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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

सन्ध्यालक्षणाध्यायः ४०१
दही के समान अग्र भाग वाले, नील वर्ण के भाग से सूर्य को आच्छादित करने
वाले, आकाश के मध्य में स्थित, पीले रङ्ग से रँगे और मूल की तरफ सघन मेघवृक्ष हों
तो अधिक वृष्टि करते हैं।।१८।।
अभ्रतरुर्मेघवृक्षः। दधिसदृशाग्रः दधिसदृशमग्रं यस्य। श्वेताग्र इत्यर्थः। तथा नीलो
नीलवर्णो भानुच्छादी सूर्यमाच्छादयति तच्छीलः। स च खमध्यग आकाशमध्यभागस्थः।
तथा घना मेघाः पीतच्छुरिताः पीतेन पीतवर्णेन छुरिता रञ्जितास्ते च घनमूलाः। घनानि
सन्ति तानि मूलानि येषाम्। एते सर्व एव भूरिवृष्टिकराः प्रभूतां वृष्टिं कुर्वन्ति।।१८।।
अथाभ्रवृक्षेणैव सियासोः शुभाशुभमाह—
अनुलोमगेऽभ्रवृक्षे शमं गते यायिनो नृपस्य बधः।
बालतरुप्रतिरूपिणि युवराजामात्ययोर्मृत्युः ।।१९।।
शत्रु के ऊपर चढ़ाई करने वाले विजयेच्छु राजा के पीछे-पीछे कुछ दूर जाकर यदि
मेघवृक्ष नष्ट हो जाय तो उस राजा का मरण होता है। यदि वही मेघवृक्ष बाल (छोटे)
वृक्ष की तरह हो तो युवराज़ और मन्त्री का मरण होता है।।१९।।
अभ्रवृक्षे मेघतरौ यायिनो जिगमिषोर्नृपस्य राज्ञोऽनुलोमगे तत्पश्चाद् गम्यमाने शमं
गतेऽकस्मान्नष्टे तस्यैव यायिनो बधो मरणं भवति। तस्मिन्नेवाभ्रतरौ बालतरुप्रतिरूपिणि
बालवृक्षसदृशे शमं गते युवराजामात्ययोर्मरणं मृत्युर्भवति अर्धराज्यभाग युवराजः।
अमात्यो मन्त्री।।१९।।
अथ पुनरपि सन्ध्यालक्षणमाह—
कुवलयवैदूर्याम्बुजकिञ्जल्काभा प्रभञ्जनोन्मुक्ता।
सन्ध्या करोति वृष्टिं रविकिरणोद्भासिता सद्यः ।।२०।।
नील कमल, वैदूर्य मणि या कमल के केशर की तरह कान्ति वाली, वायु से रहित
और सूर्य के किरणों से प्रकाशित सन्ध्या हो तो उसी दिन वृष्टि करती है।।२०।।
एवंविधा सन्ध्या सद्यस्तस्मिन्नेवाहनि वृष्टिं वर्षणं करोति। कीदृशी। कुवलयं नीलो-
त्पलम्, वैदूर्यो मणिर्नीलपीतः, अम्बुजकिञ्जल्कं पद्मकेसरम्, एषां सदृशी आभा कान्ति-
र्यस्याः। तथा प्रभञ्जनोन्मुक्ता प्रभञ्जनेन वातेनोन्मुक्ता रहिता। तथा रविकिरणोद्भासिता
प्रकाशीकृता।।२०।।
अन्यल्लक्षणमाह—
अशुभाकृतिघनगन्धर्वनगरनीहारधूमपांशुयुता ।
प्रावृषि करोत्यवग्रहमन्यर्तौ शस्त्रकोपकरी ।।२१।।
गन्धर्वनगर, हिम, धूम और धूली से युक्त सन्ध्या वर्षाकाल में अवृष्टि तथा अन्य
ऋतु में शस्त्र-कोप करती है।।२१।।
बृ० सं० प्र०-२६
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