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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

शुक्रचाराध्यायः २०५
रूक्षकपिलरक्तध्वस्तदीनाल्पलोष्टसन्निभः शस्त्रवैरव्याधिवर्षान्नक्षयकरः।' तथा च—
कूटाकारनिभः स्निग्धो मार्गस्थो रजतप्रभः।
भार्गवो विस्तृतार्चिश्च प्रजाभावकरः स्मृतः।। इति।
प्रावृषि शुक्रः प्राच्यां दिशि स्थितोऽल्पं जलं सृजति नित्यम्।
धान्यं च भूरि कुरुते तृणं च बहु जायते तत्र।।
अपरां निषेव्यमाणः काष्ठां शुक्रो जलं सृजति भूरि।
धान्यं कुरुते चाल्पं तृणं न बहु जायते तत्र।। इति।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ
शुक्रचारो नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
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