बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः
जन्मस्थशुक्रफलं विलासिनी- | | बुधफलप्रदानसमयः उपगीत्या- |
लक्षणञ्च | ५९६ | ऽऽर्यालक्षणञ्च | ६०७
द्वितीयस्थशुक्रफलं वसन्त- | | गुरुगोचरफलोपदेश आर्यालक्षणञ्च | ६०८
तिलकालक्षणञ्च | ५९६ | शुभाशुभग्रहयोरन्योन्यदर्शनात्तयोः |
तृतीयचतुर्थस्थशुक्रफलमिन्द्र- | | निष्फलत्वं नर्कुटकलक्षणञ्च | ६०९
वज्रालक्षणञ्च | ५९७ | विबलग्रहस्य शुभगोचरफले नैष्फल्यं |
पञ्चमस्थशुक्रफलमनवसिता- | | विलासलक्षणञ्च | ६१०
लक्षणञ्च | ५९८ | आर्यासमगाथाप्रदर्शनम् | ६१०
षष्ठसप्तमाष्टमस्थशुक्रफलं | | अस्तमितशनेरतिशयेनाशुभफलं |
लक्ष्मीलक्षणञ्च | ५९८ | पथ्यालक्षणञ्च | ६१२
नवमदशमस्थशुक्रफलं | | ग्रहयुक्तचन्द्रस्य विशेषफलं |
प्रमिताक्षरालक्षणञ्च | ५९९ | वक्त्रलक्षणञ्च | ६१३
एकादशद्वादशस्थशुक्रफलं | | दुःस्थितग्रहनरस्य लघुताप्रदर्शनं |
स्थिरलक्षणञ्च | ५९९ | श्लोकलक्षणञ्च | ६१३
जन्मस्थशनिफलं तोटकलक्षणञ्च | ६०० | सुस्थितग्रहपुरुषस्य सुस्थितत्व- |
द्वितीयस्थशनिफलं वंशपत्र- | | मनुष्टुब्लक्षणञ्च | ६१४
पतितलक्षणञ्च | ६०० | असुस्थिते ग्रहे क्रियमाणं कर्म |
तृतीयस्थशनिफलं ललितालक्षणञ्च | ६०१ | कर्तुः घातकः वैतालीयलक्षणञ्च | ६१४
चतुर्थस्थशनिफलं भुजङ्ग- | | सुस्थिते ग्रहे स्वल्पायासेन कार्य- |
प्रयातलक्षणञ्च | ६०२ | सिद्धिरौपच्छन्दसिकलक्षणञ्च | ६१५
पञ्चमषष्ठस्थशनिफलं पुटालक्षणञ्च | ६०२ | आदित्यवासरे विहितकर्माणि |
सप्तमाष्टमनवमस्थशनिफलं | | दण्डकपादलक्षणञ्च | ६१६
वैश्वदेवीलक्षणञ्च | ६०३ | चन्द्रवासरे विहितकर्माणि |
दशमैकादशद्वादशस्थशनिफल- | | दण्डकद्वितीयपादलक्षणञ्च | ६१७
मूर्म्मिमालालक्षणञ्च | ६०३ | भौमवासरे विहितकर्माणि दण्डक- |
मनुष्येषु गोचरफलभेदकारणं | | तृतीयपादलक्षणञ्च | ६१७
वितानलक्षणञ्च | ६०४ | सौम्यवासरे विहितकर्माणि दण्डक- |
अशुभस्थानस्थितग्रहपूजनं | | तुर्यपादलक्षणञ्च | ६१९
भुजङ्गविजृम्भितलक्षणञ्च | ६०५ | गुरुवासरे विहितकर्माणि वर्ण- |
ग्रहपूजाप्रशंसा उद्गतालक्षणञ्च | ६०६ | दण्डकलक्षणञ्च | ६२१
रविभौमचन्द्रशनिफलप्रदानसमयः | | शुक्रवासरे विहितकर्माणि समुद्र- |
गीत्युपगीतिलक्षणञ्च | ६०७ | दण्डकप्रथमाङ्घ्रिलक्षणञ्च | ६२३