चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०२ चरकसंहिता [ अ० २६
चाहिये । काल—वमन काल में कहने पर 'प्रतिग्रहं चोपहारयेत्' अर्थात् वमन
का पात्र लाओ । इसी प्रकार भोजन के समय 'सैन्धवमानय' कहने से नमक का
लाना उचित है, न कि घोड़े का । इसलिये ग्रन्थकर्ता के अभिप्राय से रसों में
गुणों का कथन समझना चाहिये । जहां पर प्रकरणगत देश काल आदि द्वारा
ग्रन्थकर्ता का अभिप्राय स्पष्ट नहीं होता, वहां उपायों द्वारा तन्त्र-युक्ति रूपी
उपायों से अर्थ को समझना चाहिये ।२९-३५॥
परं चातः प्रवक्ष्यन्ते रसानां षड् विभक्तयः ।
षट्पञ्च भूतप्रभवाः संख्याताश्च यथारसाः ॥ ३६ ॥
सौम्याः खल्वापोऽन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लघ्व्यश्चाव्यक्त-
रसाश्च; तास्त्वन्तरिक्षाद् भ्रश्यमाना भ्रष्टाश्चपञ्चमहाभूत-विकार-गुण-सम
न्विता जङ्गमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणयन्ति, तासु मूर्तिषु षड-
भिमूर्च्छन्ति रसाः ॥ ३७ ॥
पञ्च महाभूतों से उत्पन्न छः रसों को विभाग करके कहते हैं किस प्रकार
से छः रस उत्पन्न होते हैं। सब रसों का उत्पत्तिस्थान पानी है। यह पानी
सौम्य (सोमगुणी), अन्तरिक्ष से उत्पन्न होने वाला, स्वभाव से शीतल, लघु
एवं 'अव्यक्त रस' है। यह पानी अन्तरिक्ष से नीचे गिरता हुआ अन्तरिक्ष में
स्थित पृथिवी आदि के परमाणुओं से दूषित होकर, पञ्च महाभूतों से बने स्थावर
(जड़) और जंगम (चल) पदार्थों को तर्पण करता है, इन पदार्थों के स्वरूप को
बनाता है, उत्पन्न करता है। इन पदार्थों से ही छः रस अभिव्यक्त होते हैं॥३७॥
तेषां षण्णां रसानां सोमगुणातिरेकान्मधुरो रसः पृथिव्यग्नि-
भूयिष्ठत्वादम्लः, सलिलाग्निभूयिष्ठत्वाल्लवणः, वाय्वग्निभूयिष्ठत्वा-
त्कटुकः, वाय्वाकाशातिरेकात्तिक्तः, पवनपृथिव्यतिरेकात्कषाय इति।
एवमेषां रसानां षट्त्वमुत्पन्नं, ऊनातिरेकविशेषान्महाभूतानां भूताना-
मिव जङ्गमस्थावराणां नानावर्णाकृतिविशेषाः, षडृतुकत्वाच्च काल-
स्योपपन्नो महाभूतानामूनातिरेकविशेषः ॥ ३८ ॥
यहां पर अन्तरिक्ष स्थित पानी को रसोत्पत्ति में मुख्य कारण माना है।
इस से पृथिवी पर स्थित पानी भी स्थावर और जंगम पदार्थों में रस उत्पन्न
करने में कारण है। इन छः रसों में सोम गुण के अधिक होने से (अर्थात्
अन्य भूत भी थोड़ी २ मात्रा में हैं) मधुर रस, पृथिवी और अग्नि गुण की
अधिकता से अम्ल, पानी और अग्नि गुण की अधिकता से लवण, वायु और
अग्नि की अधिकता से कटु, वायु और आकाश गुण की अधिकता से तिक्त