरा
हन्तारो रोगाणां, रोगाणामेकेऽभिसरा हन्तारः प्राणानामिति ॥ ५ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—भगवन् ! ते कथम-
स्माभिर्वेदितव्या भवेयुरिति ॥ ६ ॥
भगवानुवाच—य इमे कुलीनाः पर्यवदातश्रुताः परिदृष्टकर्माणो
दक्षाः शुचयो जितहस्ता जितात्मानः सर्वोपकरणवन्तः सर्वेन्द्रियो-
पपन्नाः प्रकृतिज्ञाः प्रतिपत्तिज्ञास्ते प्राणानामभिसराः, हन्तारो रोगा-