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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 760 में से

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पृष्ठ 98

७० बृहत्संहिता
नागदन्ता न भवन्ति, तथा शयीत। तथा च विश्वकर्माह—
शय्यानुवंशविन्यस्ता तुला हन्यात् कुटुम्बिनः।
कर्तुः शय्या स्वतानस्था नागदन्ताः क्षयावहाः।। इति।।१२२।।
अथ प्रवेशलक्षणमाह—
भूरिपुष्पविकरं सतोरणं तोयपूर्णकलशोपशोभितम्।
धूपगन्धबलिपूजितामरं ब्राह्मणध्वनियुतं विशेद् गृहम्।।१२३।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां वास्तुविद्या-
नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥५३॥
अतिशय पुष्पों से सुवासित, तोरण से अलंकृत, जलपूर्ण कलशों से सुशोभित,
धूप-गन्ध-पुष्प आदि द्वारा पूजित देवताओं से समन्वित एवं ब्राह्मणों द्वारा की गई
वेदध्वनियों से पवित्र किये गये गृह में गृहस्वामी को प्रवेश करना चाहिये।
यहाँ पर 'धूपगन्धबलिपूजितामरं' यह सामान्य देवता के लिये कहा गया है।
सामान्य देवताओं की पूजा अतिरिक्त स्थान में करनी चाहिये। वास्तु-मध्य में शिखी-
पर्जन्य आदि और अर्यमा की ही पूजा की जानी चाहिये। इन स्थानों पर बाहरी देवताओं
का पूजन कथमपि नहीं करना चाहिये।।१२३।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां वास्तुविद्याध्यायस्त्रिपञ्चाशत्तमः ॥५३॥
एवंविधं गृहं वेश्म विशेत् प्रविशेत्। कीदृशम् भूरिपुष्पविकरम्? बहुप्रकाराणां पुष्पाणां
कुसुमानां विकरः समूहो यत्र, तथा सतोरणं तोरणसंयुक्तं तोरणं गृहाग्रे कुर्यात्। तोयपूर्णै-
र्जलपूरितैः कलशैरूदकुम्भैरुपशोभितं भूषितम्। धूपैर्गूग्गुलप्रभृतिभिर्गन्धैः सुगन्धद्रव्यैरगुरु-
प्रभृतिभिर्बलिभिरुपहारैश्च पूजिता अर्चिता अमरा देवता यत्र, तथा ब्राह्मणध्वनियुतं ब्राह्मणानां
द्विजानां ध्वनिर्वेदशब्दस्तेन युतम्। अत्र सामान्येनोक्तं पूजितामरम्; तथापि वास्तुमध्यगता
अमराः पूजनीया न बाह्यस्थाः शिखिपर्जन्यप्रभृतयोऽर्यमाद्या वा। तन्त्रान्तरेऽप्युक्तम्—
ज्येष्ठस्य कर्मसिद्ध्यर्थं नव पञ्चगुणाः सुराः।
यतस्तत्र वसन्त्येते मूर्धाद्यङ्गेषु कृत्स्नशः।।
ततोऽपि विशिष्टा अन्येऽपि बाह्याः सुरा हिरण्यगर्भेणोक्ताः—
देवताः सम्प्रवक्ष्यामि वास्तूनामनुपूर्वशः।।
द्वारे प्रजापतिं विन्द्याद् द्वारदेशे ह्युमापतिम्।
बलदेवो यमश्चैव दक्षिणस्यां च संस्थितौ।।
स्कन्दः शेषोऽथ वरुणः पश्चिमायां दिशि स्थितः।
आदित्या वसवो रुद्रा उत्तरां दिशमाश्रिताः।।
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