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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

६३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथैतच्छास्त्राधिकारिलक्षणम् -
गणितेषु प्रवीणश्च शब्दशास्त्रे कृतश्रमः ।
न्यायविद्बुद्धिमान् होरास्कंधश्रवणसम्मतः ॥४३॥
जो गणित शास्त्र में कुशल हो, व्याकरण में निपुण हो, न्यायशास्त्र को जानने
वाला हो, बुद्धिमान् ।।४३।।
दैवविद्देशिको देवसंमतो देशकालवित् ।
ऊहापोहपटुः प्राज्ञः पटुः स्वजनसंमतः ॥४४॥
साहित्य शास्त्र में कुशल हो, नित्य देवाराधन करने वाला हो, देश-काल
को जानने वाला हो, तर्क और समाधान करने में समर्थ हो और स्वजनों के अनुकूल
रहने वाल चतुर हो वह इस शास्त्र को पढ़ने और फल कहने का अधिकारी होता
है।।४४।।
इति पाराशरहोरायामुत्तरभागेभावफलाद्यानयनेद्वितीयोऽध्यायः ।
अथैष्टकष्टाध्यायः ।
उच्चरश्मिसाधनम् -
नीचोनं तु ग्रहं भार्धाधिके चक्राद्विशोधयेत् ।
उच्चरश्मिर्भवेद्राशिः सैको द्विघ्नांशसंयुतः ॥१॥
ग्रह में उसके नीच को घटा देना शेष ६ राशि से अधिक हो तो उसे १२
राशि में घटाकर राशि में १ जोड़ देना और अंशादि को दूना कर राशि में जोड़
देना तो उच्चरश्मि होगी।।१।।
जैसे- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें सूर्य का नीच ६।१० घटाने से शेष
९।८।२६।३४ शेष रहा यह ६ राशि से अधिक है इसलिये इसे १२ राशि में
घटाने से शेष २।२१।३३।२६ शेष बचा यहाँ राशि में १ जोड़ने से ३ अंशादि
को दूना कर इसमें जोड़ने से ३।४३।६।५२ यह सूर्य की उच्चराशि हुई इसी प्रकार
सभी ग्रहों की उच्चरश्मि साधन करना चाहिये।
उच्चरश्मिचक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
३५६५५४६
४३२०३०४०४४४९३४
६५८४७४५१८५३३८

अथैष्टकष्टाध्यायः। ६३१
चेष्टारश्मिसाधनम् –
सायनार्कः सत्रिभो इन्दुश्च भानुवर्जितः ।
चेष्टाकेन्द्रं कुजादीनां पूर्वाध्याये समीरितम् ।।२।।
सूर्य में अयनांश जोड़कर उसमें ३ राशि जोड़ने से सूर्य का चेष्टाकेन्द्र और
चन्द्रमा में सूर्य को घटाने से चन्द्रमा का चेष्टाकेन्द्र होता है। और भौमादि का चेष्टाकेन्द्र
पूर्वाध्याय में कहा ही हुआ है।।२।।
शुभाशुभरश्मिसाधनम् –
उच्चरश्मिभवदानीय चेष्टारश्मिं द्वयोर्युतेः ।
दलं तु शुभरश्मिः स्यादष्टभ्यो वर्जितोऽशुभः ।।३।।
चेष्टाकेन्द्र पर से उच्चरश्मि साधन के तरह चेष्टारश्मि का साधन कर दोनों
(उच्चरश्मि और चेष्टारश्मि) का योग कर आधा करने से जो आवे वह शुभरश्मि
होती है और इसे ८ में घटाने से अशुभरश्मि होती है।।३।।
जैसे- सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें अयनांश २१।५१।१८ जोड़ने से
४।१०।१७।५२ सायन सूर्य हुआ इसमें ३ राशि जोड़ने से ७।१०।१७।५२
यह सूर्य का चेष्टाकेन्द्र हुआ इस पर पूर्वोक्त रीति से ५।३९।२४ सूर्य की रश्मि
हुई।।३।।
चेष्टारश्मिचक्र।
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | |
| ५ | १ | ३ | २ | १ | ४ | ४ | चेष्टाकेन्द्र |
| ३९ | ३१ | ५१ | ४ | ४८ | ४२ | २८ | |
| २४ | ५० | ४२ | ३० | ४२ | ५६ | ४ | |
| ४ | ३ | ५ | ३ | ३ | ४ | ५ | शुभ रश्मि |
| ४१ | २६ | ११ | ५२ | ४६ | ४६ | ३१ | |
| ३० | २४ | १४ | ३७ | ३० | २२ | २१ | |
| ३ | ४ | २ | ४ | ४ | ३ | २ | अशुभ रश्मि |
| १८ | १३ | ४८ | ७ | १३ | २३ | २८ | |
| ३० | ३६ | ४६ | २३ | ३० | ३८ | ३९ | |
इष्टकष्टसाधनम् –
उच्चचेष्टाकरौ व्येकौ दिग्भिर्हत्वा तु योजयेत् ।
दलयेदिष्टमन्यत्स्यात्षष्टिभ्यो वर्जितं फलम् ।।४।।
ग्रहों के उच्चरश्मि और चेष्टारश्मि में एक एक घटाकर १० से गुणा कर दोनों
का योग कर आधा करने से इष्ट होता है इसे ६० में घटाने से कष्ट होता है।।४।।

६३२
बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
जैसे- सूर्य की उच्चरश्मि ३।४३।६ में १ घटाकर १० से गुणा करने से
२७।११।१० हुआ, चेष्टारश्मि ६।३९।३४ इसमें १ घटाकर १० से गुणा करने
से ५६।३४।० हुआ दोनों का योग कर आधा करने से ४१।५२।३० यह सूर्य
का इष्ट हुआ इसे ६० में घटाने से १८।७।३ कष्ट हुआ, इसी प्रकार सभी ग्रहों
का इष्ट और कष्ट साधन करना चाहिये।
इष्टचक्रम्। कष्टचक्रम्।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
४१२३४११७१३३७४५१८३६१८४२४६२२१४
५२४५२४५२४४१३७३६७५५७१५४६
३००२५२२२०५३०३००३५३८३०५५३०
सप्तवर्गजशुभाशुभसाधनम् -
स्वोच्चे मूलत्रिकोणे च स्वक्षेंधिसुहृदि क्रमात् ।
मित्रर्क्षे च समक्षे च शत्रुभेचातिशत्रुमे ।।५।।
ग्रह अपने उच्चराशि, मूलत्रिकोण, अपने राशि, अधिमित्र की राशि, मित्र
की राशि, सम की राशि, शत्रु की राशि, अतिशत्रु की राशि।।५।।
नीचे च षष्ठिरिष्वब्धिः रवाग्निःकरकरास्तिथिः ।
नागा वेदाः करौ शून्यं शुभमेतद् प्रकीर्तितम् ।।६।।
और नीच राशि में हो तो क्रम से ६०, ४५, ३०, २२, १५, ८, ४,
२, ० ये ध्रुवांक शुभ फल के प्राप्त होते हैं।।६।।
षष्टिभ्यो वर्जिताश्चैतेषाष्टिं स्यादशुभं फलम् ।
तदर्थं तु फलं प्रोक्तमन्यवर्गे शुभाशुभम् ।।७।।
इनको ६० में घटा देने से अशुभ ध्रुवांक होता है। अन्य वर्गों (होरा आदि
सप्तवर्ग) के राशियों में स्वउच्चादि में हों तो पूर्वोक्त ६० आदि बलों का आधा
शुभ में और आधा पापवर्ग में लेना।।७।।
पूर्वोक्तबले शुभाशुभत्वम् -
पंचस्विष्टफलं चादौ षष्ठं सममुदाहृतम् ।
अशुभास्तु त्रयः प्रोक्ता इति शास्त्रेषु निश्चयः ।।८।।
पूर्वं में कहे हुये ९ प्रकार के वलों (उच्चमूलत्रिकोणादि) में आदि से पाँच
वल (उच्च मूलत्रिकोण, स्वराशि, अधिमित्र, मित्र) शुभद हैं, छठाँ (समराशि) सम
और शेष ३ अशुभ होते हैं।।८।।
१- वेदकश इति पाठान्तरम्।

अथैकषष्ठाध्यायः। ६३३
दिग्बलादौ शुभाशुभत्वम् -
दिग्बलं दिक्फलं तस्य तथा दिनफलं भवेत् ।
तयोः फलं शुभं प्रोक्तं षष्ट्या वर्ज्यं तथेतरम् ।।१९।।
जो ग्रहों का दिग्बल है वह दिक्फल हैं और जो दिनबल है वह दिन फल
हैं, दोनों फलों का योग करने से शुभ फल और इसे ६० में घटाने से शेष अशुभ
फल होता है।।१९।।
शुभाधिके शुभं नेष्टमशुभे चाधिके शुभात् ।
बलैरेव हते स्यातां दृष्टिं हन्यात्स्फुटैव सा ।।२०।।
यदि शुभफल पापफल से अधिक है तो उस ग्रह का फल शुभ, अशुभ फल
अधिक हो तो अशुभ फल होता है। पूर्वोक्त इष्टबल, कष्टबल (श्लोक ५ में) उससे
दृष्टि को गुणा कर देने से इष्टदृष्टि और कष्टदृष्टि होती है।।२०।।
पूर्वोक्तशुभाशुभबलस्यस्पष्टीकरणम् -
बलैः षड्भिः समेधित्वा समानीतैः पृथक्-पृथक्।
बलिनश्चोक्तसंज्ञैश्च बलैरेव हरेत्ततः ।।२१।।
ग्रह षड्बलों (होरा आदि षड्बल) को ६ स्थान में रखकर इष्टबल से तथा
कष्टबल से अलग अलग गुणकर पृथक् पृथक् षड्बलों से भाग देकर सभी फलों
का योग करने से इष्ट स्थान स्पष्ट शुभ और कष्ट स्थान में स्पष्ट अशुभ फल होता
है।।२१।।
तत्तद्वलफलानि स्युरशुभानि शुभानि च ।
शुभपापफलाभ्यां च दृष्टिं हन्याद्वलं तथा ।।२२।।
इसी प्रकार से दृष्टि के इष्ट कष्ट से दृष्टिबल को गुणाकर भाग देने से दृष्टि
का शुभाशुभ फल होता है।।२२।।
सग्रहे भावफले विशेषः-
दृष्टेश्च शुभ पापोत्थे बले स्यातां तथैव च ।
भावानां च फले प्रोक्ते पतीनां च फले उभे ।।२३।।
तन्वादि भावों के भी दो फल (भाव का तथा उसके स्वामी का) होता है दोनों
के योग के तुल्य भाव का शुभाशुभ फल होता है।।२३।।
सराशिर्गृहयुक्तश्चेद्वसाधनसंगुणे ।
फले तस्य शुभे युंज्यादशुभे वर्जयेच्छुभे ।।२४।।

