सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

७४ बृहत्संहिता
जितनी लम्बाई हो, वह एक पुरुषप्रमाण ( १२० अंगुल ) यहाँ पर ग्रहण करना चाहिये।
इस खात में पश्चिमा शिरा बहती है। यहाँ पर खोदने के समय कुछ चिह्न निकलते हैं;
जैसे—आधा पुरुषप्रमाणतुल्य खोदने पर पाण्डु वर्ण का मेढ़क, उसके नीचे पीली मिट्टी,
उसके नीचे पत्थर और पत्थर के नीचे जल मिलता है॥६-७॥
अम्बुरहिते जलवर्जिते देशे यत्र स्वभावत एव जलं न विद्यते, तत्र देशे जाङ्गले यदि
वेतसो वेतसवृक्षो दृश्यते ततस्तस्माद्वेतसवृक्षात् त्रिभिर्हस्तैः करैः पश्चात् पश्चिमायां दिशि
सार्धे पुरुषे खाते अधस्तोयं वक्तव्यम्। पुरुषशब्देनात्रोर्ध्वबाहुः पुरुषो ज्ञेयः। स च विंशत्य-
धिकमङ्गुलशतं भवतीति सर्वत्र परिभाषा। ततश्च तस्मिन् खाते पश्चिमा शिरा वहति।
अर्धपुरुषे खाते चिह्नम्। किं तत्? मण्डूको भेकः पाण्डुरः पाण्डुरवर्ण ईषच्छ्वेतः।
तथानन्तरं पीता पीतवर्णा मृन्मृत्तिका। ततस्तस्मिन् खाते पुटभेदकः पाषाणो भवति।
पुटैर्भिद्यत इति पुटभेदस्तदधस्तोयं जलं भवति। तथा च सारस्वतः—
निर्जले वेतसं दृष्ट्वा तस्माद्वृक्षादपि त्रयम्।
पश्चिमायां दिशि ज्ञेयमधः सार्धेन वै जलम्॥
नरोऽत्र षष्टिर्द्विगुणा चाङ्गुलानां प्रकीर्तितः।
तत्र खात्वाऽर्धपुरुषं भेकः पाण्डुरवर्णकः॥
मृत् पीता पुटभेदश्च पाषाणोऽधस्ततो जलम्।
शिरा पश्चिमदिक्स्थात्र वहतीति विनिर्दिशेत्॥ इति॥६-७॥
अन्यदप्याह—
जम्ब्वाश्चोदग्घस्तैस्त्रिभिः शिराधो नरद्वये पूर्वा।
मृल्लोहगन्धिका पाण्डुरा च पुरुषेऽत्र मण्डूकः ॥८॥
यदि जलरहित देश में जामुन का वृक्ष हो तो उससे तीन हाथ उत्तर दिशा में दो
पुरुषतुल्य नीचे पूर्व शिरा होती है। वहाँ पर भी खोदने के समय में कुछ चिह्न निकलते
हैं; जैसे—एक पुरुषप्रमाणतुल्य नीचे लोहे के समान गन्ध वाली मिट्टी, उसके नीचे
कुछ सफेद मिट्टी और उसके नीचे मेढ़क निकलता है॥८॥
अम्बुरहिते देशे यदि जम्बूवृक्षो दृश्यते, तदा तस्माज्जम्बूवृक्षादुदगुत्तरस्यां दिशि
त्रिभिर्हस्तैः करैरनन्तरमधो नरद्वये खाते पूर्वा शिरा वहति। अत्रापि चिह्नानि भवन्ति। अत्र
पुरुषे खाते मृन्मृत्तिका लोहगन्धिका लोहसदृशगन्धा भवति। ततः परं पाण्डुरा ईषच्छुक्ला
ततो मण्डूको भेक इति॥८॥
अन्यदप्याह--
जम्बूवृक्षस्य प्राग्वल्मीको यदि भवेत् समीपस्थः।
तस्माद्दक्षिणपार्श्वे सलिलं पुरुषद्वये स्वादु ॥९॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA