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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 639 में से

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पृष्ठ 252

२३४ चरकसंहिता [ अ० १६
चत्वारोऽपस्मारा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-निमित्ताः ।
चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायाः, चत्वारो
मुखरोगाः, चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छार्या
इत्यपस्मारैर्व्याख्याताः । चत्वारः शोषा इति साहस-संधारण-क्षय-विष-
माशनजाः, चत्वारि क्लैब्यानीति बीजोपघाताद्ध्वजभङ्गाज्जरायाः
शुक्रक्षयाच्च ॥ ( ५ ) ॥
चार अपस्मार-वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य और सन्निपातजन्य ।
चार आंख के और चार कान के रोग, चार प्रतिश्याय, चार मुखरोग चार
ग्रहणी दोष, चार मद, चार मूर्च्छायें, ये अपस्मार के समान ( वात, पित्त,
कफ और सन्निपातजन्य ) हैं। चार प्रकार का शोष, साहस, सन्धारण (मल-मूत्र
के उपस्थित वेगों का रोकना ) क्षय तथा विषम भोजनजन्य । चार प्रकार की
नपुंसकता-बीज के ( वीर्य के ) दोष से, ध्वज ( साधन ) के दोषसे, जरा
( बुढ़ापे ) से और शुक्र के क्षय के कारण ॥ ( ५ ) ॥
त्रयः शोथा इति वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः, त्रीणि किलासानीति
रक्त-ताम्र-शूक्लानि, त्रिविधं लोहित-पित्तमित्यूर्ध्वभागमधोभागमुभय-
भागं च ॥ ( ६ ) ॥
शोथ तीन प्रकार का-वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य । तीन प्रकार
के किलास-रक्त ( लाल ), ताम्र और शुक्ल ( श्वेत ) । तीन प्रकार का रक्त-
पित्त ऊर्ध्वगामि, अधोगामि और उभयगामि ( ऊर्ध्व एवं अधः दोनों मार्गों से
जाने वाला ) ॥ ( ६ ) ॥
द्वौ ज्वराविति उष्णाभिप्रायः शीतसमुत्थश्च शीताभिप्रायश्चोष्णस-
मुत्थः, द्वौ व्रणौ इति निजश्चागन्तुजश्च, द्वावायामाविति बाह्यश्चाभ्यन्त-
रश्च, द्वे गृध्रस्याविति वाताद्वातकफाच्च, द्वे कामले इति कोष्ठाश्रया शाखा-
श्रया च, द्विविधमाममित्यलसको बिसूचिका च, द्विविधं वातरक्तमिति
गम्भीरमुत्तानं च, द्विविधान्यर्शांसीति शुष्काण्यार्द्राणि च ॥ ( ७ ) ॥
ज्वर दो प्रकार का-शीत से उत्पन्न हुआ, जिसमें उष्ण उपचार की इच्छा
हो, यह एक प्रकार का, उष्णिमा से उत्पन्न हुआ जिसमें शीत उपचार की इच्छा
हो, यह दूसरी प्रकार का । व्रण दो प्रकार के-निज (शारीरिक) और आगन्तुज
( बाह्य कारण से ) दो आयाम-बाह्य और आभ्यन्तर । दो प्रकार का गृध्रसी
रोग-वातजन्य और वात-कफजन्य । कामला दो प्रकार का-कोष्ठाश्रित और शाखा-
श्रित । आम दो प्रकार का-अलसक और विसूचिका ( हैजा ) । वातरक्त दो