चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३११
मानते हैं वे लघुत्व होने से लघु समझते हैं। दोनों ही पक्ष किञ्चित् गुरुत्व
स्वीकार करते हैं ॥
परं चातो विपाकानां लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ ५४ ॥
कटु तिक्त-कषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः ।
अम्लोऽम्लं पच्यते, स्वादुर्मधुरं लवणस्तथा ॥५५॥
मधुरो लवणाम्लौ च स्निग्धभावात्त्रयो रसाः ।
वात-मूत्र-पुरीषाणां प्रायो मोक्षे सुखा मताः ॥५६॥
कटुतिक्तकषायास्तु रूक्षभावात्त्रयो रसाः ।
दुःखाय मोक्षे दृश्यन्ते वातविण्मूत्ररेतसाम् ॥ ५७ ॥
शुक्रहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातलः कटुः ।
मधुरः सृष्टविण्मूत्रो विपाकः कफशुक्रलः ॥ ५८ ॥
पित्तकृत्सृष्टविण्मूत्रः पाकोऽम्लः शुक्रनाशनः ।
तेषां गुरुः स्यान्मधुरः कटुकाम्लाबतोऽन्यथा ॥ ५९ ॥
विपाक लक्षणस्याल्पमध्यभूयिष्ठतां प्रति ।
द्रव्याणां गुणवैशेष्यात्तत्र तत्रोपलक्षयेत् ॥ ६० ॥
विपाक-इसके आगे विपाकों १ का लक्षण कहते हैं। कटु, तिक्त, कषाय
रस के आधार भूत द्रव्यों का विपाक प्रायः कटु होता है। ( पिप्पलो कटु रस
होने पर भी विपाक में प्रायः कटु होता है। पिप्पलो कटु रस होने पर भी
विपाक में मधुर है, इसलिये प्राय शब्द है)। अम्ल रस का अम्ल और मधुर
तथा लवण रस का मधुर विपाक होता है। मधुर, अम्ल और लवण ये तीनों
रस स्निग्ध होने के कारण वायु, मूत्र, मल को सुख पूर्वक बाहर निकालने में
सहायक होते हैं। कटु, तिक्त और कषाय रस रूक्षगुण होने से वात, मल, मूत्र
और शुक्र के बाहर निकालने में कष्ट रूप होते हैं, अवरोध करते हैं। जिस द्रव्य
का विपाक कटु होता है, वह वीर्यनाशक, मल मूत्र का अवरोध करने वाला
और वायुकारक होता है। जिस द्रव्य का विपाक मधुर होता है, वह मल मूत्र
का प्रवर्त्तक (रेचक) और कफ एवं शुक्र को बढ़ाता है। जिस द्रव्य का विपाक
अम्ल होता है, वह पित्तकारक, मल-मूत्र का रेचक और वीर्यनाशक होता है।
१. विपाक—खाये हुए अन्न का जाठराग्नि में पाचन क्रिया के पश्चात्
रस उत्पन्न होता है उसका नाम विपाक है।
“जाठरेणाग्नियोगात् यदुदेयति रसान्तरम् ।
रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ॥”