बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ बृहत्संहिता
धारयद्भिर्मृगेन्द्रैः सनाथीकृतान्तर्दरीनिर्झरम्।
गगनतलमिवोल्लिखन्तं प्रवृद्धैर्गजाकृष्टफुल्लद्रुम-
त्रासविभ्रान्तमत्तद्विरेफावलीहृष्टमन्द्रस्वनैः
शैलकूटैस्तरक्ष्वृक्षशार्दूलशाखामृगाध्यासितैः ।
रहसि मदनसक्तया रेवया कान्तयेवोपगूढं सुराध्या-
सितोद्यानमम्भोऽशनानन्नमूलानिलाहारविप्रान्वितं
विन्ध्यमस्तम्भयद्यश्च तस्योदयः श्रूयताम् ॥६॥
सूर्य के मार्ग को रोकने के लिये उन्नत होने में कम्पायमान शृङ्ग होने से भयभीत,
विद्याधर के कन्धे में सक्त और व्यग्र विद्याधरी गण से दिये हुये विद्याधर के शरीर में लगे
हुये कम्पायमान और अत्युन्नत ध्वजरूप वस्त्र से शोभित, हस्ती के मद से युक्त रक्त के
आस्वादन से उत्पन्न सुगन्धि को खोजने में उद्यत भ्रमरगणों से युक्त शिर वाले मानो
बाणपुष्पों से रचित शिरोमाला धारण करने वाले सिंहों से युक्त गुहागत निर्झर वाला, बढ़े
हुये गजों से आकृष्ट होने पर कम्पित प्रफुल्लित वृक्षों पर चञ्चल और आनन्द से मधुर शब्द
करते हुये भ्रमरपंक्ति वाले तथा वन के अश्व, भालू, व्याघ्र और वानरों से युत पर्वतशृङ्गों से
मानो आकाश को उल्लिखित करता हुआ, निर्जन स्थान में मदनवृक्ष से युक्त होने के
कारण मानो मदनातुर प्रिया—रेवा नदी से युक्त, देवताओं से सेवित उद्यान