सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५३
से भाग देना लब्ध कलादि फल को द्वितीय भाव के ध्रुवांक से गुणाकर यदि उनमें
ग्रह हो तो उसके ध्रुवांक से गुणकर।।२९।।
भावरश्मिभिराहन्यात्सप्तभिश्च विभाजयेत् ।
मूलरश्मिसमूहेन शिष्टं हन्यात्तथैवतान् ।।३०।।
उसे दूसरे भाव के स्वामी के रश्मि से गुणाकर सात से भाग देने से जो अंक
प्राप्त हो वह भारणीय कुटुम्ब की संख्या और शेष को मूलरश्मि समूह से
गुणकर।।३०।।
इष्टानिष्टफलाभ्यां च हत्वांतरमथद्वयोः ।
सप्तविंशतिभिर्हत्वा सप्तभिश्च विभाजयेत् ।।३१।।
गुणनफल में भाव स्वामी के इष्ट फल से गुणन करके एवं भाव स्वामी के
कष्ट बलांकों से मूलरश्मि समूह को गुणन कर दोनों के अन्तर को २७ से गुण
देने से कलादि फल को ७ से भाग देने से जो आवे वह स्त्रियों की संख्या होती
है।।३१।।
भरणीय कुटुम्बानां पुंस्त्रियस्तत्समाविदुः ।
राशीन् हित्वातु लग्नादि भावभागादिकान् ।।३२।।
राशियों को छोड़कर लग्नादि भावों के अंशादि अलग-अलग अपने अपने
स्वामियों के रश्मियों से गुणन करने से जो आवे उसे भावभागादि कहते हैं।।३२।।
गुणयेद्रश्मिभिः स्वैश्च भावभागादयोविदुः ।
कलीकृत्य भलिप्ताभिर्विभज्याप्तं फलं ततः ।।३३।।
इसका कलापिंड बनाकर दो जगह स्थापित करे उसमें राशि लिप्ता से भाग
देने से जो फल प्राप्त हो उसे भावफल कहते हैं और दूसरे स्थान में १२ से भाग
देने से जो फल हो उसे भाव साधन फल कहते हैं।।३३।।
प्रकारांतर से भावफल साधन-
सूर्यभक्तावशिष्टं तु भावानां साधनं विदुः ।
राशीन् हित्वा तंतो लिप्ताखनेत्रविभाजिताः ।।३४।।
राशिको छोड़कर अंशादि की कला बनाकर उसमें २०० से भाग देना।।३४।।

६५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
साधनघ्ना विभक्ताश्च. वर्गणाभिः फलाहताः ।
उच्चादिवृद्धिहानिं च कुर्यात्तत्संख्यकाभवेत् ॥३५॥
लब्ध को पूर्व साधित भाव साधन से गुणकर अपने ध्रुवांक में भाग देना और
पूर्व प्रतिपादित भाव साधन से गुण कर अपने ध्रुवांक में भाग देना पुनः इसे
पूर्वसंपादित फल से गुण देने से जो संख्या प्राप्त हो वह कुटुम्बपोषण की संख्या
होती है।।३५।।
अष्टकवर्गफलाध्यायः ।
तत्रादावष्टकवर्गे विचारणीयः-
आत्मभावशक्तिश्च पितृचिन्ता रवेः फलम् ।
मनोवृत्तिप्रसादश्च मातृचिन्तामृगांकतः ॥१॥
आत्मा, प्रभाव, शक्ति और पिता का फल सूर्य से विचार करना चाहिये मन,
वृत्ति, प्रसन्नता और माता का विचार चन्द्रमा से करना चाहिये।।१।।
भ्रातृसत्वं गुणं भूमिंभौमेन च विचारयेत् ।
वाणिज्यकर्मवृत्तिश्च बुधेन तु विचिन्तयेत् ॥२॥
भाई, बल, गुण, भूमि का विचार भौम से करना चाहिये। वाणिज्य कर्म वृत्ति
का बुध से करना चाहिये।।२।।
गुरुणा देहपुष्टिं च विद्यापुत्रार्थसंपदः ।
भृगोर्विवाहककर्माणि भोगस्थानं च वाहनम् ॥३॥
शरीर की पुष्टि, विद्या, पुत्र, धन संपत्ति का विचार गुरु से करना चाहिये।
शुक्र से विवाह, संभोग, वाहन, वेश्या, स्त्री का विचार करना चाहिये।।३।।
वेश्यास्त्रीजनगात्राणि शुक्रेणैवनिरीक्षयेत् ।
आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकमहद्भयम् ।
सर्वक्षणं च मरणं मंदेनैव निरीक्षयेत् ॥४॥
आयुष्य, जीवन, दुःख, शोक आदि का विचार शनि से करना चाहिये।।४।।

अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५५
रविः पिता शशी माता भ्राता भौमो बुधः सुहृत् ।
मातुलेयः स्मृतो जीवो ज्ञानपुण्ये स्त्रियः सितः ॥५॥
सूर्य पितृ कारक, चन्द्रमा मातृकारक, भौम भ्रातृकारक, बुध मित्र और मातुल
(मामा) कारक, गुरु विद्या और पुण्य (कर्म) कारक और शुक्र स्त्री कारक हैं ॥५॥
एषामृक्षे च तत्काले मरणं कुरुते शनिः ।
आदित्याष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु ॥६॥
इनके नक्षत्रों में जब शनि आता है तो इन लोगों को कष्ट कारक होता है।
सूर्य के अष्टम वर्ग को ग्रह सहित स्थापनकर विचार करे॥६॥
अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहं स्मृतम् ।
तद्राशिफल संख्याभिवर्द्धयेद्योगपिंडकम् ॥७॥
सूर्य से नवम राशि पिता की होती है, उस नवम राशि में जो रेखा की संख्या
हो उससे योग पिण्ड को गुणकर॥७॥
सप्तविंशोद्धृतं शेषं नक्षत्रं याति भानुजम् ।
तस्मिन्काले पितृक्लेशो भवतीति न संशयः ॥८॥
२७ से भाग देने से जो शेष बचे वह अश्विन्यादि नक्षत्र की संख्या होती है
उस नक्षत्र पर जब शनि जाता है तो पिता को कष्ट होता है॥८॥
तत्त्रिकोणगते वापि पितापितृसमोऽपिवा ।
मरणं तस्य जानीयाद्दशाछिद्रेषु कल्पयेत् ॥९॥
अथवा इसके त्रिकोण नक्षत्र में जब शनि होता है तब पिता और पिता के
सदृश लोगों को कष्ट होता है। यदि उस समय पापग्रह की दशा हो तो मृत्यु होती
हैं अन्यथा कष्ट मात्र होता है॥९॥
अर्कात्तु तुर्यगेराहौ मंदे वा भूमिनंदने ।
गुरुशुकेक्षणमृते पितृहा जायते नरः ॥१०॥
सूर्य से चौथे स्थान में राहु, शनि, भौम में से कोई हो और उसे गुरु शुक्र
न देखते हों तो पिता का नाश होता है॥१०॥

६५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
लग्नाच्चन्द्राद्गुरुस्थाने याते सूर्यसुते यदि ।
पित्रोर्नाशं तदा काले वीक्षिते पापसंयुते ।।९१।।
लग्न या चन्द्रमा से नवम स्थान में शनि हों और पापग्रह दृष्ट और युत हों
तो पिता का नाश होता है ।।९१।।
लग्नात्सुखेशराशीशदशायाम् पितृक्षयः ।
दशानुकूलकालेन योजयेत्कालवित्तमः ।।९२।।
लग्न से चतुर्थेश के राशीश की दशा में पिता का नाश होता है किन्तु दशा
अनिष्टद न हो तो सुख होता है ।।९२।।
पितृजन्माष्टमे जातस्तदीशे लग्नगेऽपिवा ।
तेनैव पितृकार्याणि करोत्यत्र न संशयः ।।९३।।
पिता के जन्मलग्न से आठवें लग्न में जन्म हो अथवा पिता के जन्मलग्न से
आठवें भाव के स्वामी बालक के जन्मलग्न में हों तो वह बालक ही पिता के सभी
कार्यों को करता है अर्थात् पिता की मृत्यु हो जाती है और वही सभी कार्य को
करता है इसमें संशय नहीं है ।।९३।।
पितृसुख योग-
सुखनाथ दशायां तु सुखप्राप्तेश्च संभवः ।
सुखेशे लाभलग्नस्थे चन्द्रलग्नाद्विशेषतः ।।९४।।
सुखेश की दशा में पिता को सुख होता है। सुखेश ११ वें या जन्मलग्न
में हो तो, विशेषकर चन्द्रलग्न से ।।९४।।
पितृगृहं समायुक्ते जातः पितृवशानुगः ।
तेनैव पितृकार्याणां कर्मक्षेत्रे समापयेत् ।।९५।।
दशमभाव में हो तो पिता के वश में रहने वाला होता है और वही पिता
के कर्मों को करने वाला होता है ।।९५।।
पितृजन्मतृतीयर्क्षे जातः पितृधनाश्रितः ।
पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः ।।९६।।
पिता के जन्मलग्न से तीसरे लग्न में जन्म हो तो पिता के धन का भोगी होता

अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५७
हैं। पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में जन्म हो तो पिता के गुण के सदृश गुणवाला
होता है।।१६।।
तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेत्सुतः ।
एवमादिफलं ज्ञात्वा तान्यत्रापि नियोजयेत् ।।१७।।
और उसके स्वामी यदि जन्मलग्न में हों तो पिता से श्रेष्ठ होता है। इस प्रकार
से पूर्वोक्त के फलों की योजना यहां भी करना।।१७।।
विशेषः-
सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं तन्मासे संवत्सरेऽपि च ।
विवाहव्रतवंधादि सर्वं तत्वर्जयेत्सदा ।।१८।।
सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य हो उस राशि के मास में और
संवत्सर (उस राशि में जब गुरु हों) में विवाह व्रत-वंधादि शुभकर्म को न करें।।१८।।
कलहो त्रासदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च ।
एवमादिफलं ज्ञात्वा मासं प्रति समाचरेत् ।।१९।।
अधिक शून्य वाले मास में कलह, भय, दुःखादि होते हैं इसको ध्यान में
रखते हुये मास के कार्यों को करे।।१९।।
पितृ मरणकालः-
संशोध्यपिंडं सूर्यस्य रंध्रमानेन वर्द्धयेत् ।
अर्कोद्धतावशेषर्क्षे यदा याति शनैश्चरः ।
तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्त्रिकोणगतेऽपिवा ।।२०।।
सूर्य के अष्टकवर्ग के पिंड को सूर्य के शून्य संख्या से गुणकर १२ का भाग
देने से जो शेष बचे उस राशि में जब शनि जाता है तब उस राशि के मास में
पिता की मृत्यु होती है या उस राशि से त्रिकोण राशि में जब शनि जाते हैं तब
पिता की मृत्यु होती है।।२०।।
चन्द्राष्टकवर्गस्य फलम् -
चन्द्राच्चतुर्थभे मातुः प्रासादग्रामचिंतनम् ।
चन्द्राष्टवर्गेयद्राशौ शून्याधिक्यं प्रजायते ।।२१।।