६३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
यदि भावस्थ राशिग्रह युक्त हो तो भाव साधन से गुणा कर दे और शुभग्रह
भाव में हो तो उस भाव के शुभ फल को फल में जोड़ दे और अशुभ भावफल
में घटा दे और भाव में ।। १४ ।।
पापांश्रेदन्यथा चैवं बले दृष्ट्यां च तेऽत्रतु ।
युंज्यादुच्चादिषु फलममित्रादिषु वर्जयेत् ।। १५ ।।
पापग्रह हो तो इससे विपरीत करने से भाव का इष्ट (शुभ) और कष्ट (अनिष्ट)
स्पष्ट होता है। इसी प्रकार दृष्टि में भी करना चाहिये किन्तु यह फल यदि उच्चादि
का हो तो योग और शत्रु आदि का हो तो घटाना चाहिये ।। १५ ।।
अष्टकवर्गे विशेषः-
स्थाने चैवं क्रमात्प्रोक्तं करणेचान्यथाक्रमः ।
राशिद्वयगते भावे तद्राश्यधिपतेः क्रिया ।। १६ ।।
इसी प्रकार से स्थान (रेखा) में भी (अष्टकवर्ग में) क्रिया करनी चाहिये किन्तु
करण (बिन्दु) में विपरीत क्रिया होती है, एक ही भाव में २ राशि हो तो उनके
स्वामी के साथ क्रिया करनी चाहिये ।। १६ ।।
स्थानाधिकस्तु भावेन लाभभावः प्रकीर्त्तितः ।
तत्समाने च तद्भावे तदानीं स्थानदान् ग्रहान् ।। १७ ।।
संयोज्य स्थानसंख्यायां दलमेतत्समं भवेत् ।। १८ ।।
भाव से रेखा अधिक हो तो उस भाव का फल या भाव लाभदायक होता
है। यदि दोनों भावों में अधिक रेखा हो तो दोनों का योग कर आधा करने से जो
आवे उसके समान ही भावफल होता है ।। १७, १८ ।।
इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे इष्टकष्टाध्यायस्तृतीयः । ३
अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः ।
विधात्रालिखिता या साललाटाक्षरमालिका ।
तस्याः शरीरकथनं वक्ष्यामि च पृथक्-पृथक् ।। १ ।।
विधाता (ब्रह्मा) ने ललाट में जो अक्षरों की पंक्ति लिखी है उसको मैं शरीर
के रूप में पृथक् पृथक् कह रहा हूँ ।। १ ।।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३५
लग्नाच्छरीरचिन्ता च द्वितीयात्स्वं च पैतृकम् ।
भरणीयं कुटुंबं च पश्वादिं च वदेद्बुधः ॥२॥
लग्न (तनु भाव) से शरीर की चिन्ता का, विचार करना चाहिये और द्वितीय
भाव से अपने उपार्जित धन और पैतृक संपत्ति, पालनीय कुटुंब का तथा पशु आदि
का विचार करना चाहिये ॥२॥
तृतीयात्सोदरं बुद्धिं दुःपूर्वा विक्रमं विदुः ।
चतुर्थात्पितरं वेश्म सुखं लालित्यमेव च ॥३॥
तीसरे भाव से भाइयों का, दुष्ट बुद्धि का और पराक्रम का विचार करना चाहिये,
चौथे भाव से गृह का, सुख का, सौहार्द का विचार करना चाहिये ॥३॥
सौमनस्यमपत्यानि प्रज्ञां मेधां च पंचमात् ।
हानिं व्याधिमरिं षष्ठान्मैथुनं स्त्रीं जयं ततः ॥४॥
पांचवें भाव से सौमनस्य (मन की प्रसन्नता) का, संतान का, सुबुद्धि का और
धारणा शक्ति का विचार करना चाहिये । छठें भाव से हानि, व्याधि (रोग) और शत्रु
का विचार तथा सप्तम भाव से मैथुन, स्त्री और युद्ध में विजय का विचार करना
चाहिये ॥४॥
मृतिं पराजयं दुःखं हानिं व्याधिं तथाष्टमात् ।
सौशील्यभाग्यधर्मांश्च नवमाद्दशमात्तथा ॥५॥
मानास्पदाज्ञाकर्माणि आयादर्थं व्ययाद्व्ययम् ।
आठवें भाव से मृत्यु का, पराजय का, दुःख (व्यसन) का, हानि का, व्याधि
का विचार करना चाहिये। नवम भाव से सुशीलता, भाग्य, वैभव और धर्म का
विचार करना चाहिये । दशम भाव से सत्कार, स्थान, आज्ञा और शुभाशुभ कर्म
का विचार करना चाहिये ॥५॥ ग्यारहें भाव से द्रव्य के प्राप्ति का और बारहें भाव
से व्यय का विचार करना चाहिये ।
उच्चस्थानस्थ रश्मि ध्रुवांकः-
दिग्भवेष्विषुसंप्ताष्टशराः स्वोच्चे करा रवेः ॥६॥
यदि सूर्यादि ग्रह अपने उच्च राशि में हो तो क्रम से १०, ११, ५, ५,
७, ८, ५ यह रश्मि ध्रुवांक होता है ॥६॥
नीचेन चांतरा प्रोक्ता रश्मयस्त्वनुपातजाः ।
नीचोनं तु ग्रह- म्नाधिके चक्राद्विशोधयेत् ॥७॥

६३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
नीच राशि का ध्रुवांक नहीं है, उच्च नीच के मध्य में अनुपात द्वारा रश्मि
का साधन करना चाहिये वह इस प्रकार से— नीच को ग्रह में घटा दे यदि शेष
६ राशि से अधिक हो तो उसे १२ राशि में घटाकर।।७।।
स्वीयरश्मिहतं षड्भिर्भजेत्स्यूरश्मयःस्वकाः ।
उच्चस्वर्क्षसुहृत्स्वभागैऽगाब्धि द्विसंगुणाः ।।८।।
नीचारिद्वादशांशे तु नृपांशोनाः कराश्च ते ।
शेष को ग्रह के उच्च रश्मि ध्रुवांक से गुणकर उसमें ६ से भाग देने से लब्ध
रश्मि होती हैं। ग्रह उच्च, स्वराशि मित्र की राशि के द्वादशांश में हो तो क्रम से
६, ४, २ से गुण देने से।।८।।
और नीच शत्रु के द्वादशांश में हो तो षोडशांश कम कर देने से स्पष्ट रश्मि
होती है।
जैसे सूर्य ३।१८।२६।३४ इसमें सूर्य के नीच ६।१० को घटाने से
८।२२।२६।३४ हुआ यह ६ राशि से अधिक है अतः इसे १२ राशि में घटाने
से शेष ३।७।३३।२६ हुआ इसे ध्रुवांध १० से गुणा करने से ३१।५।३४।२०
हुआ इसमें ६ से भाग देने से लब्धि ५।५।५५।५२ यह सूर्य की रश्मि हुई। सूर्य
शनि के द्वादशांश में है और सूर्य का शनि अधिशत्रु है अतः पूर्वोक्त रश्मि का
षोडशांश ०।१९।४४।४४ रश्मि में घटाने से शेष ४।२५।४८।५२ यह सूर्य
की स्पष्ट रश्मि हुई इसी प्रकार से शेष ग्रहों की रश्मि का साधन करना चाहिये।
रश्मि चक्र।

