बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
DevanagariHindipublished760 पृष्ठ
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वास्तुविद्याध्यायः १७
सर्वतोभद्रम्
पूर्वा
शाला
अथ नन्द्यावर्तस्य लक्षणमाह—
नन्द्यावर्तमलिन्दैः शालाकुड्यात् प्रदक्षिणान्तगतैः ।
द्वारं पश्चिममस्मिन् विहाय शेषाणि कार्याणि ॥३२॥
जिस वास्तु में शाला की भीत से आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रम से अलिन्द हो, उसको
‘नन्द्यावर्त्त’ वास्तु कहते हैं। इसमें पश्चिम दिशा को छोड़ कर शेष तीन दिशाओं में तीन
द्वार रहते हैं॥३२॥
नन्द्यावर्तम्
पूर्वा
शाला
बृ० भ० द्वि०-२
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