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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 591

मयूरचित्रकाध्यायः ५४९
यदि सूर्य को छोड़ कर अन्य ( चन्द्रादि ) ग्रह कृत्तिका, मघा, रोहिणी, श्रवणा या
ज्येष्ठा नक्षत्र को पीड़ित ( दक्षिण मार्ग में गमन या योगतारा के भेदन से पीड़ित ) करते
हों तो अन्याय से पश्चिम दिशा पीड़ित होती है।।६।।
सूर्यमादित्यं प्रोज्झ्य वर्जयित्वा अपरे सर्वे चन्द्रादयो ग्रहा यदा कृत्तिका, मघा,
रोहिणी, श्रवणम्, ऐन्द्रं ज्येष्ठा, एतानि नक्षत्राणि पीडयन्ति दक्षिणमार्गगमनेन योगतारका-
च्छादनेन भेदनेन वा। तदा पश्चिमा दिक् अपराशा अनयेनानीत्या पीड्यते। तथा च
गर्गेणोच्यते—
वैष्णवं पित्रमाग्नेयं ज्येष्ठामपि च रोहिणीम्।
पीडयन्ति यदैतानि राहुषष्ठानुचारिणः।।
दुर्भिक्षं जायते लोके सस्यमत्र न रोहति।
शुष्यन्ति सरितः सर्वाः पर्जन्यश्च न वर्षति।। इति।।६।।
अन्यदप्याह—
प्राच्यां चेद् ध्वजवदवस्थिता दिनान्ते
प्राच्यानां भवति हि विग्रहो नृपाणाम्।
मध्ये चेद् भवति हि मध्यदेशपीडा
रूक्षैस्तैर्न तु रुचिमन्मयूखवद्भिः ॥७॥
यदि सन्ध्या समय में चन्द्र आदि ग्रह ध्वज की तरह पूर्व दिशा में दिखाई दें तो पूर्व
दिशा में स्थित राजाओं में परस्पर विग्रह होता है तथा आकाश-मध्य में स्थित हों तो
मध्य देश में पीडा होती है। पर इन चन्द्र आदि ग्रहों के रूखे रहने पर ही यह फल प्राप्त
होता है। यदि निर्मल सुन्दर किरण वाले हों तो नहीं अर्थात् पूर्व दिशा या मध्य देश को
पीड़ित नहीं करते हैं।।७।।
एत एव चन्द्रादयो ग्रहा दिनान्ते अस्तमयकाले प्राच्यां पूर्वस्यां दिशि ध्वजवत्प-
ताकासंस्थानेनावस्थिता यदि भवन्ति, तदा प्राच्यानां प्राग्देशवर्तिनां नृपाणां राज्ञां विग्रहो
भवति परस्परं द्वेषः। अथ यदि मध्ये नभोमध्ये ध्वजवदवस्थिता भवन्ति, तदा मध्यदेशपीडा
भवति। किं सर्वदा? न, इत्याह—रूक्षैस्तैः। तैर्ग्रहै रूक्षैः कलुषैः स्वल्पविम्बैर्यदुक्तं तदेव
भवति प्राच्यानां नृपाणां विग्रहस्तथा मध्यदेशपीडा, न तु रुचिमन्मयूखवद्भिः, रुचिमद्भि-
र्दीप्तिमद्भिर्मयूखवद्भिः स्फुटरश्मिवद्भिश्च न भवति।।७।।
अन्यदप्याह—
दक्षिणां ककुभमाश्रितस्तु तैर्दक्षिणापथपयोमुचां क्षयः।
हीनरूक्षतनुभिश्च विग्रहः स्थूलदेहकिरणान्वितैः शुभम् ॥८॥
यदि चन्द्र आदि ग्रह दक्षिण दिशा में स्थित हों तो दक्षिण दिशा में मेघों का नाश
करते हैं। यदि ये ग्रह अल्प विम्ब वाले और रूक्ष हों तो विग्रह तथा स्थूल बिम्ब वाले
किरणयुक्त हों तो शुभ होता है।।८।।
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