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
४१५०३१११०९
२५४८३२५३३५
४८२६५३४८२६३५१.२
विशेष संस्कारः—
मूलत्रिकोणस्वर्क्षाधिमित्रमित्रनवांशके ।।९।।
यदि ग्रह अपने मूलत्रिकोण, अपनी राशि, अधिमित्र की राशि, मित्र की राशि
में नवांश की राशि।।९।।
द्रेष्काणेऽपि च होरायां त्रिंशांशे च क्रमात्तथा ।
अष्टघ्ना द्व्यब्धिषट्सप्तभक्ता युक्तास्तुरश्मयः ।।१०।।
अरावध्यरिनीचे च वेदद्व्यखिलहीनकाः ।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३७
द्रेष्काण की राशि, होरा और त्रिंशांश की राशि जिसमें हो उसे देखकर ध्रुवोत्पन्न
रश्मि (८-९ श्लोकोक्त) को ८ से गुण कर क्रम से मूलत्रिकोण में २ से, अपनी
राशि में ४ से, अधिमित्र में ६ से और मित्र में ७ से भाग देकर लब्धि के पूर्वोक्त
रश्मि में जोड़ने से उच्च रश्मि होती है।।१०।।
पूर्वोक्त वर्गों में यदि शत्रु राशि हो तो चार से भाग देकर लब्धि को घटाने
से अधि शत्रु राशि हो तो २ से भाग देकर और नीच राशि में हो तो संपूर्ण को
घटाने से उच्च रश्मि होती है।
अन्य संस्कारः-
उच्चे च त्रिगुणं प्रोक्तं स्वत्रिकोणे द्विसंगुणम् ।।११।।
यदि रश्मि का स्वामी अपने उच्च राशि में हो तो उच्च रश्मि को त्रिगुणित,
अपने मूल त्रिकोण राशि में हो तो द्विगुणित।।११।।
स्वर्क्षे त्रिघ्ना द्विसंभक्तास्त्वधिमित्रगृहेऽपि च ।
वेदघ्ना रामसंभक्ता मित्रमे षड्गुणास्ततः ।।१२।।
स्वराशि में होते त्रिगुणित कर दो से भाग देना और अधिमित्र की राशि में
हो तो पूर्व रश्मि को चार से गुणाकर तीन से भाग देकर लब्धि को पूर्व रश्मि में
जोड़ने से, मित्र के राशि में ६ से गुणा कर ५ का भाग कर लब्ध को रश्मि में
जोड़ने से।।१२।।
पंचभक्तास्त्वथ शत्रुगृहे द्विघ्नाश्चतुर्हताः ।
अधिशत्रोः करघ्नाश्च पंचभक्ता न नीचभे ।।१३।।
शत्रु के गृह में हो तो २ से गुणा कर ४ से भाग देकर लब्ध को जोड़ने
से स्पष्ट रश्मि होता है। और अधि शत्रु की राशि में हो तो दूना कर पाँच से भाग
देकर लब्धि को जोड़ने से स्पष्ट रश्मि होती है। नीच राशि में हो तो कोई संस्कार
नहीं करना।।१३।।
मतांतरात् रश्मि हानिवृद्धिः-
शनिं सितं बिना ताराग्रहा अस्तंगता यदि ।
विरश्मयो भवन्त्येवं वक्रादौ द्विगुणास्ततः ।।१४।।
शनि शुक्र को छोड़कर शेष ग्रह (भौम, बुध, गुरु) अस्त हों तो रश्मि का
अभाव होता है, रश्मिपति वक्रारंभ में हों तो पूर्व रश्मि को दूना करने से।।१४।।

६३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अनुपातोंऽन्तरे वक्रं त्यागेऽष्टांशविहीनकाः ।
मंदायां दशभागोना वस्वंशोना कराःस्मृताः ।। १५ ।।
वक्र के अन्त्य में हो तो रश्मि में ८ से भाग देने से लब्ध स्पष्ट रश्मि होती
है, वक्र के मध्य में हो तो अनुपात द्वारा रश्मि लाना चाहिये। रश्मिपति मंदगति
हो तो रश्मि का दशांश पूर्व रश्मि में घटाने से, यदि मंदतर गति हो तो अष्टमांश
हीन करने से ।।१५।।
तथा शीघ्रतरायां च वेदांशोनाः कराः स्मृताः ।
अंगाशोनाश्च शीघ्रायां केचिदेवं वदन्ति हि ।। १६ ।।
शीघ्रगति हो तो छठाँ भाग हीन करने से और शीघ्रतर गति हो तो चतुर्थांश
हीन करने से स्पष्ट रश्मि होती है ऐसा कुछ ऋषियों का मत है।।१६।।
अथ ग्रहाणां अष्टधा गतिः-
वक्रानुवक्रा विकला शीघ्रा शीघ्रतरागतिः ।
वृद्धिहीने तु शिष्टे द्वे वर्जनीये समासमा ।। १७ ।।
वक्र, अनुवक्र, विकला, शीघ्रगति, शीघ्रतरा, मंदगति, मंदतरा, समासमा
ये आठ प्रकार की ग्रहों की गति होती हैं। शीघ्रतर गति वृद्धि हीन होने से मंदगति
और शीघ्रगति वृद्धिहीन होने से अतिमंदतर होती है।।१७।।
योगविशेषात्ह्रासवृद्धिः ।
योगेषु ये ग्रहाः प्रोक्तास्तेषां योगे च रश्मयः ।
पापसौम्यरिमित्राणां योगे हानिश्च कीर्त्तिताः ।। १८ ।।
उच्चादिषु पूर्वोक्ताः पापो बलवशाद्भवेत् ।। १९ ।।
पूर्व में जो राजयोग कहे गये हैं उनमें (राजयोग कारक और दरिद्र योग कारक)
राजयोग कारक ग्रहों के रश्मियों के योग में दरिद्र योग कारक ग्रहों के रश्मियों को
घटा देने से शेष राजयोग कारक रश्मि होती है।। १८ ।।
इसी प्रकार पापग्रहों की उच्चादि नव स्थान पर्यन्त रश्मियों को उनके बल
के अनुसार न्यूनाधिक करने से उनकी स्पष्ट रश्मि होती है।।१९।।

