बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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५३. वास्तुविद्याध्यायः | | पक्वेष्टकादारुकृतानां गृहाणां |
आगमप्रदर्शनम् | १ | भित्तिप्रमाणम् | १२
वास्तुज्ञानस्योत्पत्तिः | १ | सर्वेषां वास्तूनां द्वारप्रमाणम् | १२
राजगृहप्रमाणम् | २ | चातुर्वर्ण्यस्य द्वारप्रमाणम् | १३
सेनापतिगृहप्रमाणम् | ३ | शाखोदुम्बराणाम्पृथुत्वं स्तम्भस्याग्र- |
सचिवगृहप्रमाणम् | ३ | मूलयोः प्रमाणञ्च | १३
युवराजगृहाणां प्रमाणम् | ४ | स्तम्भादीनां नामानि | १५
सामन्तप्रवरराजपुरुषकञ्चुकिवेश्या- | | स्तम्भस्याधरोर्ध्वभागयो रचना | १५
कलाज्ञानां गृहप्रमाणम् | ४ | भारतुला-तुला-उपतुलानाञ्च |
अध्यक्षाधिकृतकर्मान्ताध्यक्षदूतानां | | प्रमाणम् | १६
गृहप्रमाणम् | ५ | सर्वतोभद्रवास्तुलक्षणम् | १६
दैवज्ञभिषक्पुरोहितानां गृहप्रमाणम् | ६ | नन्द्यावर्तवास्तुलक्षणम् | १७
गृहस्यौच्च्यप्रमाणमेकशालस्य | | वर्धमानवास्तुलक्षणम् | १८
दैर्घ्यञ्च | ६ | स्वस्तिकवास्तुलक्षणम् | १९
ब्राह्मणादिवर्णचतुष्टयस्य गृहप्रमाणम् | ७ | रुचकवास्तुलक्षणम् | १९
कोशरतिभवनयोः प्रमाणं राजपुरुषगृह- | | सर्वतोभद्रादिपञ्चचतुःशालानां |
प्रमाणञ्च | ८ | फलानि | २०
पारशवादीनां गृहप्रमाणं | | त्रिशालानां हिरण्यनामसुक्षेत्रचुल्ली- |
हीनाधिकस्य गृहस्याशुभत्वञ्च | ९ | पक्षघ्नानां लक्षणम् | २०
पञ्चाश्रमिणां धान्यायुधबहिरतिगृहाणां | | द्विशालानां सिद्धार्थयमसूर्यदण्डवाता- |
च परमतेनोच्छ्रायप्रमाणम् | ९ | ख्यचुल्लीकाचानां लक्षणं फलञ्च | २१
सेनापतिनृपद्वारेण सर्ववास्तूनां | | एकाशीतिपदस्य क्षेत्रस्य |
शालाऽलिन्दयोः प्रमाणम् | ९ | विभागप्रदर्शनम् | २६
चातुर्वर्ण्यस्य शालालिन्दयोः | | बाह्यकोष्ठस्थितानां द्वात्रिंशद्देवानां |
प्रमाणम् | १० | नामानि | २६
वीथिकाप्रमाणान्तदुपलक्षितानाञ्च | | अभ्यन्तरस्थितानां त्रयोदशदेवानां |
वास्तूनां नामानि | ११ | नामानि | २७
समस्तवास्तुनि भूमिकाप्रमाणम् | ११ | स्थितदेवानां पदसङ्ख्या | २८
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