६५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में माता, गृह और ग्राम का विचार करना चाहिये।
चन्द्रमा के अष्टकवर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य है।।२१।।
तं राशिं च परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत् ।
चन्द्राष्टमे शनिक्षेत्रे त्रिकोणेषु विशेषतः ॥२२॥
उस राशि में जब चन्द्रमा हो तब शुभ कर्म को न करे। चन्द्रमा से आठवें
शनि की राशि से विशेष कर त्रिकोण में हों तो।।२२।।
आधिव्याधिदुःखान्यपि लभते नात्र संशयः ।
चन्द्रात्सुखफलात्पिंडं वर्धयेद्धैर्हृतं चतत् ॥२३॥
उस समय जातक को मानसिक कष्ट, व्याधि और दुःख होता है। चन्द्रमा
से चौथे भाव के फल को खंड (पिंड) से गुणा कर २७ से भाग देने से।।२३।।
शेषमृक्षे शनौ याते मातृहानिं विनिर्दिशेत् ।
तत्रिकोणेषु वा केचिद्दशाच्छिद्रेषु कल्पयेत् ॥२४॥
जो शेष हो तत्तुल्य नक्षत्र पर शनि के रहने से माता को कष्ट या मृत्यु होती
है। अथवा उस नक्षत्र से त्रिकोण नक्षत्र (१० या १९ नक्षत्र में) में शनि के रहने
से और उस समय कष्टप्रद दशा के रहने से माता की मृत्यु होती है।।२४।।
भौमाष्टकवर्गफलम् –
भौमाष्टवर्गे संचिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम् ।
भौमस्थितस्य सहजोराशिर्भ्रातृगृहंस्मृतम् ॥२५॥
भौमाष्टक में भाई, पराक्रम और धैर्य का विचार करना चाहिये। भौम से तीसरे
भाव से भाई का विचार करना चाहिये।।२५।।
त्रिकोण शोधनं कृत्वा यत्रभूयांसि तत्रवै ।
भूमिर्भवति भार्यवा भ्रातृगेहसुखं तथा ॥२६॥
भौमाष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस राशि में अधिक शेष हो उस
राशि में जब भौम जाता है तो भूमि का स्त्री का लाभ और भाई तथा गृह का सुख
होता है।।२६।।
भौमो बलविहीनश्चेत् दीर्घायुर्भातृकोभवेत् ।
फलानि यत्र क्षीयन्ते तत्रभूमिहानिः स्मृतः ॥२७॥

अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५९
यदि भौम निर्बल हो तो भाई दीर्घायु होता है। और जिस राशि में फल की
कमी हो उस पर भौम के जाने से भूमि की हानि होती है।।२७।।
तद्राशिफलसंख्यैश्च वर्धयेच्छोध्यपूर्ववत् ।
शेषर्क्षे च शनौ याते भ्रातृहानिर्विनिर्दिशेत् ।।२८।।
फलों के योग को पिंड से गुणा कर पूर्ववत् २७ का भाग देने से शेष नक्षत्र
मे शनि के जाने से भाई की मृत्यु होती है।।२८।।
अथ बुधाष्टकवर्गफलम् -
बुधात्तूर्ये कुटुम्बं च धनं मित्रादिमातुलाः ।
तत्पंचमे मंत्रविद्यालिपि बुध्यादि चिंतयेत् ।।२९।।
बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब, धन, मित्र, मामा आदि का और बुध से पाँचवें
भाव में मंत्र शास्त्र, लेखन और बुद्धि का विचार करना चाहिये।।२९।।
बुधाष्टवर्ग संशोध्य शेषमृक्षगते शनौ ।
बंधुमित्रादि नाशादींल्लभतेनात्र संशयः ।।३०।।
बुधाष्टक वर्ग में पूर्ववत् संशोधन करके राशिपिंड से योग पिंड को गुणाकर
२७ से भाग देने से शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण नक्षत्र में शनि के जाने से बंधु
मित्रादि का नाश होता है।।३०।।
अथ गुर्वष्टकवर्गफलम् -
जीवात्पंचमतो ज्ञानं पुत्रधर्मधनादिकम् ।
गुरोरष्टकवर्गेषु संतानमपि कल्पयेत् ।।३१।।
गुरु से पाँचवें भाव में संतान का विचार करना चाहिये। इसी प्रकार गुरु के
अष्टकवर्ग में भी संतान विचार करना चाहिये।।३१।।
गुरुस्थितसुतस्थाने यावच्च विद्यते फलम् ।
शत्रुनीचगृहं त्यक्त्वा तावंतश्च सुताः स्मृताः ।।३२।।
गुरु से पाँचवें भाव में जितना फल हो उतने ही संख्यक संतान होते हैं यदि
वह राशि गुरु की शत्रु और नीच राशि न हो तो।।३२।।

६५० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
समुदायाष्टकवर्गचक्र।

राशिमे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.योग
ग्रहशु.<br>चं.सू.बु.<br>बृ.श.मं.
सू.५५४३४२४६५४३३४८
चं.५३५२४३४५५२४७४९
मं.३५४२३३२६३४२२३९
बु.४४६५५५३५४५४४५४
बृ.६५३४४५६५३४६५५६
शु.६४७४४४४१३६५४५२
श.७३४४२१२५२५१३३९
३६२९३६२४३६२३२५३३२५३०२५२८

नोट- सर्वाष्टक वर्ग में सभी अष्टवर्गों में मेषादि राशियों में कितनी-कितनी
रेखायें प्राप्त हुई हैं और उनका योग क्या हुआ लिखना चाहिये।

अष्टकवर्ग कुंडली

+---------------------------------------+
|  (२५)११मं   \       (३०)१०      /  (२५)९.   |
|              \                 /            |
| (२८)१२        \               /      (२३)८श |
|----------------+-------------+--------------|
|       (३६)१    |             |    (२५)७     |
|                |             |              |
|----------------+-------------+--------------|
| (१९)२          /   (२४)सू.४   \       (२६)६ |
|               /                 \           |
|  शु(३६)३च   /                    \ बु(२६)वृ५|
+---------------------------------------+

मातृपित्रोः मृत्युकालः।
ग्रहयोगेन हानिः स्यात् वर्णाद्यं पृथक्ततः ।
संयोज्य सप्तभिर्हत्वा सप्तविंशति भाजिताः ॥१९८॥
एकाधिपत्य शोधन करने से राशियों के नीचे जो अंक आये हैं चाहे वे शून्य
हों या रेखा हों उन्हें राशि के ध्रुवांकों से पृथक्-पृथक् गुण देना और जिस राशि
में ग्रह हैं उनके अंकों को उन उन ग्रहों के ध्रुवांकों से गुणकर पृथक्-पृथक् रखकर,
राशियों के गुणनफल का योग और ग्रहों के गुणनफल का योग कर दोनों को एक
जगह जोड़कर सात ७ से गुणकर उसमें २७ से भाग देने से ॥१९८॥

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५१
अब्दादयस्तदा देहनाशः करणदे सति ।
तस्मिन् पापग्रहे तस्माद्वलिन्येवं विधिःस्मृतः ॥१९१॥
लब्धि माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है। यदि पापग्रह बलवान् हो
तो पूर्वविधि से ही मृत्युकाल जानना॥१९॥
बलहीने तु तं हन्यात्सप्तभिः पंचभिर्भजेत् ।
आयुस्तयोः स्यात्स्थानस्य प्रदिशेदशुभे सति ॥२०॥
यदि निर्बल हो तो योग को सात से गुणकर ५ से भाग देने से जो वर्षादि
हो वही माता पिता के आयुष्य का प्रमाण होता है॥२०॥
मुनिभक्तं वसुघ्नं स्यान्नैवं चेन्नैतयोर्मृतिः ।
वक्ष्यमाणेण विधिना वदेदाह पराशरः ॥२१॥
यदि रेखाप्रद ग्रह बली हो तो पूर्व पिंड को आठ से गुणकर ७ से भाग देने
से लब्ध वर्षादिक दोनों का आयुष्य होता है। शून्य के आयुष्य से रेखा का आयुष्य
अधिक हो तो मृत्यु नहीं होती है ऐसा पाराशर का मत है॥२१॥
चतुर्थभावात्सूर्याच्चायुसाधनम् -
सूर्यादायुः करौ भूपा मनवोऽर्का नवार्णवाः ।
वेदाक्षीणि तु लग्नस्य वक्ष्याम्यायुस्तथैवतत् ॥२२॥
सूर्यादि ग्रहों के और लग्न का क्रम से आयुध्रुवांक २।१६।१४।१२।९।४।४।२
हैं॥२२॥
स्वोच्चे नीचे तु पातः स्याद्धरणादिविधिस्ततः ।
आयुस्तयोः स्यात्तौ तस्मिन् भवने तु तथा स्थितौ ॥२३॥
यदि उच्च में ग्रह हो तो ध्रुवांक की आयु ही स्पष्ट होती है और नीच में
ग्रह हो तो अनुपात द्वारा आयु लाना चाहिये॥२३॥
ध्रुवांक द्वारा आयुर्विचारः-
न कश्चित्स्थानदः स्याच्चेत्तत्काले च मृतिर्भवेत् ।
शुभभोगे शुभा प्रोक्ता तयोःस्याद्रश्मिसंभवः ॥२४॥
यदि वहां कोई रेखाप्रद ग्रह न हो तो उसी समय मृत्यु कहना चाहिये शुभग्रह

६५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्।
के योग से उत्तम रीति से और पापग्रह अधिक हों तो दंड पातादि से मृत्यु
कहना।।२४।।
रश्मितः आयु साधनम् -
अष्टभिर्गुणयेत्षड्भिर्विभज्यायुः परं भवेत् ।
वेश्मनि स्थानदा न स्युर्जन्मकाले स्फुटीकृताः ।।२५।।
सूर्य और चतुर्थभाव के रश्मि संभव को ८ से गुणकर ६ से भाग लब्ध परम
आयु होती है।।२५।।
करणाद्यभावकरणादिद्वारा भाव विचारः-
कलीकृतश्च खनखैर्विभज्याब्दादयः क्रमात् ।
एवं शुभाशुभं ब्रूयान्मातापित्रोर्द्विजोत्तम ।।२६।।
यदि चतुर्थभाव में रेखाप्रद ग्रह न हों तो चतुर्थ भाव का कला पिंड बनाकर
उसमें २०० से भाग देने से वर्षादि आयु होती है इसपर से माता पिता के शुभाशुभ
फल को कहना।।२६।।
करणस्थानदातारः पापपुण्य फलप्रदाः ।
पुनश्चोच्चादिषु तथा त्रिगुणाद्यास्तु पूर्ववत् ।।२७।।
शून्य के देने वाले ग्रह पापफल देने वाले होते हैं और रेखा देने वाले ग्रह
शुभफल देने वाले होते हैं। यदि ये अपने मूलत्रिकोणादि में हों तो पूर्ववत् त्रिगुणादि
फल देते हैं।।२७।।
शत्रुनीचाधि शत्रूणां स्थानेष्वपि तु पूर्ववत् ।
राशिं हित्वा तु भावानां सर्वत्रैवं क्रिया भवेत् ।।२८।।
जहां आयुष्य का विचार हो वहां राशि को छोड़कर अंशादि से जैसा संस्कार
कहा हो वैसा करना, यह क्रिया सर्वत्र जानना।।२८।।
भावानां संस्कार विशेषाद् फल विचारः-
द्वितीयभावलिप्ताश्च राशिलिप्ताविभाजिताः ।
स्ववर्गेणाहतास्तस्य खेटानां वर्गणाहताः ।।२९।।
दूसरे भाव के अंशादि का कला करके उसमें दूसरे भाव की राशि के कला