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६३९
द्विग्रहादियोगे निर्णयः-
द्विग्रहादिषु योगेषु ग्रहभावकलाहताः ।
ग्रह गति संज्ञानुरूपेण फलानां निर्णयः स्मृताः ।।२०।।
दो तीन आदि ग्रहों के योग में ग्रहों के भाव के फलादि को उनके रश्मियों
से गुण देना यदि साठ ६० से अधिक हो तो ६० से भाग देने से लब्धि स्पष्ट
रश्मि होती है। ग्रहों के रश्मियों का फल उनके गति के अनुसार ही होता है।।२०।।
इष्टकष्टरश्मेः प्रयोजनम् –
इष्टकष्टबलसंगुणास्ततस्तत्करानथ च संयुतास्तुतान्।
निश्चितार्थमखिलं समीक्ष्यतत्रस्तुतं तु सकलं वदेद्बुधः।।२१।।
ग्रहों के इष्ट कष्ट बल से उनके रश्मियों को गुणकर उसमें ६० से भाग देने
से ग्रहों की इष्ट और कष्ट रश्मि होती है। इन सम्पूर्ण रश्मियों को देखकर ग्रहों
के फलों को कहना चाहिये।।२१।।
एकतः पंचरश्मियोग फलम् –
एकादि पंचकं यावद्दरिद्रा भृशदुःखिताः ।
नीचानां दासतां याता अपि जाता कुलोत्तमे ।।२२।।
एक से पांच रश्मि योग में उत्पन्न पुरुष अत्यंत दुःखी होता है। यदि उत्तम
कुल में उत्पन्न पुरुष हो तो नीचों की नौकरी करता है।।२२।।
दशरश्मियोग फलन् –
परतो दशकं यावत्केवलं जठराय वै ।
निःस्वाः कदाचिद्दासाश्च भारवाहाः कदाचन ।
स्त्रीपुत्रगृहहीनाश्च वंशायोग्यक्रियारताः ।।२३।।
६ से १० तक रश्मियोग हो तो पुरुष केवल पेट भरनेवाला, निर्धन, कभी
दासता करनेवाला, कभी बोझा ढोने का काम करनेवाला, स्त्री पुत्र से हीन और कुल
के विपरीत कार्य करनेवाला होता है।।२३।।
एकादशतो त्रयोदशपर्यन्तं रश्मिफलम् –
एकादशेऽल्पपुत्रस्यादल्पस्वं स्त्रीविमानितः ।
विभ्रति कृच्छ्रेण निजं स्वल्पं च कुटुम्बकम् ।।२४।।
ग्यारह रश्मियोग हो तो अल्पपुत्र, अल्पधन और स्त्री से अनादर और थोड़े
कुटुम्ब को भी कष्ट से पालन करनेवाला होता है।।२४।।

६४० वृहतपाराशरहोराशास्त्रम् ।
द्वादशे निर्धनः मूर्खाधूर्ताः सत्त्वविनाशकाः ।
त्रयोदशे च चौराः स्युर्निर्धनाः कुलपांशवाः ॥२५॥
बारह रश्मियोग हो तो निर्धन, मूर्ख, सत्त्वहीन होता है, तेरह रश्मियोग में
चोर निर्धन और कुलकलंक होता है॥२५॥
चतुर्दशतः पञ्चदश रश्मि फलम् -
विद्वांश्चतुर्दशे धर्मेरतो मर्षी धनार्जकः ।
कुटुम्बभरणे सक्तः कुलयोग्यक्रियो भवेत् ॥२६॥
चौदह रश्मियोग हो तो धार्मिक, क्रोधहीन, धन को पैदा करनेवाला, कुटुम्ब
के भरण पोषण में समर्थ और कुलयोग्य क्रिया करनेवाला होता है॥२६॥
रश्मिभिः पंचदशभिरेवं पूर्वोक्त गुणयुतोऽपिसन् ।
स्ववंशमुख्यो जनवानित्याह भगवान्मुनिः ॥२७॥
पंद्रह रश्मियोग में पूर्वोक्त गुणों से युक्त होते हुए भी अपने कुल में प्रधान
और धनी होता है ऐसा पराशर मुनि ने कहा है॥२७॥
षोडशतः द्वाविंशतिपर्यन्त रश्मियोग फलम् -
आविंशतेः कुलेशानां बहुभृत्यः कुटुम्बिनः ।
कीर्त्तिमंतश्च पूर्णाश्च स्वजनेन च षोडशात् ॥२८॥
१६ से २० तक रश्मियोग हो तो कुल को पालन करनेवाला, बहुत से नौकरों
से युक्त, कुटुम्बी, कीर्त्ति से युक्त और स्वजनों से पूर्ण होता है॥२८॥
एकविंशति विख्यातः पंचाशज्जनपोषकः ।
दानशीलः कृपायुक्तो द्वाविंशे लोभ संयुतः ॥२९॥
२१ रश्मि हो तो बड़ा प्रसिद्ध और पचासों लोगों का पालन करनेवाला होता
है और २२ रश्मियोग में दानशील और कृपालु होता है॥२९॥
त्रिंशत्पर्यन्तरश्मिफलम् -
धनवानल्प शत्रुश्च प्रभुः स्वल्पगुणो भवेत् ।
त्रयोविंशे च मुख्यश्च विद्याहीनो धनीसुखी ॥३०॥
रश्मियोग २३ हो तो मनुष्य धनी, अल्प शत्रु, समर्थ और अल्पगुणी होता
है॥३०॥

अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः । ६४१
आत्रिंशत्परतः श्रीमान्सर्वसत्वसमन्वितः ।
राजप्रियश्च चंडश्च जनैश्च बहुभिर्युतः ।।३१।।
इसके बाद ३० रश्मि तक मनुष्य श्रीमान् सभी सत्वों से युक्त, राजप्रिय,
प्रचंड और अनेक जनों से युक्त होता है।।३१।।
एकत्रिंशत्शुस्त्रिंशत्यावद्रश्मिफलम् -
एकत्रिंशे तु सचिवः द्वात्रिंशे वाहिनीपतिः ।
अत ऊर्ध्वं तु सामंत श्रातुःत्रिंशत्कपरावधिः ।।३२।।
रश्मियोग ३१ हो तो राजमंत्री होता है, ३२ में सेनापति इसके बाद ३४
तक रश्मियोग में मांडलिक राजा होता है।।३२।।
पंचत्रिशद्रश्मिफलम् -
अत ऊर्ध्वं नृपे श्रांतः आपंचत्रिंशतः क्रमात् ।
शतपंचकमारम्य सहस्रावधिपोषकः ।।३३।।
३५ रश्मियोग हो तो मनुष्य राज्याधिकार के क्रम से परिश्रम करने से ५००
से १००० तक जनों का भरण पोषण करनेवाला होता है।।३३।।
अत ऊर्ध्वं तु देशानां पोषकाः स्युः पंचविंशतिः ।
षडविंशतिश्च भानि स्युस्त्रिंशत् षड्त्रिंशदेव च ।।३४।।
इसके बाद ३६ रश्मियोग में २५ ग्रामों का, ३७ रश्मियोग में २६ ग्रामों
का, ३८ रश्मियोग में २७ ग्रामों का, ३९ रश्मियोग में ३० ग्रामों का और ४०
रश्मियोग में ३६ ग्रामों का पालक होता है।।३४।।
अत ऊर्ध्वं नृपाः क्षात्रधर्मिणः क्षत्रियोऽथवा ।
भूद्वित्र्यब्धीसुषट्सप्तभूभृज्जनपदाधिपाः ।।३५।।
इसके बाद ४० रश्मियोग हो तो क्षत्रिय जातीय बालक राजा होता है। अन्य
जातीय मनुष्य क्षत्रिय धर्म को पालन करता हुआ ४० से ४७ रश्मियोग में क्रम
से १, २, ३, ४, ५, ६, ७ ग्रामों के राजाओं का शासक होता है।।३५।।
पंचाशद्रश्मि संयोगे सम्राट् स्यादनुपातातः ।
अत ऊर्ध्वं तु देवेन्द्रतुल्यः स्युरिति पद्मभूः ।।३६।।
इसके बाद ५० रश्मि योग में पुरुष सम्राट् होता है, इससे न्यून होने पर

