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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 639 में से

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पृष्ठ 315

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् २६७
लवणकटु ( ११ ) लवणतिक्त ( १२ ) लवणकषाय ( १३ ) कटुतिक्त ( १४ )
कटुकषाय ( १५ ) तिक्तकषाय । १३॥
पृथगम्लादियुक्तस्य योगः शेषैः पृथग्भवेत् ।
मधुरस्य तथाऽम्लस्य लवणस्य कटोस्तथा ॥ १४ ॥
त्रिरसानि यथासंख्यं द्रव्याण्युक्तानि विंशतिः ।
तीन तीन रसों के २० भेद हैं, जैसे—( १ ) मधुर, अम्ल के साथ लवण
आदि चारों का पृथक् २ योग होने से चार भेद । ( २ ) मधुर, लवण के
साथ कटु आदि तीन का पृथक् २ योग होने से तीन भेद । ( ३ ) मधुर कटु
का कटु, कषाय से पृथक् २ योग होने से दो भेद । (४) मधुर तिक्त का कषाय
से योग होने से एक भेद । ( ४ ) अम्ल लवण का कटु आदि तीन के साथ
योग होने से तीन भेद । ( ५ ) अम्ल कटु का तिक्त कषाय दो के साथ
पृथक् पृथक् योग होने से दो भेद । ( ६ ) अम्ल तिक्त का कषाय से योग होने से
एक भेद । ( ७ ) लवण कटु का तिक्त और कषाय दो से योग होने से दो
भेद। ( ८ ) लवण तिक्त का कषाय से योग होने से एक भेद । ( ६ ) कटु
तिक्त का कषाय से योग होने से १ भेद । जैसे—(१) मधुर अम्ल लवण, (२)
मधुर अम्ल कटु, ( ३ ) मधुर अम्ल तिक्त ( ४ ) मधुर अम्ल कषाय । ( ५ )
मधुर लवण कटु, ( ६ ) मधुर लवण तिक्त, ( ७ ) मधुर लवण कषाय । ( ८ )
मधुर कटु तिक्त, ( ९ ) मधुर कटु कषाय । ( १० ) मधुर तिक्त कषाय । (११)
अम्ल कटु तिक्त, ( १२ ) अम्ल कटु कषाय । ( १३ ) अम्ल तिक्त कषाय ।
( १४ ) लवण कटु तिक्त, ( १५ ) लवण कटु कषाय । ( १६ ) अम्ल लवण
कटु ( १७ ) अम्ल लवण तिक्त ( १८ ) अम्ल लवण कषाय । ( १६ ) कटु
तिक्त कषाय, ( २० ) लवण तिक्त कषाय ॥१४॥
वक्ष्यन्ते तु चतुष्केण द्रव्याणि दश पञ्च च ॥ १५ ॥
स्वाद्वम्लौ सहितौ योगं लवणाद्यैः पृथग्गतौ ।
योगं शेषैः पृथग्यातश्चतुष्करससंख्यया ॥ १६ ॥
चार रसों के भेद पन्द्रह हैं । यथा---चार रसों ( स्वादु, अम्ल, लवण और
कटु ), में एक एक रस का ( कटु, तिक्त, कषाय ) संयोग होने से छः रस बनते
। इन में स्वादु और अम्ल रस स्थिर रहते हैं ॥१५-१६॥
सहितौ स्वादुलवणौ तद्वत्कट्वादिभिः पृथक् ।
युक्तौ शेषैः पृथग्योगं यातः स्वादूषणौ तथा ॥ १७ ॥
कट्वाद्यैरम्ललवणौ संयुक्तौ सहितौ पृथक् ।