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६५३
से भाग देना लब्ध कलादि फल को द्वितीय भाव के ध्रुवांक से गुणाकर यदि उनमें
ग्रह हो तो उसके ध्रुवांक से गुणकर।।२९।।
भावरश्मिभिराहन्यात्सप्तभिश्च विभजयेत् ।
मूलरश्मिसमूहेन शिष्टं हन्यात्तथैवतान् ।।३०।।
उसे दूसरे भाव के स्वामी के रश्मि से गुणाकर सात से भाग देने से जो अंक
प्राप्त हो वह-भारणीय कुटुम्ब की संख्या और शेष को मूलरश्मि समूह से
गुणकर।।३०।।
इष्टानिष्टफलाभ्यां च हत्वांतरमथद्वयोः ।
सप्तविंशतिभिर्हत्वा सप्तभिश्च विभजयेत् ।।३१।।
गुणनफल में भाव स्वामी के इष्ट फल से गुणन करके एवं भाव स्वामी के
कष्ट बलांकों से मूलरश्मि समूह को गुणन कर दोनों के अन्तर को २७ से गुण
देने से कलादि फल को ७ से भाग देने से जो आवे वह स्त्रियों की संख्या होती
है।।३१।।
भरणीय कुटुम्बानां पुंस्त्रियस्तत्समाविदुः ।
राशीन् हित्वातु लग्नादि भावभागादिकान् ।।३२।।
राशियों को छोड़कर लग्नादि भावों के अंशादि अलग-अलग। अपने अपने
स्वामियों के रश्मियों से गुणन करने से जो आवे उसे भावभागादि कहते हैं।।३२।।
गुणयेद्रश्मिभिः स्वैश्च भावभागादयोविदुः ।
कलीकृत्य भलिप्ताभिर्विभज्याप्तं फलं ततः ।।३३।।
इसका कलापिंड बनाकर दो जगह स्थापित करे उसमें राशि लिप्ता से भाग
देने से जो फल प्राप्त हो उसे भावफल कहते हैं और दूसरे स्थान में १२ से भाग
देने से जो फल हो उसे भाव साधन फल कहते हैं।।३३।।
प्रकारांतर से भावफल साधन-
सूर्यभक्तावशिष्टं तु भावानां साधनं विदुः ।
राशीन् हित्वा तंतो लिप्ताखखनेत्रविभाजिताः ।।३४।।
राशिको छोड़कर अंशादि की कला बनाकर उसमें २०० से भाग देना।।३४।।

६५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
साधनघ्ना विभक्ताश्च वर्गणाभिः फलाहताः ।
उच्चादिवृद्धिहानिं च कुर्यात्तत्संख्यकाभवेत् ॥३५॥
लब्ध को पूर्व साधित भाव साधन से गुणकर अपने ध्रुवांक में भाग देना और
पूर्व प्रतिपादित भाव साधन से गुण कर अपने ध्रुवांक में भाग देना पुनः इसे
पूर्वसंपादित फल से गुण देने से जो संख्या प्राप्त हो वह कुटुम्बपोषण की संख्या
होती है॥३५॥
अष्टकवर्गफलाध्यायः ।
तत्रादावष्टकवर्गे विचारणीयः-
आत्मभावशक्तिश्च पितृचिन्ता रवेः फलम् ।
मनोवृत्तिप्रसादश्च मातृचिन्तामृगांकतः ।।१।।
आत्मा, प्रभाव, शक्ति और पिता का फल सूर्य से विचार करना चाहिये मन,
वृत्ति, प्रसन्नता और माता का विचार चन्द्रमा से करना चाहिये।।१।।
भ्रातृसत्वं गुणं भूमिंभौमेन च विचारयेत् ।
वाणिज्यकर्मवृत्तिश्च बुधेन तु विचिन्तयेत् ।।२।।
भाई, बल, गुण, भूमि का विचार भौम से करना चाहिये। वाणिज्य कर्म वृत्ति
का बुध से करना चाहिये।।२।।
गुरुणा देहपुष्टिं च विद्यापुत्रार्थसंपदः ।
भृगोर्विवाहकर्माणि भोगस्थानं च वाहनम् ।।३।।
शरीर की पुष्टि, विद्या, पुत्र, धन संपत्ति का विचार गुरु से करना चाहिये।
शुक्र से विवाह, संभोग, वाहन, वेश्या, स्त्री का विचार करना चाहिये।।३।।
वेश्यास्त्रीजनगात्राणि शुक्रेणैवनिरीक्षयेत् ।
आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकमहद्भयम् ।
सर्वक्षणं च मरणं मंदेनैव निरीक्षयेत् ।।४।।
आयुष्य, जीवन, दुःख, शोक आदि का विचार शनि से करना चाहिये।।४।।

अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५५
रविः पिता शशी माता भ्राता भौमो बुधः सुहृत् ।
मातुलेयः स्मृतो जीवो ज्ञानपुण्ये स्त्रियः सितः ।। ५ ।।
सूर्य पितृ कारक, चन्द्रमा मातृकारक, भौम भ्रातृकारक, बुध मित्र और मातुल
(मामा) कारक, गुरु विद्या और पुण्य (कर्म) कारक और शुक्र स्त्री कारक हैं।। ५ ।।
एषामृक्षे च तत्काले मरणं कुरुते शनिः ।
आदित्याष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु ।। ६ ।।
इनके नक्षत्रों में जब शनि आता है तो इन लोगों को कष्ट कारक होता है।
सूर्य के अष्टम वर्ग को ग्रह सहित स्थापनकर विचार करे।। ६ ।।
अर्कस्थितस्य नवमो राशिः पितृगृहं स्मृतम् ।
तद्राशिफल संख्याभिवर्द्धयेद्योगपिंडकम् ।। ७ ।।
सूर्य से नवम राशि पिता की होती है, उस नवम राशि में जो रेखा की संख्या
हो उससे योग पिण्ड को गुणकर।। ७ ।।
सप्तविंशोद्धृतं शेषं नक्षत्रं याति भानुजम् ।
तस्मिन्काले पितृक्लेशो भवतीति न संशयः ।। ८ ।।
२७ से भाग देने से जो शेष बचे वह अश्विन्यादि नक्षत्र की संख्या होती है
उस नक्षत्र पर जब शनि जाता है तो पिता को कष्ट होता है।। ८ ।।
तत्रिकोणगते वापि पितापितृसमोऽपिवा ।
मरणं तस्य जानीयाद्दशाच्छिद्रेषु कल्पयेत् ।। ९ ।।
अथवा इसके त्रिकोण नक्षत्र में जब शनि होता है तब पिता और पिता के
सदृश लोगों को कष्ट होता है। यदि उस समय पापग्रह की दशा हो तो मृत्यु होती
है अन्यथा कष्ट मात्र होता है।। ९ ।।
अर्कात्तु तुर्यगेराहौ मंदे वा भूमिनंदने ।
गुरुशुक्रेक्षणमृते पितृहा जायते नरः ।। १० ।।
सूर्य से चौथे स्थान में राहु, शनि, भौम में से कोई हो और उसे गुरु शुक्र
न देखते हों तो पिता का नाश होता है।। १० ।।

