सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 373

गर्भलक्षणाध्यायः ३३१

दिशि सम्भवन्ति। ये चापरोत्था गर्भकाले पश्चिमायां दिशि सम्भूतास्ते प्रवर्षणे प्राक्पूर्वस्यां
दिशि सम्भवन्ति। शेषास्वन्यास्वपि दिक्ष्वेवमनेन प्रकारेण विपर्ययो विपरीतो भवति।
तद्यथा—दक्षिणा उत्तरस्याम्, उत्तरा दक्षिणस्याम्। आग्नेया वायव्याम्, वायव्या आग्नेय्याम्।
ऐशानीसम्भूता नैर्ऋत्याम्, नैर्ऋतीसम्भूता ऐशान्यामिति।
वायोरनिलस्य चाप्येवमेव विपर्ययो विपरीतो वाच्यः। यथा मेघानां दिग्व्यत्यय
उक्तस्तथा वायोरपि वाच्यः। यथा पूर्वोद्भूताः पश्चात्तथा पूर्वोद्भूतो गर्भकाले वायुः प्रवर्षण-
काले पश्चिमायां दिशि भवतीत्येवं सर्वत्र योज्यम्। तथा च पराशरः—
‘अथ माघेन श्रावणं फाल्गुनेन भाद्रपदं चैत्रेणाश्वयुजं वैशाखेन तु कार्तिकं शुक्लेन
कृष्णं कृष्णेन शुक्लं दिवसेन रात्रिं रात्र्या दिवसं गर्भाः प्रवर्षन्ति’ इति॥१३॥
अधुना गर्भसम्भवलक्षणान्याह—
ह्रादिमृदूदक्शिवशक्रदिग्भवो मारुतो वियद्विमलम्।
स्निग्धसितबहुलपरिवेषपरिवृतौ हिममयूखार्कौ ॥१४॥
पृथुबहुलस्निग्धघनं घनसूचीक्षुरकलोहिताभ्रयुतम्।
काकाण्डमेचकाभं वियद्विशुद्धेन्दुनक्षत्रम् ॥१५॥
सुरचापमन्द्रगर्जितविद्युत्प्रतिसूर्यका शुभा सन्ध्या।
शशिशिवशक्राशास्थाः शान्तरवाः पक्षिमृगसङ्घाः ॥१६॥
विपुलाः प्रदक्षिणचराः स्निग्धमयूखा ग्रहा निरुपसर्गाः।
तरवश्च निरुपसृष्टाङ्कुरा नरचतुष्पदा हृष्टाः ॥१७॥
गर्भाणां पुष्टिकराः सर्वेषामेव योऽत्र तु विशेषः।
स्वर्तुस्वभावजनितो गर्भविवृद्ध्यै तमभिधास्ये ॥१८॥
गर्भ-स्थितिकाल में आह्लादजनक, सुखस्पर्श और उत्तर, ईशान या पूर्व दिशा में
उत्पन्न वायु, निर्मल आकाश, स्निग्ध श्वेत परिवेष .. व्याप्त चन्द्र और सूर्य, आकाश में
विस्तृत और स्निग्ध मेघ, सूच्याकार, क्षुराकार और लोहित मेघों, काक के अण्डे के
समान, मयूर के कण्ठ के समान, निर्मल चन्द्र और नक्षत्रों से युत आकाश, इन्द्रधनु, मेघों
के मधुर शब्द, विद्युत और प्रतिसूर्य से युक्त पूर्वापरा सन्ध्या, सूर्य के अभिमुख होकर
उत्तर, ईशान या पूर्व दिशा में स्थित पक्षी और मृग, नक्षत्रों के उत्तर मार्ग में होकर निर्मल
उत्पातरहित ग्रहों का गमन, बाधारहित वृक्षों का अङ्कुर, मनुष्य और पशु हर्षित—इन सब
गुणों से युत गर्भ का समय हो तो गर्भ पुष्ट होता है। मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से वैशाख के
अन्त तक गर्भ की परीक्षा करनी चाहिये। गर्भ की वृद्धि के लिये ऋतु के स्वभाव से उत्पन्न
अवशिष्ट लक्षणों को अब आगे कहता हूँ॥१४-१८॥
गर्भगृहणकाले ईदृशानि लक्षणानि शुभफलानि भवन्ति। तद्यथा—मारुतो वायुर्ह्रादिरा-

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA