बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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अथ परिघपरिधिदण्डामोघरश्मिरोहितेरावतानां लक्षणमाह—
परिघ इति मेघरेखा या तिर्यग्भास्करोदयेऽस्ते वा ।
परिधिंस्तु प्रतिसूर्यो दण्डस्त्वृजुरिन्द्रचापनिभः ॥१९॥
उदयेऽस्ते वा भानोर्ये दीर्घा रश्मयस्त्वमोघास्ते ।
सुरचापखण्डमृजु यद्रोहितमैरावतं दीर्घम् ॥२०॥
सूर्य के उदय या अस्त समय में तिरछी मेघ की रेखा 'परिघ' संज्ञक, प्रतिसूर्य
'परिधि' संज्ञक और स्पष्ट इन्द्रधनुष के समान रेखा 'दण्ड' संज्ञक होती है तथा उदय या
अस्त समय में सूर्य के लम्बे किरण 'अमोघ' संज्ञक, स्पष्ट इन्द्रधनुष के खण्ड 'रोहित'
संज्ञक और लम्बे सीधे इन्द्रधनुष 'ऐरावत' संज्ञक होते हैं॥१९-२०॥
भास्करस्यादित्यस्योदये अस्तमये वा तिर्यग् या स्थिता मेघरेखा भवति, स परिघ
इति परिघसंज्ञः। तथा प्रतिसूर्यः परिधिसंज्ञः। इन्द्रचापनिभः शक्रधनुःसदृशः ऋजुः स्पष्टो
दण्डसंज्ञः।
उदयेऽस्ते वेति। भानोरादित्यस्योदयेऽस्तमये वा ये दीर्घा आयामिनो रश्मयः किरणास्ते
त्वमोघाख्या अमोघसंज्ञाः। सुरचापखण्डमिन्द्रधनुःखण्डं यदृजु स्पष्टं तद्रोहितसंज्ञम्।
तदेव यदि दीर्घं भवति तदैरावतसंज्ञं ज्ञेयम्॥१९-२०॥
अथ सन्ध्यालक्षणमाह—
अर्धास्तमयात् सन्ध्या व्यक्तीभूता न तारका यावत् ।
तेजःपरिहानिमुखाद्भानोरर्धोदयो यावत् ॥२१॥
तस्मिन् सन्ध्याकाले चिह्नैरैतैः शुभाशुभं वाच्यम् ।
सर्वैरैतैः स्निग्धैः सद्यो वर्षं भयं रूक्षैः ॥२२॥
अर्धास्त सूर्यबिम्ब के अनन्तर स्पष्ट रूप से ताराओं को दिखाई देने तक पश्चिमा
सन्ध्या और ताराओं के प्रकाशहानि के समय से अर्धोदित सूर्यबिम्ब काल तक प्राक्
सन्ध्या होती है। इस सन्ध्या समय में वक्ष्यमाण चिह्नों के द्वारा शुभाशुभ फल कहना चाहिये,
जैसे कि समस्त आकाशस्थित बिम्बगण स्निग्ध हों तो शीघ्र वर्षा और रूखे हों तो भय
उत्पन्न होता है॥२१-२२॥
भानोरादित्यस्यार्धास्तमयादारभ्य यावत्तारका नभसि न व्यक्तीभूता न परिस्फुटाः,
तावदपरा सन्ध्या। तथा तारकाणां तेजःपरिहानिमुखाद्दीप्तिनिवृत्तेरारभ्य यावद् भानोरर्कस्या-
र्धोदयस्तावत् पूर्वा सन्ध्या।
तस्मिन् यथोद्दिष्टे सन्ध्यासमये एतैः प्रागुक्तैश्चिह्नैर्वक्ष्यमाणैश्च शुभाशुभं फलं वाच्यं
वक्तव्यम्। एतैस्तथा वक्ष्यमाणैश्च चिह्नैः सर्वैः स्निग्धैः सस्नेहैः सद्यस्तस्मिन्नहनि वर्षं
ज्ञेयम्। तस्मिन्नेवाहनि वर्षति। तैरेव रूक्षैः सद्यो भयमिति॥२१-२२॥
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