६५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
लग्नाच्चन्द्राद्गुरुस्थाने याते सूर्यसुते यदि ।
पित्रोर्नाशं तदा काले वीक्षिते पापसंयुते ॥९१॥
लग्न या चन्द्रमा से नवम स्थान में शनि हों और पापग्रह दृष्ट और युत हों
तो पिता का नाश होता है॥९१॥
लग्नात्सुखेशराशीशदशायाम् पितृक्षयः ।
दशानुकूलकालेन योजयेत्कालवित्तमः ॥९२॥
लग्न से चतुर्थेश के राशीश की दशा में पितां का नाश होता है किन्तु दशा
अनिष्ट न हो तो सुख होता है॥९२॥
पितृजन्माष्टमे जातस्तदीशे लग्नगेऽपिवा ।
तेनैव पितृकार्याणि करोत्यत्र न संशयः ॥९३॥
पिता के जन्मलग्न से आठवें लग्न में जन्म हो अथवा पिता के जन्मलग्न से
आठवें भाव के स्वामी बालक के जन्मलग्न में हों तो वह बालक ही पिता के सभी
कार्यों को करता है अर्थात् पिता की मृत्यु हो जाती है और वही सभी कार्य को
करता है इसमें संशय नहीं है॥९३॥
पितृसुख योग-
सुखनाथ दशायां तु सुखप्राप्तेश्च संभवः ।
सुखेशे लाभलग्नस्थे चन्द्रलग्नाद्विशेषतः ॥९४॥
सुखेश की दशा में पिता को सुख होता है। सुखेश ११ वें या जन्मलग्न
में हो तो, विशेषकर चन्द्रलग्न से॥९४॥
पितृगृहं समायुक्ते जातः पितृवशानुगः ।
तेनैव पितृकार्याणां कर्मक्षेत्रे समापयेत् ॥९५॥
दशमभाव में हो तो पिता के वश में रहने वाला होता है और वही पिता
के कर्मों को करने वाला होता है॥९५॥
पितृजन्मतृतीयर्क्षे जातः पितृधनाश्रितः ।
पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः ॥९६॥
पिता के जन्मलग्न से तीसरे लग्न में जन्म हो तो पिता के धन का भोगी होता

अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५७
है। पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में जन्म हो तो पिता के गुण के सदृश गुणवाला
होता है।।१६।।
तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेत्सुतः ।
एवमादिफलं ज्ञात्वा तान्यत्रापि नियोजयेत् ।।१७।।
और उसके स्वामी यदि जन्मलग्न में हों तो पिता से श्रेष्ठ होता है। इस प्रकार
से पूर्वोक्त के फलों की योजना यहां भी करना।।१७।।
विशेषः-
सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं तन्मासे संवत्सरेऽपि च ।
विवाहव्रतबंधादि सर्वं तत्वर्जयेत्सदा ।।१८।।
सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य हो उस राशि के मास में और
संवत्सर (उस राशि में जब गुरुहों) में विवाह व्रत-वधादि शुभकर्म को न करें।।१८।।
कलहो त्रासदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च ।
एवमादिफलं ज्ञात्वा मासं प्रति समाचरेत् ।।१९।।
अधिक शून्य वाले मास में कलह, भय, दुःखादि होते हैं इसको ध्यान में
रखते हुये मास के कार्यों को करे।।१९।।
पितृ मरणकालः-
संशोध्यपिंडं सूर्यस्य रंध्रमानेन वर्द्धयेत् ।
अर्कोद्धतावशेषर्क्षे यदा याति शनैश्चरः ।
तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्तत्रिकोणगतेऽपिवा ।।२०।।
सूर्य के अष्टकवर्ग के पिंड को सूर्य के शून्य संख्या से गुणकर १२ का भाग
देने से जो शेष बचे उस राशि में जब शनि जाता है तब उस राशि के मास में
पिता की मृत्यु होती है या उस राशि से त्रिकोण राशि में जब शनि जाते हैं तब
पिता की मृत्यु होती है।।२०।।
चन्द्राष्टकवर्गस्य फलम् -
चन्द्राच्चतुर्थभे मातुः प्रासादग्रामचिंतनम् ।
चन्द्राष्टवर्गेयद्राशौ शून्याधिक्यं प्रजायते ।।२१।।