६४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अनुपात द्वारा सम्राट् योग में न्यूनता समझना चाहिये। ५० से अधिक हो तो इन्द्र
के समान होता है ऐसा ब्रह्माजी ने कहा है।।३६।।
रश्मौ विशेषफलम् -
उच्चचेष्टोत्थयोगार्धगुणिताः षष्ठिभाजिताः ।
नरादीनां तु संख्याः स्युः स्पष्टा इत्याहपद्मभूः ।।३७।।
उच्च रश्मि चेष्टा रश्मि का योग करके उसके आधे को पूर्व योग से गुण
कर ६० से भाग देने से जो लब्धि हो उस संख्या के तुल्य मनुष्य घोड़ा, हाथी
आदि सेवक होते हैं।।३७।।
राजयोगेविशेषः-
शूद्रादयः कलौ राजधर्मिणो म्लेक्षधर्मिणः ।
विप्राश्चेच्छ्रीधनैर्युक्ता यज्ञकर्मक्रियारताः ।।३८।।
जो राजयोग कहे हैं वे कलियुग में शूद्रादि म्लेक्ष धर्मवालों को होता है। यदि
यह राजयोग और उत्तम रश्मि योग ब्राह्मण को हो तो वह यज्ञादि कर्मनिष्ठ होता
है और उसी पुण्य से स्वर्ग के राज्य को भोगनेवाला होता है।।३८।।
विशेषः-
योगरश्मिसमायोगे तदानीं तत्फलं विदुः ।
नाभासादिषु योगेषु राजयोगे स्थितं तु तत् ।।३९।।
केवल राजयोग मात्र से ही राज्य की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु रश्मियोग
राज्य फलदायक हो तो राजयोग का फल होता है और नाभासादि योग में भी रश्मियोग
होने से उनका फल होता है।।३९।।
योगानां फल-व्यवस्था-
योगकर्त्तारमारभ्य बलिनं च विनिर्णयेत् ।
पूर्वभागे समुद्दिष्टभाग्यकर्मफलानि तु ।।४०।।
प्रथम भाग में भाग्यादि का जो फल कहा गया है उसका शुभाशुभ फल रश्मि
के अनुपात द्वारा निर्णय करना चाहिये।।४०।।
अनुपातेन विज्ञाय योजयेद्वर्जयेद्बुधः ।
स्थानवीर्याधिके देशे मुख्यः स्यादनुपाततः ।।४१।।
स्थानबल, दिग्बल, चेष्टाबल, कालबल, अयनबल, उच्चबल, नैसर्गिकबल

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४३
इनमें जो अधिक वल हो उससे उच्च रश्मि का फल कहते हैं। स्थान वल अधिक
हो तो देश में मुख्य हो।।४१।।
दिग्बले विजयश्रेष्टा वीर्ये तु प्रभुता भवेत् ।
कालवीर्योऽधिके कार्ये सदोत्साही तथायने ।।४२।।
दिग्बल अधिक हो तो विजयी हो, चेष्टावल अधिक हो तो प्रभुत्व हो, कालबल
अधिक हो तो सभी कार्य में कुशल हो और अयनवल अधिक हो तो सभी समय
आनंद में रहे।।४२।।
स्ववंशोत्कर्षता स्वोच्चे नैसर्गे जातिनिर्णयः ।
राशीनां च ग्रहाणां च स्वभावाः कथितामया ।।४३।।
उच्चबल अधिक हो तो अपने वंश में मुख्य हों, नैसर्गिक वल अधिक हो
तो अपने जाति और कर्म का विशेष प्रतिपादन करनेवाला होता है। इस प्रकार से
मेषादि राशियों का और ग्रहों का स्वभाव मैंने कहा।।४३।।
ये चात्र योजनीयाश्च दैवज्ञेन सुबुद्धिना ।।४४।।
जो मैंने कहा है उसे यथा अवसर विद्वान् बुद्धिमान् दैवज्ञ जहां जैसा उचित
हो उसकी योजना वहां वैसा करें।।४४।।
इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे रश्मिफलाध्यायश्चतुर्थः।४
अथलोकयात्राप्रकरणम्।
अष्टकवर्गरेखाणांफलम् -
मूलस्थानाधिके स्थाने सभावः शुभ इष्यते ।
न्यूनेऽशुभः समे मातृपितृवंधूवदिष्यते ।।१।।
जिस ग्रह का जिस भाव में जितनी रेखा कही गई है (अष्टकवर्गाध्याय श्लो.
१९ आदि) यदि उस भाव में उससे अधिक रेखा हो तो उस भाव का फल शुभ,
न्यून हो तो अशुभ और सम हो तो सम फल होता है।।१।।
स्ववेश्मधर्मकर्मायलग्नैश्शुभं पतिं वदेत् ।
मृतिव्ययारिभिस्तेषां व्ययं हानिं पृथग्वदेत् ।।२।।
२।४।९।१०।११ और लग्न ये ६ भाव अपने स्वभाव के अनुसार उत्तम
फल देते हैं और ८।१२ ये दो भाव खर्च तथा हानि करने वाले होते हैं।।२।।

