बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दन्तकाष्ठलक्षणाध्यायः
अथ दन्तकाष्ठलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव प्रयोजनप्रदर्शनार्थमाह—
वल्लीलतागुल्मतरुप्रभेदैः स्युर्दन्तकाष्ठानि सहस्रशो यैः ।
फलानि वाच्यान्यथ तत्प्रसङ्गो मा भूदतो वच्म्यथ कामिकानि ॥१॥
वल्ली, लता, गुल्म और वृक्षों के भेद से हजारों प्रकार के दतवन ( दातुन ) होते
हैं। जिनसे फल कहे जाते हैं, उनके प्रसंग को अधिक न बढ़ाकर केवल अभीष्ट फल
देने वाले दतवन को कहते हैं।।१।।
वल्ल्यः प्रसिद्धाः। लताश्च प्रसिद्धा एव। गुल्म एकमूलः शाखासमूहः। तरवो वृक्षाः।
एतेषां ये प्रभेदाः पृथक्पृथग् जातयस्तैः सहस्रशः सहस्रप्रकारैर्दन्तकाष्ठानि स्युर्भवेयुः।
यैः फलानि वाच्यानि वक्तव्यानि। अथ तत्प्रसङ्गो मा भूत् तेषां दन्तकाष्ठानामतिप्रसङ्गो-
ऽत्यासक्तिर्विस्तरेण मा भूत्। अतोऽस्माद्धेतोः कामिकान्यभीष्टफलप्रदानि वच्मि कथयामि।
अथशब्दः पादपूरणे।।१।।
अथ परिभाषार्थमाह—
अज्ञातपूर्वाणि न दन्तकाष्ठान्यद्यान्न पत्रैश्च समन्वितानि ।
न युग्मपर्वाणि न पाटितानि न चोर्ध्वशुष्काणि विना त्वचा च ॥२॥
अपरिचित पत्तों से युत, युग्म ( दो आदि ) पर्वों से युत, फटा हुआ, वृक्ष पर ही
सूखा हुआ या त्वचा से रहित दतवन नहीं करना चाहिये।।२।।
न ज्ञातं पूर्वं येषां तानि दन्तकाष्ठानि नाद्यान्न भक्षयेत्। पत्रैश्च समन्वितानि युक्तानि
नाद्याद् न भक्षयेत्। न युग्मपर्वाणि युग्मग्रन्थिभिर्युक्तानि नाद्यात्। पाटितानि दलितानि नाद्यात्।
न चोर्ध्वशुष्काणि ऊर्ध्वमुपरिभागं शुष्कं येषां तानि नाद्यात्। विना त्वचा च त्वग्रहितानि
नाद्यात्।।२।।
अथ प्रविभागेन फलान्याह—
वैकङ्कतश्रीफलकाश्मरीषु ब्राह्मी द्युतिः क्षेमतरौ सुदाराः ।
वृद्धिर्वटेऽर्के प्रचुरं च तेजः पुत्रा मधूके सगुणाः प्रियत्वम् ॥३॥
वैकङ्कत, नारियल और काश्मरी ( गम्भारी ) वृक्ष का दन्तधावन करने से ब्राह्मी
द्युति का लाभ, क्षेम वृक्ष का दन्तधावन करने से उत्तम स्त्री का लाभ, वटवृक्ष का
दन्तधावन करने से धन की वृद्धि, आक के वृक्ष का दन्तधावन करने से बहुत तेजलाभ,
महुये के वृक्ष का दन्तधावन करने से पुत्रलाभ और अर्जुन वृक्ष का दन्तधावन करने से
जनों के प्रियत्व का लाभ होता है।।३।।
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