बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥
वराहमिहिरकृता
बृहत्संहिता
‘भट्टोत्पलविवृति’समन्वित‘विमला’हिन्दीव्याख्यायुता
( उत्तरार्द्धा )
अथ वास्तुविद्याध्यायः
अथ वास्तुविद्या व्याख्यायते। तत्रादावेवागमप्रदर्शनार्थमाह—
वास्तुज्ञानमथातः कमलभवान्मुनिपरम्परायातम्।
क्रियतेऽधुना मयेदं विदग्धसांवत्सरप्रीत्यै ॥१॥
❁ विमला ❁
अब इसके बाद ब्रह्माजी के पास से मुनिपरम्परागत इस वास्तुज्ञान को चतुर दैवज्ञों
की प्रसन्नता के लिये मैं कहता हूँ॥१॥
❁ भट्टोत्पलविवृति ❁
अथानन्तरमतोऽस्मात् पिटकलक्षणादधुना इदानीं विदग्धसांवत्सराणां पण्डितदैवज्ञानां
प्रीत्यै प्रीत्यर्थं वास्तुज्ञानं मया क्रियते। अथवा विदग्धसांवत्सरप्रीत्या हेतुभूतया। कीदृशम्?
कमलभवाद् ब्रह्मणः सकाशाद् मुनीनां गर्गादीनां यत् पारम्पर्येण यातं प्राप्तमिति॥१॥
अथ वास्तुज्ञानस्योत्पत्तिप्रदर्शनार्थं श्लोकद्वयमाह—
किमपि किल भूतमभवद्रुन्धानं रोदसी शरीरेण।
तदमरगणेन सहसा विनिगृह्याधोमुखं न्यस्तम् ॥२॥
यत्र च येन गृहीतं विबुधेनाधिष्ठितः स तत्रैव।
तदमरमयं विधाता वास्तुनरं कल्पयामास ॥३॥
प्राचीन काल में अपने शरीर से पृथ्वी और आकाश को आच्छादित करने वाला
कोई अपरिचित व्यक्ति उत्पन्न हुआ। उसको सहसा देवताओं ने पकड़कर नीचे मुख
करके पृथ्वी पर स्थापित कर दिया। उस समय उस अपरिचित पुरुष के जिस अङ्ग को
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