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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

१३६ बृहत्संहिता
पुलिन्दगान्धारेभ्यः। भाद्रपदे मगधदरदकलिङ्गवङ्गाऽनयाय सस्यक्षेमाय च। आश्वयुग्ग्रहणे
सुभिक्षक्षेमाय आवन्तिवाहीकानर्त्तकाम्बोजसैन्धवाऽऽमयाये'ति ।।८०।।
अथार्कशशिनोर्दश मोक्षा भवन्ति तेषां नामान्याह—
हनुकुक्षिपायुभेदा द्विर्द्विः सञ्छर्दनं च जरणं च।
मध्यान्तयोश्च विदरर्णामति दश शशिसूर्ययोर्मोक्षाः ।।८१।।
दक्षिण हनु, वाम हनु, दक्षिण कुक्षि, वाम कुक्षि, दक्षिण पायु, वाम पायु, सञ्छर्दन,
जरण, मध्य विदरन एवं अन्त्य विदरन—ये दश प्रकार के सूर्य और चन्द्र के मोक्ष होते
हैं।।८१।।
हनुकुक्षिपायुभेदा द्विर्द्विः। द्वौ द्वौ वारौ द्विर्द्विः। हनुभेदौ द्वौ। कुक्षिभेदौ द्वौ। पायुभेदौ
द्वाविति षट्। सञ्छर्दनं च जरणं च। चकार