बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुरुषलक्षणोध्यायः २१९
के समान हो तो विद्वान् तथा शंख, छत्र, पालकी, हाथी, घोड़ा और कमल के समान
रेखा हो तो राजा होता है। यदि कलश, मृणाल ( कमल की जड़ ), पताका या अंकुश
के समान हाथ में रेखा हो तो वह व्यक्ति भूमि में धन गाड़ने वाला होता है। रस्सी की
तरह हाथ में रेखा हो तो अति धनी और स्वस्तिक ( राजगृह-समान ) की रेखा हो तो
ऐश्वर्यशाली होता है। यदि चक्र, खड्ग, फरशा, तोमर, बर्छी, धनुष या भाला के समान
हाथ में रेखा हो तो सेनापति और ऊखल के समान हो तो याज्ञिक होता है। मकर
( मगर = घड़ियाल ), ध्वजा और कोष्ठागार की तरह हाथ में रेखा हो तो बहुत धनी
तथा वेदी की तरह जिसका ब्रह्मतीर्थ ( अंगुष्ठमूल ) हो वह पुरुष अग्निहोत्री होता है।
वापी, देवमन्दिर आदि ( सिंहासन, श्रीवृक्ष और यूप ) या त्रिभुज की तरह हाथ में रेखा
हो तो वह मनुष्य धार्मिक होता है। मनुष्य के अंगुष्ठमूल में जितनी स्थूल रेखायें हों,
उतने उसके पुत्र और जितनी सूक्ष्म रेखायें हों, उतनी उसकी कन्यायें होती हैं। जिनकी
तर्जनी के मूल तक तीन रेखा गई हो, वे सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं। यदि छोटी रेखा
हो तो अनुपात से आयु की कल्पना करनी चाहिये। जिनके हाथ में टूटी हुई रेखा हो, वे
वृक्ष से गिरते हैं। अधिक रेखायुत या रेखारहित व्यक्ति निर्धन होते हैं।।४४-५०।।
तिस्रो रेखा इति । मणिबन्धनोत्थितास्तिस्रो रेखाः करतलोपगाः करतले हस्ततले
उपगाः प्राप्ता नृपते राज्ञो भवन्ति। मीनयुगेन मत्स्यद्वयेनाङ्कितश्चिह्नितः पाणिर्हस्तो यस्य
स नित्यं सर्वकालं सत्रप्रदो भवति, मषकृद्भवतीत्यर्थः।
वज्रं मध्यक्षाममुभयाग्रविस्तृतम्, तदाकारास्तत्सदृश्यः करतले रेखा धनिनामीश्वराणां
भवन्ति। मीनपुच्छनिभा मत्स्यपुच्छाकारा विद्याभाजां भवन्ति। विद्यावन्तश्च ते भवन्तीत्यर्थः।
शङ्खः प्रसिद्धः, आतपत्रं छत्रम्, शिविका युग्यादिकम्, गजो हस्ती, अश्वस्तुरगः, पद्मं
कमलम्, एषामुपमास्तदाकारा रेखा नृपते राज्ञो भवन्ति।
कलशः कुम्भः, मृणालं विसं स्पष्टं मध्याद् मध्याद् ग्रन्थियुक्तम्। पताका वैजयन्ती,
अङ्कुशः प्रसिद्धः। एषामुपमाभिस्तदाकाराभिर्लेखाभिर्निधिपाला भूमावस्थापनशीला भवन्ति।
अतिधनिनश्च। दामनिभाभी रज्ज्वाभाभिश्चाढ्या ईश्वरा भवन्ति, स्वस्तिकश्चिह्नविशेषस्तद्रूपा-
भिस्तदाकाराभिरैश्वर्यं भवति।
चक्रमायुधम्, असिः खड्गः, परशुरायुधविशेषः कुठारः, तोमरः प्रसिद्धः, शक्तिः
प्रसिद्धा, धनुश्चापम्, कुन्त आयुधविशेषः। एषां सन्निभास्तदाकारा रेखाः करतलोपगाश्चमूनाथं
सेनापतिं कुर्वन्ति। उलूखलाकारा रेखा यज्वानं याज्ञिकं कुर्वन्ति।
मकरो जलप्राणी। ध्वजश्चिह्नम्। विचित्रपटनिर्मितत्वाद्वैचित्र्यमस्य भवति पताकातः।
कोष्ठागारं प्रसिद्धमेव। एषां सन्निभाभिः सदृशीभी रेखाभिर्महाधनोपेता अतिधनिनः। मणिबन्ध-
नस्योपरि ब्रह्मतीर्थमङ्गुष्ठमूले। ब्रह्मतीर्थेन अङ्गुष्ठमूलतीर्थेन वेदिनिभेन वेद्याकृतिना अग्निहोत्रिणो
यजमाना भवन्ति।
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