६४४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
पूर्वभागोक्तानांराजयोगादीनां व्यवस्था-
ये योगापूर्वभागे तु द्विग्रहाद्या नभादयः ।
राजयोगादयः सर्वे यथान्यायं प्रयोजयेत् ।।३।।
पूर्व खंड में जो नाभस आदि राजयोग कहे गये हैं उनका रश्मि और अष्टक
वर्ग के बलाबल के अनुसार फल कहना चाहिये।।३।।
भरणीयं कुटुम्बस्य द्वितीयेन शुभाशुभे ।
अन्येषां चैव भावानां स्वनाम सदृशं फलम् ।।४।।
दूसरे भाव से रेखा और शून्य के न्यूनाधिक के अनुसार अशुभ और शुभ
फल देखकर कुटुम्ब पोषण का फल कहना चाहिये। अन्य भावों का उनके नाम
के सदृश फल कहे।।४।।
सूर्येणवेश्मस्थानेन पितुर्मृतिपदं वदेत् ।
चन्द्रेणपंचमेनैव मातुर्मृतिपदं वदेत् ।।५।।
सूर्य और चतुर्थ स्थान से पिता की मृत्यु के समय का विचार करे और चन्द्रमा
और पाँचवें भाव से माता के मृत्यु की समय का विचार करना चाहिये।।५।।
मृत्युसमयज्ञानम् -
सूर्ये चन्द्रे सपापे च तयोश्च मरणं भवेत् ।
तयोरंतरलिप्ताश्च शतद्वयविभाजिताः ।।६।।
सूर्य चन्द्र चतुर्थ और पंचम भाव पापग्रह से युत हों तो दोनों की मृत्यु होती
है। सूर्यादि और पापग्रहों का यथाक्रम से अंतर करके शेष की कला बनाकर उसमें
२०० का भाग देना।।६।।
अब्दादयोऽशुभस्यापि दृष्ट्या संगुणयेत्ततः ।
षष्ठ्या विभज्याब्दाद्याश्च तस्मात्पापेवलोत्तरे ।।७।।
फल वर्षादिक होता है यदि समबल हों तो न्यूनाधिक्य में यदि सूर्य चन्द्र
से पापग्रह बली हो तो उस फल को पापग्रह की दृष्टि से गुणाकर ६० से भाग
देकर वर्षादि फल लाना।।७।।
तदामृतिर्भवेन्यूने तद्बलेनैव वर्धयेत् ।
तदा मृत्युस्तयोर्मृत्युस्थाने पापग्रहे सति ।।८।।
पापग्रह अल्पबली हो तो सूर्य और चन्द्रबल से पूर्वोक्त वर्षादि को गुणा कर
६० से भाग देकर लब्ध वर्षादि से फल कहना चाहिये और अष्टम भाव में पापग्रह
हो तो माता पिता को अरिष्ट कहना।।८।।

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४५
त्रिकोणशोधन-
अष्टकवर्ग शोधन की दो विधियाँ हैं। १. त्रिकोणशोधन, २. एकाधिपत्य
शोधन। प्रथम त्रिकोण शोधन क्या है? सम्पूर्ण राशि चक्र में ४ त्रिकोण हैं। त्रिकोण
से तात्पर्य प्रथम, पंचम और नवम राशि से है अतः प्रत्येक त्रिकोण की प्रथम राशि
क्रमशः मेष, वृष, मिथुन और कर्क है। इसका प्रयोजन अष्टकवर्गाध्याय के श्लोक
सं. ७५ में कहा हुआ है।
अथ पिंडोत्पत्तिः-
शोध्यावशेषं संस्थाप्य राशिमानेन वर्द्धयेत् ।
ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्द्धयेत् ।।९।।
एकाधिपत्य शोधन करने से जो अंक जिस राशि के नीचे हों उन्हें उन-उन
राशि के गुणकांकों से गुणा कर उसके नीचे रख दे इसके बाद उनका योग करने
से राशि पिंड होता है। इसी प्रकार जिस राशि में जो ग्रह हो उस ग्रह के गुणकांक
से एकाधिपत्य शोधन से शेष अंक को गुणा कर रख दे और सबका योग करने
से ग्रहपिंड होता है।
उदाहरण चक्रों में है।
राशिगुणकांक-
गोसिंहौ दशगुणितौ वसुभिर्मिथुनालिगौ ।
वणिग्मेषौ तु मुनिभिः कन्यकामकरौ शरैः
शेषाः स्वमानगुणिता राशिमाना इभेक्रमात् ।।१०।।
ग्रहगुणकांक-
जीवारशुक्रसौम्यानां दशवसुमुनीन्द्रियैः ।
बुधस्य संख्या शेषाणां ग्रहंगुणयेत्पृथक् ।।११।।
त्रिषुद्वयोर्वा यन्न्यूनमितरत्रसमं भवेत् ।
एकस्मिन् भवने शून्ये तत्रिकोणं न शोधयेत् ।।१२।।
समत्वे सर्वगेहेषु सर्वं शोधयेद्बुधः ।
त्रिकोण के तीन राशियों में से जिस राशि की रेखा संख्या अल्प हो उसे त्रिकोण
की अन्य दो राशि की संख्या में से घटाकर शेष को उसी राशि के नीचे रखे अल्प
रेखा संख्या के स्थान में शून्य रखना चाहिये। यदि त्रिकोण की तीनों राशियों में
से किसी एक राशि में शून्य हो तो अन्य दो राशियों के नीचे वैसी रेखा स्थापित
कर दें अर्थात् उनका त्रिकोण शोधन न करे।।१२।।

