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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 760 में से

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पृष्ठ 100

अथ दकार्गलाध्यायः
अथ दकार्गलं व्याख्यायते। तत्रादावेव प्रयोजनप्रदर्शनार्थमाह—
धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं दकार्गलं येन जलोपलब्धिः।
पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनम्नसंस्थाः ॥१॥
एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्च्युतं नभस्तो वसुधाविशेषात्।
नानारसं बहुवर्णतां च गतं परीक्ष्यं क्षितितुल्यमेव ॥२॥
वास्तुविद्या का वर्णन करने के पश्चात् अब जिसका ज्ञान होने पर भूमिगत जल का
ज्ञान प्राप्त होता है, उस धर्म और यश को देने वाले 'दकार्गल' को कहते हैं। जिस तरह
मनुष्यों के अङ्ग में नाड़ियां होती हैं, उसी तरह भूमि में भी ऊँची-नीची शिरायें होती हैं।
आकाश से केवल एक स्वाद वाला जल पृथ्वी पर गिरता है; किन्तु वही जल पृथ्वी की
विशेषता से तत्तत् स्थानों में अनेक प्रकार के रस और स्वाद वाला हो जाता है। इस
तरह भूमि के वर्ण और रस के समान ही जल के भी रस और वर्ण सिद्ध होते हैं; अतः
भूमि, वर्ण और रस का परीक्षण-पूर्वक जल के रस और स्वाद का परीक्षण करना
चाहिये॥१-२॥
अतोऽस्माद्वास्तुविद्याप्रकरणादनन्तरमहं वराहमिहिरो दकार्गलं वदामि कथयामि।
कीदृशम्? धर्म्यं यशस्यं च, धर्मं चाऽऽवहति यशश्चाऽऽवहति ददातीत्यर्थः। दकार्गलं
किमुच्यते? अत आह—येन जलोपलब्धिः, जलस्योदकस्योपलब्धिरुपलम्भनं प्राप्तिः।
यथा येन प्रकारेण पुंसां पुरुषाणामङ्गेष्ववयवेषु शिरा नाड्यः प्रोन्नतनम्नसंस्था अधरोत्तरभावेन,
तथा तेन प्रकारेण क्षितौ भूमावप्यधरोत्तरभावेन प्रोन्नतनम्नसंस्थिताः, अन्याः प्रोन्नता उच्चा
अन्याश्च निम्नाः स्थिताः।
एकेन वर्णेनेति। अम्भो जलं नभस्त आकाशाच्च्युतं पतितमेकेन वर्णेनैकेन च
स्वादेन वसुधाविशेषाद्भुवो नानाप्रकारत्वाद् नानारसत्वं बहुस्वादुवर्णतां च गतं विचित्रवर्णत्वं
प्राप्तमेवानेन प्रकारेण क्षितितुल्यं भूमिवर्णतुल्यं परीक्ष्यं विचार्यम्, नानारसवर्णत्वेनेति।
तथा च वक्ष्यति—
सशर्करा ताम्रमही कषायं क्षारं धरित्री कपिला करोति।
आपाण्डुरायां लवणं प्रदिष्टमिष्टं पयो नीलवसुन्धरायाम्।। इति।।२।।
अथ शिरानामान्याह—
पुरुहूतानलयमनिर्ऋतिवरुणपवनेन्दुशङ्करा देवाः।
विज्ञातव्याः क्रमशः प्राच्याद्यानां दिशां पतयः ॥३॥
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