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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 122 में से

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पृष्ठ 105

37 क्योंकि जीवन (=प्रवृत्ति) अनित्य व संस्कृत है, इसलिए वे नश्वर परिवर्तनशील असार और
अविश्वसनीय हैं; उनमें कुछ भी स्थायित्व नही है।
38 वसिष्ठ, अत्रि और दूसरे सभी तपस्वी (ऊर्ध्वरेतस्) काल के वशीभूत हुए। यहाँ का अस्तित्व
ही विनाशक है।
39 पृथ्वीपति मान्धाता, वासवतुल्य वसु और भाग्यशाली (=महाभाग) नाभाग (पञ्च-) महाभूतों में
मिल गये।
40 मार्ग पर चलनेवाला ययाति भी, भव्य रथवाला भगीरथ, निन्दा व अयश प्राप्त करनेवाले
कौरव, राम गिरिरजस, अज,
41 ये महात्मा महर्षि और महेन्द्र के समान अनेक दूसरे लोग नाश को प्राप्त हुए; क्योंकि ऐसा
कोई नही जिसका नाश नही होता।
42 सूर्य अपने स्थान से च्युत होता है, सम्पत्तिशाली देवगण पृथ्वी पर आये, शत शत इन्द्र चले
गये; क्योंकि कोई सदा नही रहता।
43 दूसरे सब सम्बुद्धों ने जगत् को प्रकाशित कर उन दोषों के समान, जिनका तेल क्षीण हो गया
हो, निर्वाण प्राप्त किया।
44 भविष्य में तथागत होनेवाले सब महात्मा भी, उन अग्नियों के समान, जिनका जलावन जल
गया हो (=भुक्तेन्धनाः), निर्वाण प्राप्त करेंगे।
45 इसलिए मुझे भी मुक्ति की खोज करनेवाले वनवासी तपस्वी के समान चला जाना चाहिए;
क्योंकि मैं जो इस व्यर्थ शारीरिक अस्तित्व (=नाम-रूप) को घसीटूँ, इसका कोई कारण नही।
46 क्योंकि इस रमणीय वैशाली से, जिसमें कुछ लोग दीक्षित होने को हैं ही, मेरा आशय प्रस्थान
करने का है, इसलिए तुम्हें दूसरे पथ का अनुसरण न करना चाहिए (या अन्यमनस्क न होना
चाहिए)।
47 अतः इस जगत् को निराश्रय दीन व अनित्य जानो; और निष्काम भाव से रहते हुए संवेग प्राप्त
करो।
48 इस तरह संक्षेप में, जब क्रम से तथागत फिर न देख पड़ें, तब कुबेर की दिशा (उत्तर) की
ओर बढ़ो, जैसे कि जेठ महीने में सूर्य (उत्तर की ओर बढ़ता है)।”
49 तब लिच्छवि अश्रुपूर्ण आँखों से उनके पीछे पीछे जाने लगे; और आभूषणों-भरी मोटी भुजाओं
से उन्होंने हाथ (=करतल) जोड़कर विलाप किया:–
50 “अहो! विशुद्ध-सुवर्ण-सदृश गुरु का शरीर, जो 32 लक्षणों से युक्त है, भग्न होगा। करुणामय
भगवान् भी अनित्य हैं।
51 बेचारे बछड़े, जिन्हें अबतक होश (बुद्धि) नही हुआ है, दूध के अभाव में प्यासे हैं, और ज्ञान
की दुधार गाय, अहो! उन्हें अति शीघ्रता से छोड़ रही है।
52 मुनि वह सूर्य हैं, जिनके ज्ञानरूपी प्रकाश ने प्रदीप-रहित मनुष्यों का मोहान्धकार दूर कर दिया
है, और यह सूर्य हठात् ही अस्त होगा।
53 जब कि जगत् में अज्ञान-धारा जहाँ तहाँ बह रही है, धर्म का दूरव्यापी बाँध शीघ्र ही टूट रहा
है।
54 करुणामय महाभिषक् को उत्तम ज्ञानरूपी ओषधि है, तो भी मानसिक आधियों से पीड़ित
जगत् को छोड़कर वह प्रस्थान करेंगे।
55 मन के हीरों से अलङ्कृत और प्रज्ञारूपी आभूषणों से भूषित इन्द्र-पताका का पतन होगा, जब
कि उत्सव के अवसर पर लोग इसके प्यासे ही हैं।
56 दुःख-भागी जगत् के लिए, जो भव-चक्र के बन्धनों से बँधा हुआ है, यह मुक्ति-द्वार है और
मौत इसे दृढ़तापूर्वक बन्द कर देगी।”
57 इस प्रकार अश्रु-आविल आँखों से लिच्छवियों ने विलाप किया और जब वे उनके पीछे पीछे
जाने लगे, तो मुनि ने उन्हें फिर लौटा दिया।
58 तब मुनि का निश्चय जानकर वे शान्त हो गये और अत्यन्त शोकित होकर उन्होंने लौटने का
विचार किया।
59 वे, जो सोने के पहाड़ के समान सुन्दर थे, मुनि के पाँव पड़ते समय कर्णिकार वृक्षों के समान
शोभित हुए जिनके फूल हवा में हिल रहे हों।
60 उनके हृदय उनमें अनुरक्त थे, उनके पाँव लड़खड़ा रहे थे, और धारा के विरुद्ध चलती हुई
तरङ्गों के समान, वे आगे बढ़े बिना ही लौट गये।
*61 .... .... , मुनि में उनका आनन्द और मुनि के प्रति उनकी श्रद्धा अविचल थी।
*62 जङ्गल के गवांमति के चले जानेपर महावृषभों के समान वे खड़े हो होकर दशबलधारी की
ओर बार बार देख रहे थे।
63 तब तथागत में लगे चित्त से और अत्यन्त कान्तिहीन शरीर से वे शोकित होकर पैदल ही जाने
लगे, जैसे अन्त्य कर्म के मृत-स्नान के लिए जा रहे हों।⁸⁹
*64 लिच्छवि (लाचार होकर) अपने महलों में लौट आये और यद्यपि उन्होंने धनुषों से, जिनका
निशाना कभी चूका नही, शत्रुओं को पराजित किया था, यद्यपि वे अभिमानी एवं बलवान् थे,
यद्यपि वे संसार में साम्राज्य पाने के लिए यत्न करते थे और यद्यपि सुख के साधनों पर
उनका अधिकार महान् था, तो भी वे विषण्णवदन थे।
॥बुद्धचरित महाकाव्य का “लिच्छवियों पर अनुकम्पा” नामक 24वाँ सर्ग समाप्त ॥
⁸⁹ - किसी के मरनेपर स्नान करनेवाले को “अपस्नात” या “मृतस्नात” कहते हैं।
बुद्धचरित 105