बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरोहिणीयोगाध्यायः ३४९
आषाढ के कृष्णपक्ष में रोहिणी-चन्द्र का समागम देखकर ग्रहचिन्तक दैवज्ञों को शास्त्र
में कथित प्रकार के द्वारा संसार का शुभाशुभ कहना चाहिये। भूत के प्रयोजनाभाव होने के
कारण आगे का ही रोहिणीयोग कहना चाहिये, यह योग पञ्चसिद्धान्तिका में मैंने (वराह-
मिहिर ने) कह दिया है। चन्द्रबिम्बप्रमाण, चन्द्र की कान्ति, चन्द्र का वर्ण, चन्द्र का मार्ग,
अनेक तरह के उत्पात और वायु के द्वारा संसार का शुभाशुभ कहना चाहिये।।४-५।।
आषाढमासस्य तमिस्रपक्षे कृष्णपक्षे प्राजेशं रोहिणीं क्षपाकरेण चन्द्रेणोपगतं संयुक्तं
समीक्ष्य दृष्ट्वा ग्रहचिन्तकेन दैवज्ञेन शास्त्रोपदेशाद् ग्रन्थागमाज्जगतो जनस्येष्टं शुभम-
शुभमनिष्टं वा वक्तव्यं कथनीयम्।
योगो यथेति। यथा येन प्रकारेण योगो रोहिणीयोगोऽनागतो भावी एव वाच्यो
वक्तव्योऽत्र स धिष्ण्ययोगो नक्षत्रयोगः करणे पञ्चसिद्धान्तिकायां मयोक्तः कथितः। तथा
च पञ्चसिद्धान्तिकायाम्—
बुद्ध्वा शशिविक्षेपं कृत्वा ताराशशाङ्कविवरं च।
संसाध्य च वक्तव्यः पश्चात्तारासमायोगः।।
इत्यादिना ग्रन्थेनेति। तथा च ब्रह्मसिद्धान्ते—
ध्रुवकादूनः पश्चादधिकः प्राग्वत् कृतो यथा योगः।
अन्यद् ग्रहमेलकवत् .........................................।। इति।
चन्द्रप्रमाणेति। चन्द्रस्य प्रमाणेन बिम्बपरिमाणेन। द्युत्या कान्त्या। वर्णेन सितादि-
केन। मार्गेण यथा पूर्वाद्यास्वष्टासु दिक्षु संस्थित्या। एतैस्तथोत्पातैस्तत्कालजातैरुल्का-
पातादिभिर्वातैश्चानिलैः शुभाशुभफलं निगद्यं वक्तव्यमिति।।४-५।।
अथ तत्र विधानमाह—
पुरादुदग्यत्पुरतोऽपि वा स्थलं त्र्यहोषितस्तत्र हुताशतत्परः।
ग्रहान् सनक्षत्रगणान् समालिखेत्सधूपपुष्पैर्बलिभिश्च पूजयेत् ॥६॥
सरत्नतोयौषधिभिश्चतुर्दिशं तरुप्रवालापिहितैः सुपूजितैः।
अकालमूलैर्कलशैरंलकृतं कुशास्तृतं स्थण्डिलमावसेद् द्विजः ॥७॥
नगर से उत्तर या पूर्व दिशा में ब्राह्मण हवन करते हुये तीन दिन उपवास करे। बाद
में अश्विनी आदि सब नक्षत्रों के साथ सूर्य आदि नव ग्रहों को लिखकर धूप, पुष्प और बलि
से उनका पूजन करे। रत्न, जल और औषधि से पूर्ण, पल्लव से आच्छादित, अनेक तरह
से पूजित, अकाल मूल (अग्निपाक के द्वारा श्याम वर्ण से रहित अधोभाग वाले) कलशों
से अलंकृत चारों दिशायें और कुशों से आच्छादित स्थण्डिल पर बैठे।।६-७।।
पुरान्नगरादुदगुत्तरस्यां दिशि यत्स्थलं तत्र तस्मिन् स्थले द्विजो ब्राह्मणः, त्र्यहोषितो
दिनत्रयं स्थितस्तत्र च कृतोपवासो हुताशतत्परः, अग्निहवनपरः। तथा च गर्गः—
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