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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 728 में से

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पृष्ठ 219

बृहस्पतिचाराध्यायः १७९
सप्तम (पितृसंज्ञक) युग में हेमलम्ब, विलम्बी, विकारी, शर्वरी, प्लव—ये पाँच
संवत्सर होते हैं। इनमें प्रथम (हेमलम्ब) संवत्सर में अधिकतर अतिवृष्टि आदि छः
ईतियों का भय और अधिक वायु के प्रकोप से युत वृष्टि होती है। दूसरे (विलम्बी) संवत्सर
में थोड़ा धान्य और अधिक वृष्टि होती है। तृतीय संवत्सर बहुत उद्वेग (दोष) करने वाला
और अधिक जल देने वाला होता है। चौथा (शर्वरी) संवत्सर दुर्भिक्ष करने वाला होता है
एवं पाँचवाँ (प्लव) संवत्सर शुभ फल और बहुत वृष्टि देने वाला होता है।।३९-४०।।
सप्तमे पैत्रे हेमलम्ब इति प्रथमो वत्सरः स्यात्। विलम्बि द्वितीयः। परतोऽनन्तरं
तृतीयो विकारि। चशब्दः समुच्चये। शर्वरीति चतुर्थः। तदनु तत्पश्चात् पञ्चमो वत्सरोऽब्दः
प्लवः इति उक्तः। गुरुवशेन बृहस्पतिचारयोगात्।
ईतिप्रायेति। पूर्वे प्रथमेऽब्दे वर्षे ईतिप्रायाऽतिवृष्ट्याद्युपद्रवबहुला। प्रचुरपवना बहुवाता
वृष्टिर्भवति। अतोऽब्दाद् द्वितीये वत्सरे मन्दमल्पं सस्यं न बहुसलिलं प्रभूतजलं भवति।
तृतीयो वत्सरोऽत्युद्वेगकरः प्रभूतदोषदस्तथा प्रचुरसलिलः प्रभूतजलः स्याद् भवेत्। चतुर्थो
दुर्भिक्षाय भवति। ततोऽनन्तरं प्लव इति पञ्चमः शोभनः श्रेष्ठ इति। स च भूरितोयो बहु-
जलश्च भवति।।३९-४०।।
अथाष्टमस्य युगस्याह—
वैश्वे युगे शोक हृदित्यथाद्यः संवत्सरोऽतः शुभकृद् द्वितीयः।
क्रोधी तृतीयः परतः क्रमेण विश्वावसुश्चेति पराभवश्च ॥४१॥
पूर्वापरौ प्रीतिकरौ प्रजानामेषां तृतीयो बहुदोषदोऽब्दः।
अन्त्यौ समौ किन्तु पराभवेऽग्निः शस्त्रामयार्तिर्द्विजगोभयं च ॥४२॥
अष्टम (वैश्व) युग में शोकहृत्, शुभकृत्, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव—ये पाँच
संवत्सर होते हैं। इनमें प्रथम (शोकहृत्) और द्वितीय (शुभकृत्) संवत्सर प्रजाओं को
आनन्द देने वाले होते हैं। तृतीय (क्रोधी) संवत्सर बहुत अशुभकारी है। अन्त्य के
चतुर्थ (विश्वावसु) और पञ्चम (पराभव) संवत्सर मध्यम फल देने वाले होते हैं;
किन्तु पराभव संवत्सर में अग्नि का भय, शस्त्र से पीड़ा, रोग से पीड़ा एवं ब्राह्मणों और
गौओं को भय होता है।।४१-४२।।
वैश्वे युगे इति। अथानन्तरं वैश्वे अष्टमे युगे आद्यः प्रथमः संवत्सरोऽब्दः शोकहृदिति।
केचिच्छोककृदिति पठन्ति। शोकं कृन्तति छिनत्तीति शोककृत्। यतोऽस्य शोभनं फलमा-
चार्यो वक्ष्यति—'पूर्वापरौ प्रीतिकरौ प्रजानाम्' इति। तस्माच्छोकहृदिति निःसन्देहः पाठः।
अतोऽन्यो द्वितीयः शुभकृत्। तृतीयः क्रोधी। परतोऽनन्तरं क्रमेण विश्वावसुश्चेति चतुर्थः।
इतिशब्दः प्रकारे। पराभवश्च पञ्चमः।
पूर्वापराविति। प्रथमद्वितीयावब्दौ प्रजानां प्रीतिकरौ। एषां सर्वेषां पञ्चानां क्रोधी
योऽब्दस्तृतीयः स बहुदोषदः, बहुदोषानशुभान् ददाति। अन्त्यौ पश्चिमौ चतुर्थपञ्चमौ समौ
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