बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें55 जैसे अस्वस्थ मनुष्यों को रोग-मुक्त करने के लिए, वैद्य उनकी शारीरिक अवस्थाओं के
अनुसार ओषधि-सेवन का आदेश देता है,
56 वैसे ही काम बुढ़ापा आदि रोगों से पीड़ित प्राणियों के आशय जानकर मुनि ने उन्हें तत्त्व-ज्ञान
की ओषधि दी।
57 मुनि के ऐसे उपदेश से लिच्छवियों को आनन्द हुआ और उन्होंने सिर नवाकर उन्हें प्रणाम
किया, जिससे उनकी रत्नमय चूड़ाएँ नीचे लटकने लगीं।
58 तब हाथ जोड़कर और कुछ कुछ देह नवाकर, उन्होंने अपने यहाँ आने के लिए बुद्ध से
अनुरोध किया, जैसे देवताओं ने बृहस्पति से अनुरोध किया था।
59 जब मुनि ने उनसे निवेदन किया कि आम्रपाली की पारी पहले आई और बताया कि कुल-पुत्रों
के निमित्त नीच कुलवालों को उनके अधिकारों से वञ्चित नहीं करना चाहिए।
60 उस स्त्री ने उन लोगों को पहले ही आकर वञ्चित कर दिया, यह जानकर उन्होंने तथागत का
अत्यन्त सम्मान किया, और वे अपनी स्वाभाविक मानसिक अवस्था (क्रोध) पर लौट आये।
61 किन्तु जब तथागत ने उन्हें उपदेश दिया, तब उन्होंने मानसिक शान्ति प्राप्त की, जैसे मुनियों
के मन्त्रों का ठीक ठीक उच्चारण करने से साँप का विष शान्त हो जाता है।
62 रात बीतनेपर आम्रपाली ने उनका आतिथ्य किया और (वर्षावास करने के लिए वह) वेणुमती
गाँव को (गये)।
63 वर्षाऋतु वहाँ बिताकर महामुनि वैशाली लौट गये और मर्कट-जलाशय के किनारे बैठ गये।
64 वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गये और जब वह वहाँ विराज रहे थे तो मार उस वन में आया और
उनके समीप जाकर कहा-
65 "पूर्व में, हे मुनि, नैरञ्जना नदी के तीर पर जब मैंने आपसे कहा था "आपने अपना काम पूरा
किया, निर्वाण प्राप्त कीजिए" तब आपने वहाँ उत्तर दिया था:-
66 "मैं तबतक निर्वाण प्राप्त न करूँगा, जबतक पीड़ित प्राणियों की रक्षा न कर लेता हूँ और
उनके द्वारा पाप-परित्याग (दोषक्षय) न करा लेता हूँ।"
67 अब बहुतों ने मुक्ति (निर्वाण) पाई, या उसी तरह पाना चाहते हैं या पायेंगे। इसलिए निर्वाण
प्राप्त कीजिए।"
68 तब ये वचन सुनकर, अर्हत्-श्रेष्ठ ने उससे कहा, "तीन महीने में मैं निर्वाण प्राप्त करूँगा, अतः
अधीर मत होओ।"
69 तब इस प्रतिज्ञा से अपनी इच्छा पूरी हुई जानकर, वह अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ से हट गया।
70 तब महामुनि ऐसे योग-बल से चित्त-समाधि में प्रविष्ट हुए कि उन्होंने अपनी शारीरिक आयु
(जीवन) को छोड़ दिया और दिव्य शक्ति के प्रभाव से अभूतपूर्व तरीके से प्राण धारण किया।
71 जिस घड़ी उन्होंने शारीरिक आयु का परित्याग किया उस घड़ी पृथ्वी माती हुई स्त्री के समान
काँपी और दिशाओं से बड़ी बड़ी उल्काएँ गिरीं, जैसे अग्नि प्रज्वलित मेरु-पर्वत से पत्थरों की
वर्षा हो रही हो।
72 उसी प्रकार इन्द्र के अग्निगर्भ एवं विद्युन्मण्डित वज्र चारों ओर निरन्तर प्रदीप्त हुए; और
ज्वालाएँ सर्वत्र प्रज्वलित हुईं, जैसे कल्पान्तकालीन जगत् को जलाने की इच्छा कर रहीं हों।
73 पर्वतों ने, जिनकी चोटियाँ नष्ट हो गईं, ढेर के ढेर टूटे हुए वृक्ष चारों ओर बिखरे और आकाश
में दुन्दुभियों से, जैसे वायुपूर्ण गुफाओं से, विषम ध्वनि निकली।
74 तब मर्त्यलोक दिव्यलोक एवं आकाश में हुए सार्वभौम संक्षोभ की घड़ी में महामुनि ने गम्भीर
समाधि से निकल कर ये वचन कहे:-
75 "मेरा शरीर, जिसकी आयु मुक्त हो गई है, उस रथ के समान है, जिसका धुरा (अक्षाग्र,
अक्षधुरा) टूट गया हो और मैं इसे अपनी शक्ति से ढो रहा हूँ। अपनी आयु के साथ मैं भव-
बन्धन से मुक्त हूँ, जैसे अण्डे से निकलते समय अण्डे को फोड़नेवाला पक्षी (बन्धन से मुक्त
होता है)।"
॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "आयु निश्चित करना"⁸⁶ नामक 23वाँ सर्ग समाप्त ॥
चौबीसवाँ सर्ग
लिच्छवियों पर अनुकम्पा
1 तब भूकम्प देखकर, आनन्द को रोमाञ्च हो गया; और "क्या होगा" इससे घबराकर
( = आगतवेगः) वह काँपने लगा और आर्त हो गया।
2 उसने कारण जाननेवाले सर्वज्ञ से इसका कारण पूछा। तब मुनि ने मतवाले साँड के स्वर में
उसे कहा:-
3 "इस भूकम्प का कारण यह है कि मैंने पृथ्वी पर अपने दिन काट डाले हैं; मेरे जीवन के अब
तीन महीने बचे हुए हैं (मेरी आयु अब से तीन महीने पर अधिष्ठित है)।"
4 यह सुनकर आनन्द अत्यन्त विचलित हो गया और उसके आँसू बहने लगे, जैसे किसी बड़े
हाथी द्वारा तोड़े गये चन्दन-वृक्ष से रस बह रहा हो।
5 बुद्ध उसके स्वजन और गुरु थे, इस कारण उसे शोक हुआ और अत्यन्त दुःखी होकर उसने
दीनतापूर्वक विलाप किया:-
6 "अपने गुरु का निश्चय सुनकर, मेरा शरीर मानो डूब रहा है, मेरी ग्रन्थियाँ ढीली हो रही हैं
और धर्मोपदेश, जो कि मैंने सुना है, आकुल हो रहा है।
⁸⁶- शारीरायुःसंस्काराधिष्ठान = शारीरिक आयु के संस्कारों का अधिष्ठान = आयु पर अधिकार प्राप्त करना, या
आयु निश्चित करना।
बुद्धचरित 103