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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 525

लकड़ी लाने के समय गाड़ी का आरा टूट जाय तो सेनाओं में भेद, नेमि ( हाल )
टूट जाय तो सेनाओं का नाश, अक्ष ( धुरा ) टूट जाय तो धन का नाश और अणि
( कुलावा ) टूट जाय तो बढ़ई का नाश होता है।।२२।।
अरं चक्रस्य मध्यवर्ति काष्ठम्। तस्य भङ्गे बलस्य सैन्यस्य भेदो भवति। नेमिश्चक्र-
पर्यन्तम्। तस्या भङ्गे बलस्य नाशः क्षयो भवति। अक्षश्चक्रविवरवर्ति काष्ठम्। तस्य भङ्गे-
ऽर्थक्षयो द्रव्यविनाशः। अणिरक्षाग्रे कीलकः। तस्य भङ्गे वर्द्धकिनस्तक्षणः क्षयः।।२२।।
अथ कस्मिन् काले प्रवेशयेदित्याह श्लोकद्वयेन—
भाद्रपदशुक्लपक्षस्याष्टम्यां नागरैर्वृतो राजा।
दैवज्ञसचिवकञ्चुकिविप्रप्रमुखैः सुवेषधरैः ॥२३॥
अहताम्बरसंवीतां यष्टिं पौरन्दरीं पुरं पौरैः ।
स्रग्गन्धधूपयुक्तां प्रवेशयेच्छङ्खतूर्यरवैः ॥२४॥
भाद्र शुक्ल अष्टमी के दिन नगर में रहने वाले मनुष्य, ज्योतिषी, मन्त्री, कञ्चुकी और
सुन्दर वेषधारी प्रधान ब्राह्मणों के साथ होकर राजा पुरवासियों के द्वारा नवीन वस्त्र से ढकी
हुई, माला, गन्ध और धूपों से युत यष्टि को शङ्ख और तुरही के शब्दों के साथ पुर में प्रवेश
कराना चाहिये।।२३-२४।।
भाद्रपदशुक्लाष्टम्यां तिथौ राजा नृपो नागरैर्नगरवासिभिर्जनैर्वृतः परिवृतस्तथा दैवज्ञेन
सांवत्सरिकेण। सचिवैर्मन्त्रिभिः। कञ्चुकिभिर्महत्तरकैर्विप्रप्रमुखैर्ब्राह्मणप्रवरैः सुवेषधरैः।
पौरैः स पौरन्दरीमैन्द्रीं यष्टिं प्रवेशयेत् पुरं नगरम्। कीदृशीं यष्टिम्? अहताम्बरसंवीताम्,
अहतमक्षतमभिनवमम्बरं वस्त्रं तेन संवीतामावृताम्। तथा स्रग्गन्धधूपयुक्ताम्। स्रग्भिर्मालाभिः,
गन्धैः सुगन्धद्रव्यैः, धूपैश्च संयुक्ताम्। तथा शङ्खरवैः शङ्खशब्दैः, तूर्यरवैः सह प्रवेशयेदिति।
युगलकम्। तथा च गर्गः—
प्रोष्ठपादे सिताष्टम्यां ज्येष्ठायोगे स्वलङ्कृताम्।
यष्टिं पौरन्दरीं राजा नगरं सम्प्रवेशयेत्।। इति।।२३-२४।।
कीदृशं नगरमित्याह श्लोकद्वयेन—
रुचिरपताकातोरणवनमालालङ्कृतं प्रहृष्टजनम्।
सम्मार्जितार्चितपथं सुवेषगणिकाजनाकीर्णम् ॥२५॥
अभ्यर्चितापणगृहं प्रभूतपुण्याहवेदनिर्घोषम्।
नटनर्तकगेयज्ञैराकीर्णचतुष्पथं नगरम् ॥२६॥
मनोहर पताका, तोरण और वनमालाओं से भूषित, हर्षित मनुष्यों से युत, शोधित
और सजाये हुये मार्गों से युत, सुन्दर वेष वाली वेश्याओं से व्याप्त, सजी हुई दुकानों से
युत, अधिक पुण्याह और वेद के शब्दों से युत, नट, नाचने वाले और गान विद्या जानने