६५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में माता, गृह और ग्राम का विचार करना चाहिये।
चन्द्रमा के अष्टकवर्ग में जिस राशि में अधिक शून्य है ।।२१।।
तं राशिं च परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत् ।
चन्द्राष्टमे शनिक्षेत्रे त्रिकोणेषु विशेषतः ।।२२।।
उस राशि में जब चन्द्रमा हो तब शुभ कर्म को न करे। चन्द्रमा से आठवें
शनि की राशि से विशेष कर त्रिकोण में हों तो ।।२२।।
आधिव्याधिदुःखान्यपि लभते नात्र संशयः ।
चन्द्रात्सुखफलात्पिंडं वर्धयेद्वैर्हतं चतत् ।।२३।।
उस समय जातक को मानसिक कष्ट, व्याधि और दुःख होता है। चन्द्रमा
से चौथे भाव के फल को खंड (पिंड) से गुणा कर २७ से भाग देने से ।।२३।।
शेषमृक्षे शनौ याते मातृहानिं विनिर्दिशेत् ।
तत्रिकोणेषु वा केचिद्दशाछिद्रेषु कल्पयेत् ।।२४।।
जो शेष हो तत्तुल्य नक्षत्र पर शनि के रहने से माता को कष्ट या मृत्यु होती
है। अथवा उस नक्षत्र से त्रिकोण नक्षत्र (१० या १९ नक्षत्र में) में शनि के रहने
से और उस समय कष्टप्रद दशा के रहने से माता की मृत्यु होती है।।२४।।
भौमाष्टकवर्गफलम् -
भौमाष्टवर्गे संचिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम् ।
भौमस्थितस्य सहजोराशिभ्रातृगृहंस्मृतम् ।।२५।।
भौमाष्टक में भाई, पराक्रम और धैर्य का विचार करना चाहिये। भौम से तीसरे
भाव से भाई का विचार करना चाहिये ।।२५।।
त्रिकोण शोधनं कृत्वा यत्रभूयांसि तत्रवै ।
भूमिर्भवति भार्यावा भ्रातृगेहसुखं तथा ।।२६।।
भौमाष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस राशि में अधिक शेष हो उस
राशि में जब भौम जाता है तो भूमि का स्त्री का लाभ और भाई तथा गृह का सुख
होता है।।२६।।
भौमो बलविहीनश्चेत् दीर्घायुर्भातृकोभवेत् ।
फलानि यत्र क्षीयन्ते तत्रभूमिहानिः स्मृतः ।।२७।।

अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६५९
यदि भौम निर्बल हो तो भाई दीर्घायु होता है। और जिस राशि में फल की
कमी हो उस पर भौम के जाने से भूमि की हानि होती है।।२७।।
तद्राशिफलसंख्यैश्च वर्धयेच्छोध्यपूर्ववत् ।
शेषर्क्षे च शनौ याते भ्रातृहानिर्विनिर्दिशेत् ।।२८।।
फलों के योग को पिंड से गुणा कर पूर्ववत् २७ का भाग देने से शेष नक्षत्र
मे शनि के जाने से भाई की मृत्यु होती है।।२८।।
अथ बुधाष्टकवर्गफलम् –
बुधात्तूर्ये कुटुम्बं च धनं मित्रादिमातुलाः ।
तत्पंचमे मंत्रविद्यालिपि बुध्यादि चिंतयेत् ।।२९।।
बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब, धन, मित्र, मामा आदि का और बुध से पाँचवें
भाव में मंत्र शास्त्र, लेखन और बुद्धि का विचार करना चाहिये।।२९।।
बुधाष्टवर्ग संशोध्य शेषमृक्षगते शनौ ।
बंधुमित्रादि नाशादींल्लभतेनात्र संशयः ।।३०।।
बुधाष्टक वर्ग में पूर्ववत् संशोधन करके राशिपिंड से योग पिंड को गुणाकर
२७ से भाग देने से शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण नक्षत्र में शनि के जाने से बंधु
मित्रादि का नाश होता है।।३०।।
अथ गुर्वष्टकवर्गफलम् –
• जीवात्पंचमतो ज्ञानं पुत्रधर्मधनादिकम् ।
गुरोरष्टकवर्गेषु संतानमपि कल्पयेत् ।।३१।।
गुरु से पाँचवें भाव में संतान का विचार करना चाहिये। इसी प्रकार गुरु के
अष्टकवर्ग में भी संतान विचार करना चाहिये।।३१।।
गुरुस्थितसुतस्थाने यावच्च विद्यते फलम् ।
शत्रुनीचगृहं त्यक्त्वा तावंतश्च सुताः स्मृताः ।।३२।।
गुरु से पाँचवें भाव में जितना फल हो उतने ही संख्यक संतान होते हैं यदि
वह राशि गुरु की शत्रु और नीच राशि न हो तो।।३२।।

६६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
सुतभेशनवांशैश्च तुल्या वा सन्ततिर्भवेत् ।
व्ययार्थसुतसंस्थैश्च पापैः स्यात्क्षीणसन्ततिः ।।३३।।
पंचमेश के नवांश संख्या के तुल्य संतान की संख्या होती है। १२, २,
५ वें पापग्रह के तुल्य संतति की हानि होती है। पूर्व राशिपिंड को योगपिंड से
गुणा कर २७ का या १२ का भाग देकर शेष तुल्य नक्षत्र या राशि में शनि के
जाने से पुत्र को कष्ट होता है।।३३।।
अथ शुक्राष्टकवर्गफलम् -
भृगोरष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु ।
येषु येषु फलानि स्युर्भूयांसि किलतत्रतु ।।३४।।
शुक्र का अष्टक वर्ग ग्रहों के साथ रखकर देखना चाहिये जहाँ जिस राशि
में अधिक फल हो उस राशि पर जब शुक्र होते हैं तो जातक को।।३४।।
भूमिं कलत्रं वित्तं च तद्देशे निर्दिशेन्नृणाम् ।
शुक्रजामित्रतो लब्धिर्दिशान्वितदिग्भवा ।।३५।।
उस समय भूमि, स्त्री और धन का लाभ उस राशि के देश से प्राप्त होता
है। शुक्र से सातवें स्थान की दशा अथवा सप्तमेश की दशा में स्त्री आदि का लाभ
होता है।।३५।।
भृगुदारेशयुक्तर्क्षफलसंख्या स्त्रियो विदुः ।
शुक्रान्मन्दे त्रिकोणस्थे नेष्टं जीवे सुखप्रदम् ।।३६।।
शुक्र अथवा सप्तमेश के युत राशि के फल के तुल्य स्त्री की संख्या होती
है। शुक्र से त्रिकोण में जब गुरु होता है तब स्त्री को सुख होता है। शेष पूर्ववत्
देखना चाहिये।।३६।।
अथ शनेरष्टकवर्गफलम् -
शनैश्चरस्तिस्थस्थानादष्टमं मृतिरुच्यते ।
शनेरष्टकवर्गाच्च स्वस्यायुष्यं विनिर्दिशेत् ।।३७।।
शनि से आठवां भाव मृत्यु का होता है और शनि के अष्टकवर्ग से आयु
का विचार करना चाहिये।।३७।।

