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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 728 में से

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पृष्ठ 269

केतुचाराध्यायः २२९
'अथ दक्षयज्ञरुद्रक्रोधोद्भवः कलिकेतुस्त्रीणि वर्षशतानि नव च मासान् प्रोष्योदयते
पूर्वेण वैश्वानरमार्गे ह्यमृतजस्य मणिकेतोश्चारान्ते श्यावरूक्षताम्रारुणां शूलाकारसदृशीं शिखां
कृत्वा नभसस्त्रिभागचारी स शस्त्रभयरोगदुर्भिक्षाऽनावृष्टिमरकैर्यन्मासान् दृश्यते तावद्वर्षाणि
त्रिभागशेषां प्रजां कृत्वार्धं च शारदधान्यमाढकमस्तं व्रजति।' तथा च वृद्धगर्ग आह—
ज्येष्ठामूलमनूराधा या वीथी सम्प्रकीर्तिता।
तां च वीथीं समारुह्य केतुश्चेत् क्रीडते भृशम् ।।
दक्षिणाभिनतां कृत्वा शिखां घोरां भयङ्करीम् ।
शूलाग्रसदृशीं तीक्ष्णां श्यावताम्रारुणप्रभाम् ।।
पूर्वेण चोदितश्चैष नक्षत्राण्युपधूमयेत् ।
घोरं प्रजासु सृजति फलं मासे त्रयोदशे ।।
त्रिभागं नभसो गत्वा ततो गच्छत्यदर्शनम् ।
यावतो दिवसांस्तिष्ठेत्तावद्वर्षाणि तद्भयम् ।।
शस्त्राग्निभयरोगैश्च दुर्भिक्षमरणैर्हताः ।
पूर्यमाणाः प्रजा सर्वा विद्रवन्ति दिशो दश ।। इति ।। ३२ ।।
अथ चलकेतोर्लक्षणमाह—
अपरस्यां चलकेतुः शिखया याम्याग्रयाऽङ्गुलोच्छ्रितया ।
गच्छेद्यथा यथोदक् तथा तथा दैर्घ्यमायाति ।। ३३ ।।
सप्तमुनीन् संस्पृश्य ध्रुवमभिजितमेव च प्रतिनिवृत्तः ।
नभसोऽर्द्धमात्रमित्वा याम्येनास्तं समुपयाति ।। ३४ ।।
हन्यात् प्रयागकूलाद्यावदवन्तीं च पुष्करारण्यम् ।
उदगपि च देविकामपि भूयिष्ठं मध्यदेशाख्यम् ।। ३५ ।।
अन्यानपि च स देशान् क्वचित् क्वचिद्धन्ति रोगदुर्भिक्षैः ।
दश मासान् फलपाकोऽस्य कैश्चिदष्टादश प्रोक्तः ।। ३६ ।।
पश्चिम दिशा में उदित होने वाला, दक्षिण दिशा में एक अङ्गुल उच्छ्रित शिखा वाला,
जैसे-जैसे उत्तर तरफ जाय वैसे-वैसे दीर्घ होने वाला, सप्तर्षि, ध्रुवतारा और अभिजित्
नक्षत्र को स्पर्श करके लौटने वाला और आकाश के अर्द्ध भाग में जाकर दक्षिण दिशा में
अस्त होने वाला चल केतु है। इसका दर्शन होने से प्रयाग से लेकर अवन्ती तक के देश,
पुष्करारण्य नामक स्थान और उत्तर दिशा में देविका नदी तक के देश का नाश होता है;
लेकिन विशेषकर तथा मध्य देश का नाश होता है। साथ ही अन्य देशों का भी रोग और दुर्भिक्ष
के द्वारा नाश होता है। इसका फल दर्शनकाल से लेकर दश मास तक होता है और किसी
का मत है कि दर्शनकाल से लेकर अट्ठारह मासपर्यन्त फल प्राप्त होता है ।। ३३-३६ ।।
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