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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

१४४ बृहत्संहिता
नाभीमध्येन मध्यभागे परिणाहश्चत्वारिंशद्द्वियुता द्वाचत्वारिंशदङ्गुलानि। स्तनयोर्द्वयोरन्तरं
मध्यं षोडशाङ्गुलानि। स्तनयोरूर्ध्वं तिर्यक् कृत्वा षडङ्गुलिके षडङ्गुलप्रमाणे कक्ष्ये कार्ये।
अन्यदप्याह—
अष्टावंसौ द्वादश बाहू कार्यों तथा प्रबाहू च।
बाहू षड्विस्तीर्णौ प्रतिबाहू त्वङ्गुलचतुष्कम्॥२५॥
गरदन से लेकर दोनों कन्धों की लम्बाई आठ अंगुल तथा बारह अंगुल बाहु और
प्रबाहु (बाहु के समीपवर्ती बाहु) बनानी चाहिये। बाहु का विस्तार छः अंगुल और
प्रबाहु का विस्तार चार अंगुल बनाना चाहिये॥२५॥
अंसौ स्कन्धौ ग्रीवापार्श्वदंसान्तं यावदष्टाङ्गुलं विस्तीर्णं कार्यम्। अंससमीपवर्तिनौ
बाहू द्वादशाङ्गुलानि दीर्घौ कार्यों। बाहुसमीपवर्तिनौ प्रतिबाहू तावेव द्वादशाङ्गुलानि दीर्घौ
कार्यों। बाहू षडङ्गुलानि विस्तीर्णौ, प्रतिबाहू त्वङ्गुलचतुष्कं विस्तीर्णौ॥२५॥
अन्यदप्याह—
षोडश बाहू मूले परिणाहाद् द्वादशाग्रहस्ते च।
विस्तारेण करतलं षडङ्गुलं सप्त दैर्घ्येण॥२६॥
बाहुमूल की मोटाई सोलह अंगुल, प्रकोष्ठ की मोटाई बारह अंगुल, हथेली की
चौड़ाई छः अंगुल और लम्बाई सात अंगुल बनानी चाहिये॥२६॥
बाहू मूले षोडशाङ्गुलानि परिणाहात्। अग्रहस्ते च प्रकोष्ठप्रदेशे द्वादशाङ्गुलानि परिणाहः।
करतलं हस्ततलं विस्तारेण षडङ्गुलं कार्यं दैर्घ्येणायामेन सप्ताङ्गुलानि॥२६॥
अन्यदप्याह—
पञ्चाङ्गुलानि मध्या प्रदेशिनी मध्यपर्वदलहीना।
अनया तुल्या चानामिका कनिष्ठा तु पर्वोना॥२७॥
मध्यमा पाँच अंगुल, प्रदेशिनी और अनामिका पर्व के आधे से रहित पाँच अंगुल
और कनिष्ठिका एक पर्व से रहित पाँच अंगुल लम्बी होती है॥२७॥
अङ्गुष्ठादनन्तरं या अङ्गुली सा मध्यमायाः पर्वदलेन पर्वणोऽर्धेन हीना कार्या। सार्धानि
चत्वार्यङ्गुलानि पूर्वरेखायाः प्रभृतिद्वितीयां रेखां यावत् पर्वोच्यते। अनया प्रदेशिन्या चाना-
मिका कार्या। तस्या अनामिकायाः पर्वोना कनिष्ठिका कार्या॥२७॥
अन्यदप्याह—
पर्वद्वयमङ्गुष्ठः शेषाङ्गुल्यस्त्रिभिस्त्रिभिः कार्याः।
नखपरिमाणं कार्यं सर्वासां पर्वणोऽर्धेन॥२८॥
अंगूठे में दो पर्व एवं शेष चार अंगुलियों में तीन-तीन पर्व बनाने चाहिये तथा
अपने-अपने पर्व के आधे के तुल्य नखों का परिमाण बनाना चाहिये॥२८॥
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