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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 760 में से

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पृष्ठ 425

शाकुनाध्यायः ३९७
दिन में पूर्वोक्त कर्म आदि करना हो तो वहाँ पर कुरङ्ग, रुरु (मृगजाति) और
वानर को; पूर्वाह्न में चाष, वञ्जुल और मुर्गा को तथा रात्रि के अन्त भाग में नप्तृक, उल्लू
और पिङ्गला को यात्रा की तरह ग्रहण करना चाहिये; किन्तु स्त्रियों के लिये उपर्युक्त
समस्त शकुन विपरीतक्रम से ग्रहण करना चाहिये॥४८-४९॥
दिवा प्रस्थानवदिति। कर्मादिषु दिवा दिवसे। कुरङ्गरुरुवानराः, कुरङ्गो हरिणः,
रुरुर्मृगजातिः, वानरः कपिः, एते प्रस्थानवद् ग्राह्याः। यथा प्रस्थाने यात्रायां गृह्यते तथात्रापि।
अह्नो दिवसस्य प्रथमे भागे चाषवञ्जुलकुक्कुटाः सर्व एते पक्षिणः प्रस्थानवद् ग्राह्याः।
शर्वरी रात्रिः, तस्याः पश्चिमेऽन्त्ये भागे। नप्तृका उलूका पिङ्गला एते सर्व एव
पक्षिणः। पिङ्गलोलूकचेटिका, एते प्रस्थानवद् ग्राह्याः। योषितां स्त्रीणां केवलानां सार्थेषु
सर्व एव विपर्यस्ता विपरीतगता ग्राह्याः। यात्रायां कर्मसङ्गमादिष्वपि सर्वत्र विपरीता
ग्राह्या इति॥४८-४९॥
अन्यदप्याह—
नृपसन्दर्शने ग्राह्यः प्रवेशेऽपि प्रयाणवत्।
गिर्यरण्यप्रवेशेषु नदीनां चावगाहने॥५०॥
वामदक्षिणगौ शस्तौ यौ तु तावग्रपृष्ठगौ।
यात्रा में जो वाम और दक्षिणगत शकुन शुभ हैं, वे राजा के दर्शन, गृहप्रवेश आदि,
पर्वतप्रवेश, वनप्रवेश और नदी के पार होने में क्रम से आगे और पीछे में शुभ होते हैं।
जैसे—यात्रा में जो वाम में शुभ हैं, वे यहाँ पर आगे में और यात्रा में जो दक्षिण में शुभ
हैं, वे यहाँ पर पीछे में शुभ होते हैं॥५०-१/२॥
नृपो राजा तस्य सन्दर्शनेऽवलोकने। यद्यपि प्रवेशो राजगृहे भवति, तथापि प्रयाणवद्
ग्राह्यः। एवं यद्यपि प्रवेशस्तथापि तस्मिन् प्रयाणवद् ग्राह्यः। उक्तं च—
केचिज्जगुर्गमनवन्नृपदर्शनेषु -------------------------। इति।
गिरिप्रवेशे पर्वतप्रवेशे। अरण्यप्रवेशे अटव्याम्। नदीनां सरितामेवावगाहने उत्तरणे।
यौ शकुनौ यात्रायां वामदक्षिणगौ शस्तौ तावग्रपृष्ठगाविति प्रवेशादिशि शस्तौ।
यात्रायां ये वामतः शस्तास्तेऽत्राग्रतः पुरतः। यात्रायां ये दक्षिणतस्तेऽत्र पृष्ठत इति॥५०॥
अथान्येष्व्वाह—
क्रियादीप्तौ विनाशाय यातुः परिघसंज्ञितौ॥५१॥
तावेव तु यथाभागं प्रशान्तरुतचेष्टितौ।
शकुनौ शकुनद्वारसंज्ञितावर्थसिद्धये॥५२॥
क्रियादीप्ति में गमन करने वाले के दोनों पार्श्व में शकुन दिखाई दे तो 'परिघ'संज्ञक
शकुन होता है। परिघसंज्ञक शकुन होने पर गमन करने वाले का नाश होता है; किन्तु वे
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