चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२३
इस के आगे अन्नपानविधि नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भग-
वान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२॥
इष्ट-वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शं विधिविहितमन्नपानं प्राणिनां प्राणिसंज्ञ-
कानां प्राणमाचक्षते कुशलाः, प्रत्यक्षफलदर्शनात्, तदिन्धना ह्यन्तराग्नेः
स्थितिः; तत् सत्त्वमूर्जयति, तच्छरीर-धातु-व्यूह-बल-वर्णोन्द्रियप्रसाद-
करं यथोक्तमुपसेव्यमानं, विपरीतमहिताय संपद्यते ॥ ३ ॥
प्रिय या हितकर वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्शयुक्त विधिपूर्वक^१ सेवन किया अन्न
पान, प्राणिमात्र का प्राण है; ( 'अन्नं वै प्राणाः' ) ऐसा विद्वान् मनुष्य कहते
हैं । सब प्राणियों के प्राण स्थिर रखने के लिये आहार मुख्य कारण है । यह बात
प्रत्यक्ष प्रमाण से भी सिद्ध है । ठीक प्रकार सेवन करने पर अन्न शरीर में स्थित
जाठराग्नि का आधार है और इस अग्नि का अन्न इन्धन रूप होता है । अन्न के
सेवन करने से मन की शक्ति बढ़ती है, शरीर के धातुसमूह, बल वर्ण बढ़ता है,
तथा इन्द्रियां निर्मल होती हैं । विधि से विपरीत^१ सेवन करने पर अन्न, विप-
रीत परिणाम उत्पन्न करता है ॥ ३ ॥
तस्माद्धिताहितावबोधनार्थमन्नपानविधिमखिलेनोपदेक्ष्यामोऽग्नि-
वेश ! तत्स्वभावादुदकं क्लेदयति, लवणं विष्यन्दयति, क्षारः पाचर्यात,
मधु संदधाति, सर्पिः स्नेहयति, क्षीरं जीवयति, मांसं बृंहयति, रसः
प्रीणयति, सुरा जर्जराकरोति, शीधुरवधमयति, द्राक्षासवो दीपयति,
फाणितमाचिनोति, दधि शोफं जनयति, पिण्याकशाकं ग्लपयति, प्रभू-
तान्तर्मलो माषसूपः, दृष्टिशुक्रघ्नः क्षारः, प्रायः पित्तलमम्लमन्यत्र दाडि-
मामलकात्, प्रायो मधुरं श्लेष्मलमन्यत्र मधुनः पुराणाच्च शालयवगो-
धूमात्, प्रायः सर्वं तिक्तं वातलमवृष्यं चान्यत्र वेत्राग्रपटोलात्, प्रायः
कटुकं वातलमवृष्यं चान्यत्र पिप्पलीविश्वभेषजात् ॥ ४ ॥
इसलिये हे अग्निवेश ! हितकारी और अहितकारी विषय का ज्ञान करनेके लिये अन्न-
पान विधि को विस्तार से कहते हैं। स्वाभाविक रीति से जल (क्लिन्नता) उत्पन्न करता
है । लवण विष्यन्द (नरम बनाना, जलस्राव उत्पन्न) करता है । क्षार पाचन करता है,
शहद जोड़ता है, घी चिकना बनाता है । दूध जीवन देता है, मांस बृंहण
पोषण देता है । रस क्षीणता को पुष्ट करता है । मद्य शरीर को जीर्ण करता है ।
शीधु [ सिरका ] शरीर का लेखन करता है, द्राक्षासव अग्नि को बढ़ाता है ।
१. सूत्रस्थान इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय ( ८। सू० १६) में ('नात्न-
न्नमुद्धृत्यादि भोजन करने के सम्बन्ध में उचित विधान किया है।