अष्टकवर्गफलाध्यायः । ६६१
लग्नात्प्रभृति मंदान्तं फलान्येकत्र कारयेत् ।
लग्नादिफलयोगाब्दे व्याधिबैरं समादिशेत् ।। ३८ ।।
शनि के अष्टकवर्ग में लग्न से शनि पर्यन्त फलों (रेखा) का योग करना चाहिये
उस योग के समान वर्ष में जातक को व्याधि और बैर का भय होता है ।। ३८ ।।
मन्दादिलग्नपर्यन्तं फलान्येकत्र संयुतम् ।
मंदादिफलतुल्याब्दे व्याधिं तस्य समादिशेत् ।। ३९ ।।
इसी प्रकार शनि से लग्न पर्यन्त फलों को एकत्र जोड़कर जो हो तत्तुल्यवर्ष
में भी व्याधि भय कहना ।। ३९ ।।
तयोर्योगसमाब्दे तु मृत्युयोगं समादिशेत् ।
शोध्यादिगुणं कृत्वा पिंडं संस्थाप्ययत्नतः ।। ४० ।।
और दोनों फलों के योग तुल्य वर्ष में मृत्यु होती है। शोधनादि करने से
जो पिंड आवे ।। ४० ।।
अष्टमस्थफलैर्हत्वा स्वप्तविंशति भाजितम् ।
शतादूर्ध्वं तु तत्पिंडं शतभेवाग्रतस्त्यजेत् ।। ४१ ।।
उसे अष्टमभावस्थ फल से गुणा कर २७ से भाग देने से यदि पिंड सौ से
अधिक हो तो १०० को ही रखना ।। ४१ ।।
आयुः पिंडं तु जानीयात्प्राग्वद्धेलांतुकल्पयेत् ।
त्रिकोणैकाधिपत्यर्क्ष शोधनं विरचय्य चं ।। ४२ ।।
और उसी से गुणाकर २७ से भाग देने से आयु पिंड होता है इस पर
से पूर्ववत् मृत्यु काल का निश्चय करना एकाधिपत्य शोधन से जो पिंड
हो ।। ४२ ।।
पिंडं संस्थाप्य गुणयेल्लग्नादष्टमगैः फलैः ।
सप्तविंशतिहृच्छेषं मृत्युकालं वदेद्बुधः ।। ४३ ।।
उसे अष्टमस्थ फल से गुणाकर २७ का भाग देने से जो शेष हो उस
नक्षत्र पर शनि के जाने से या उससे त्रिकोण के नक्षत्र पर जाने से मृत्यु
होती है ।। ४३ ।।

·६६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
विशेषः-
मार्त्तण्डपुत्राष्टकवर्गमध्ये यद्यद्गृहे शून्यफलं भवेच्च।
तत्तद्द्रमध्ये रविजेऽथ सूर्ये तदा शरीरामयपीडनंस्यात्।।४४।।
शनि के अष्टकवर्ग में जिन-जिन राशियों में शून्य फल हो उन-उन राशियों
में जब शनि या सूर्य जाते हैं तब-तब शरीर में रोग और कष्ट होता है।।४४।।
अवस्थात्रयविचारः-
मीनाद्यं मिथुनांतकं प्रथमकं प्रोक्तं वयः प्राक्तनैः ।
कर्काद्यं वणिजांतकं तरुणता संज्ञं च मध्यंवुधैः।।४५।।
मीन राशि से मिथुन राशि पर्यन्त प्रथम अवस्था पूर्वाचार्यों ने कल्पना की
है। कर्क से तुला पर्यन्त युवा अवस्था।।४५।।
कुभांतं स्थविराह्वयं च बहुभिर्यत्तत्फलैः संयुतम् ।
तत्सौख्यार्थविशेषकं बलयुतेहित्वाव्ययाष्टकम् ।।४६।।
और वृश्चिक से कुभं पर्यन्त वृद्धा अवस्था की कल्पना की है उक्त अवस्था
के भावों के (सर्वाष्टक वर्ग) रेखाओं का योग करना जिस अवस्था में अधिक रेखा
हो उस अवस्था में जातक को विशेष सुख होता है। किन्तु इसमें ८ वें और १२
वें भाव की रेखाओं का योग नहीं करना चाहिये।।४६।।
इत्यष्टकवर्गफलम्।
अथसर्वाष्टकवर्गफलम् –
मेषादिभानां सकलाष्टवर्ग
उत्पन्नरेखागणमेवकुर्यात् ।
धृत्यादि तत्त्वांतमितं कनिष्ठं
त्रिंशावसानं किल मध्यवीर्याः ।।४७।।
सर्वाष्टकवर्ग में मेषादि राशियों की रेखाओं का योग करना, रेखाओं का योग
१८ से २५ तक हो तो कनिष्ठ फल, इसके बाद ३० तक हो तो मध्यम फल।।४७।।
त्रिंशाधिकं तूत्तमवीर्यदाः स्युः
शरीरसौख्यार्थयशोविशेषः ।