६४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
यदि त्रिकोण के तीनों राशियों की रेखायें तुल्य हों तो सभी का संशोधन
करे अर्थात् तीनों के नीचे शून्य रखे।
एकाधिपत्यशोधन-
क्षीणेन सह चान्यस्मिन् शोधयेत् ग्रहवर्जितः ।।९३।।
ग्रहयुक्ते फले हीने ग्रहाभावे फलाधिके ।
अनेन सह चान्यस्मिन् शोधयेद् ग्रहवर्जिते ।।९४।।
फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् ।
उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यः कदाचन ।।९५।।
उभयोर्ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् ।
सग्रहा ग्रहतुल्यत्वात्सर्वं संशोध्यमग्रहात् ।।९६।।
एकत्र नास्ति चेत्सर्वहानिरन्यत्र कीर्त्तिताः ।
कुलीरसिंहयो राश्योः पृथक् क्षेत्रं पृथक् फलम् ।।९७।।
१—भौमादि पंचग्रहों की दो दो राशियाँ होती हैं अतः इन्हीं का एकाधिपत्य
शोधन होता है जिसका नियम यह हैं— यदि दोनों राशियों में कोई ग्रह न हो तो
अल्पसंख्या को अधिक संख्या में घटाकर शेष को अधिक संख्या के नीचे रख दे
और अल्पसंख्या को ज्यों का त्यों रख देना चाहिये।
२—यदि एक राशि में ग्रह हो और दूसरी राशि में ग्रह न हो और ग्रहहीन
राशि के संख्या से ग्रहयुक्त राशि की संख्या अल्प हो तो ग्रहहीन राशि संख्या में
से प्रहयुक्त राशि की संख्या को घटाकर शेष को ग्रहहीन राशि के नीचे रखना और
ग्रहयुक्त राशि की संख्या वैसी ही रख देना।
३—यदि ग्रहयुक्त राशि की संख्या ग्रहहीन राशि के संख्या से अधिक हो
तो ग्रहंयुक्त राशि की संख्या वैसी ही रहेगी और ग्रहहीन राशि के नीचे शून्य रखना
चाहिये।
४—यदि दोनों राशि ग्रहयुक्त हों तो संशोधन नहीं करना चाहिये अर्थात् जैसे
का तैसा ही रखना चाहिये। यदि दोनों राशियों में ग्रह न हो और संख्या भी तुल्य
हो तो दोनों राशियों में शून्य रखना चाहिये।
५. यदि एक सग्रह हो और दूसरी राशि ग्रहहीन हो और संख्या भी समान
हो तो ग्रहहीन राशि की संख्या के स्थान में शून्य और ग्रह युक्त राशि की संख्या

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४७
वैसी ही रहेगी।
६- यदि दोनों ग्रहयुक्त या ग्रहहीन हों अथवा दोनों में एक ग्रहयुक्त और
ग्रहहीन हो और त्रिकोणशोधन के बाद किसी एक में शून्य संख्या हो तो दोनों में
शून्य ही रहेगा।
७- कर्क और सिंह राशि के स्वामी चंद्र और सूर्य के अलग-अलग होने
के कारण इनका एकाधिपत्य शोधन नहीं करना चाहिये।
विशेष- त्रिकोणशोधन के उपरान्त ही उपर्युक्त ७ विकल्पों से एकाधिपत्य
शोधन करना चाहिये। शेष उदाहरण चक्र से स्पष्ट है।
सूर्याष्टकवर्ग शोधन।

ग्रहसू.बु. बृ.श.मं.:शु. चं.योगयोगापिंड
राशि४५६७८९१०१११२१२
रेखा३४२४६५४३३५५
त्रि.शो.०००१३१२०००३
एका.शो.०००१००००००२
रा.गु.०००७००००००१०
ग्रं.गु.०००००००००००
चंद्राष्टकवर्गशोधन।
ग्रहचं. शु.सू.बु. बृ.श.मं.योगयोगपिंड
:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---:---
राशि३४५६७८९१०१११२१
रेखा५२४३४५५२४७५
त्रि.शो.१००१०३१००५१
एका.शो.१००००३१००४०
रा.गु.८२४
ग्र.गु.१२१५

६४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
भौमाष्टकवर्गशोधन ।

ग्रहमं.चं.<br>शु.सू.बु.<br>बृ.श.योगपिंड
राशि१११२१२३४५६७८९१०योग
रेखा२२३५४२३३२६३४३९
त्रि.शो.०००२२००००४०१९
एका.शो.०००००००००००००
रा.गु.०राशिपिंड
ग्र.गु.०ग्र. पिंड

बुधाष्टकवर्गशोधन ।

ग्रहबु.<br>बृ.श.मं.चं.<br>श.सू.योगपिंड
राशि५६७८९१०१११२१२३४योग
रेखा५५३५४५४४४४६५५४
त्रि.शो.११०१०११०००३१९
एका.शो.१०००००१०००३१६
रा.गु.१०११२४४५राशिपिंड
ग्र.गु.१५८३६५६४ग्र.पिं.यो.
१०९

गुर्वष्टकवर्गशोधन ।

ग्रहबु.<br>बृ.श.मं.शु.<br>चं.सू.
राशि५६७८९१०१११२१२३४योग
रेखा४५६५३४६५६५३४५६
त्रि.शो.११३१००३१३१००१४
ए.शो.१०२१००००२१००७
रा.गु.१००८१८राशिपिंड
ग्र.गु.१५५२०ग्र.पि.
३८

अथ लोकयात्राप्रकरणम् । ६४९
शुक्राष्टकवर्गशोधन।
| ग्रह | शु. चं. | सू. | बु. बृ. | | | श. | | मं. | | | शु. चं. | | |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशि | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | योग | |
| रेखा | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ६ | ४ | ५२ | |
| त्रि.शो. | ३ | ३ | २ | ० | ० | ० | ० | २ | १ | ३ | ३ | ० | १७ | |
| ए.शो. | ० | ३ | २ | ० | ० | ० | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ७ | |
| रा.गु. | १२ | २० | | | | | | | ११ | | | | ४३ | राशिपि. |
| ग्र.गु. | १५ | ३० | | | | | | | ८ | | | | ५३ | ग्र.पिं. |
| | | | | | | | | | | | | | | ९६ |

शनेरष्टकवर्गशोधन।

ग्रहश.मं.शु. चं.सू.बु. बृ.
राशि८९१०१११२१२३४५६७
रेखा५२५१३७३४४२१२३९
त्रि.शो.२०४००५२३१००११८
ए.शो.२००००३१०१००१८
रा.गु.१६४२०
ग्र.गु.१०५१५

लग्नाष्टकवर्गशोधन।

ग्रहमं.शु. चं.सू.बु. बृ.श.योगपिंड
राशि१०१११२१२३४५६७८९
रेखा४४३६३५२५५३६३४९
त्रि.शो.१११३०२०२३०४०१७
ए.शो.०१०००२०२१०४०१०
रा.गु.०१११६१०३२६९
ग्र.गु.८२४३०२०९२