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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 639 में से

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पृष्ठ 220

[Page Header: २०२ चरकसंहिता अ० १७]

चिकित्सा का प्रयोजन—ये सब बातें 'चिकित्सा-प्राभृतीय' अध्याय में आत्रेय
ऋषि ने उपदेश की हैं ॥ ३६-४१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के
चिकित्साप्राभृतीयो नाम षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १६ ॥
इति कल्पनाचतुष्कः समाप्तः ॥ ४ ॥

सप्तदशोऽध्यायः ।

अथातः कियन्तःशिरसीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब रोगों को उपदेश करने की इच्छा से 'कियन्तःशिरसीयं' नामक
अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
कियन्तः शिरसि प्रोक्ता रोगा हृदि च देहिनाम् ॥ ३ ॥
कति चाप्यनिलादीनां रोगा मानविकल्पजाः ।
क्षयाः कति समाख्याताः पिडकाः कति चानघ ॥ ४ ॥
गतिः कतिविधा चोक्ता दोषाणां दोषसूदन ।
अग्निवेश ने पूछा कि हे दोषों को नाश करने वाले महर्षि ! मनुष्यों के
शिर सम्बन्धी रोग कितने हैं ? हृदय सम्बन्धी रोग कितने हैं ? वात आदि दोषों
के संसर्ग भेद से कुल कितने प्रकार के रोग हो जाते हैं ? क्षय रोग कितने
प्रकार के हैं ? पिड़कायें कितनी प्रकार की हैं ? और दोषों की गति कितने प्रकार
की है ? कृपा कर कहिये ॥३-४॥
हुताशवेशस्य वचस्तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् ॥ ५ ॥
पृष्टवानसि यत्सौम्य तन्मे शृणु सुविस्तरम् ।
दृष्टाः पञ्च शिरोरोगाः पञ्चैव हृदयामयाः ॥ ६ ॥
व्याधीनां द्वयधिका षष्टिर्दोष-मान-विकल्पजा ।
दशाष्टौ च क्षयाः सप्त पिडका माधुमेहिकाः ॥ ७ ॥
दोषाणां त्रिविधा चोक्ता गतिर्विस्तरतः शृणु ।
सन्धारणाद्दिवास्वप्नाद्रात्रौ जागरणाम्मदात् ॥ ८ ॥
उच्चैर्भाष्यादवश्यायात्प्राग्वातादतिमैथुनात् ।
गन्धादसात्म्यादाघ्राताद्रजो-धूम-हिमातपात् ॥ ९ ॥