बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ दशाध्यायः । ४१७
लग्न से त्रिकोण ५।९ की राशियों में अर्थात् लग्न, पंचम और नवम राशियों
में जो बलवान् राशि हो वहीं से चरपर्याय के समान ही दशा का आरम्भ होता
है।।८२।।
क्रमोत्क्रमेण गणयेदोजयुग्मेषु राशिषु ।
चर्यायरीत्या च समाकल्पया द्विजोत्तम ।।८३।।
ओज राशि में क्रम से और सम राशि में उत्क्रम से चरपर्याय के समान ही
दशा का वर्ष भी होता है।।८३।।
उदाहरण-जन्म कुण्डली में मकर लग्न से त्रिकोण में वृष और कन्या राशि
में लग्न की राशि बली है अतः वहीं से आरम्भ कर समराशि होने के कारण उत्क्रम
से त्रिकोण राशियों कन्या और वृष की दशा होगी फिर कुम्भ, तुला, मिथुन की
इसके बाद मीन, वृश्चिक, कर्क की, फिर मेष, धन सिंह की दशा होगी, इनका
दशा वर्ष चरदशा के समान ही होगा।
त्रिकोणदशाचक्र-
| म. | क. | वृ. | कुं. | तु. | मि. | मी. | वृ. | कं. | मे. | ध. | सिं. | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | ११ | १ | ३ | ४ | २ | ७ | ९ | १० | १० | ८ | ११ | |
| २०१५ | १७ | २८ | २९ | ३२ | ३६ | ३८ | ४५ | ५४ | ६४ | ७४ | ८२ | २०९३ |
| ३ | ३ | |||||||||||
| १८ | १८ |
इति त्रिकोणदशा।
अथनक्षत्रदशा-
जन्मादौ चन्द्रनक्षत्रे सर्वथा घटिकौघके ।
भानुना दीयते भागं शेषनाडी प्रकल्पयेत् ।।८४।।
जन्म समय जन्मनक्षत्र के भभोग घटी में १२ से भाग देने से जो घट्यादि
फल आवे।।८४।।
प्रथमं खंडमारम्य द्वादशे खंडके द्विज ।
लग्नाद्द्वादशराशीनां गणनीयं क्रमेण च ।।८५।।
उस खंड से आरम्भ कर १२ खंडों का लग्न से १२ राशियों की दशा होती
है।।८५।।
या घटी कर्मवत्खंडे जन्मखंडश्च आदितः ।
आरभ्य गणनायां च जन्मलग्नादितो द्विज ।।८६।।
४१८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
उक्त घटी के अनुसार भयात के घटी के तुल्य जो खंड हो ।।८६।।
लग्नाद्द्वादशराशीशमारभ्य द्विजसत्तम ।
क्रमव्युत्क्रमभेदेन द्वादशदशा मता ।।८७।।
वहाँ तक लग्न से आरम्भ कर १२ राशियों के स्वामियों से आरम्भ कर क्रम
उत्क्रम गणना से दशा होती है ।।८६।।
अथवा-
भभोगं रविभिर्भक्ते यल्लब्धं घटिकादिकम् ।
तेन भक्ते भयातंच यल्लब्धं भादिकं फलम् ।।८८।।
भभोग को १२ से भाग देने से जो घट्यादि लब्धि हो उसमें भयात से भाग
देने से जो राश्यादि फल मिले ।।८८।।
तेनयुक्तं जन्मलग्नं तमारभ्य दशामितिः ।
स्थिरवच्चसमामानं क्रमोत्क्रम विभेदतः ।।८९।।
उसमें जन्मलग्न को जोड़ देने से जो राश्यादि आवे वहीं से (विषम-सम) के
अनुसार दशा का आरम्भ होता है। यहाँ दशा का वर्ष स्थिर दशा के समान ही लेना
चाहिये ।।८९।।
उदाहरण-पूर्वोक्त जन्म नक्षत्र पुनर्वसु का भभोग ५५।५३ है और भयात
१०।३२ तथा जन्म लग्न ९।१५।३२।५१ है। भभोग ३३५३ में १२ से भाग
देने से लब्ध घटिकादि २७९।२५ प्राप्त हुआ। इससे पलात्मक भयात ६३२ में
भाग देने से लब्धि राश्यादि २।७।५१।२० हुआ इसमें जन्मलग्न को जोड़ देने
से ११।२३।२४।११ हुआ अर्थात् मीन राशि से उत्क्रम गणना से दशा का आरम्भ
हुआ।
नक्षत्रदशाचक्रम् -
| मी. | कुं. | म. | ध. | वृ. | तु. | कं. | सिं. | क. | मि. | वृ. | मे. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ८ | ७ | ९ | ८ | ७ | ९ | ८ | ७ | ९ | ८ | ७ |
| २०१३ | २२ | ३० | ३७ | ४६ | ५४ | ६२ | ७० | ७८ | ८५ | ९४ | २१०२ |
| ३ | ३ | ||||||||||
| १८ | १८ |
इतिनक्षत्रदशा।
अथ तारादशा-
जन्मसम्पद्विपत्क्षेमप्रत्यरीसाधका वधः ।
मैत्रातिमैत्रमित्येवं दशा ज्ञेया द्विजोत्तम ।।९०।।
अथ दशाध्यायः । ४१९
जन्म, सम्पत्, विपत्, क्षेम, प्रत्यरी, साधक, वध, मैत्र, अतिमैत्र इन ९
ताराओं की भी दशा होती है।।९०।।
विंशोत्तर्याः क्रमेणैवमंकानिह विजानतः ।
आदौ केन्द्रग्रहाद्यस्य विज्ञेया तारकादशा ।।९१।।
जिस प्रकार विंशोत्तरी दशा में ग्रहों के वर्ष कहे गये हैं वही यहां पर भी लेना
चाहिये। यहां जन्म कुण्डली में जो ग्रह केन्द्र में हो वहीं से दशा का आरम्भ होता
हैं।।९१।।
उदाहरण-केन्द्र में ग्रहों के रहने से यह दशा होती है अन्यथा नहीं होती
है। जैसे जन्मकुण्डली में केन्द्र में सूर्य है अतः जन्मतारा से दशा का आरम्भ होगा।
इसका भुक्त भोग्य विंशोत्तरी दशा के समान ही निकालना चाहिये।
तारादशाचक्रम् -
| ज. | स. | वि. | क्षे. | प्र. | सा. | व. | मै. | अतिमै. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सू. | चं. | मं. | श. | बृ. | श. | बु. | के. | शु. |
| ४ | १० | ७ | १८ | १६ | १९ | १७ | ७ | २० |
| १० | ||||||||
| १२ | ||||||||
| ५१ | ||||||||
| ५२ | ||||||||
| २०१ट | २८ | ३५ | ५३ | ६९ | ८८ | २१०५ | १२ | ३२ |
| २ | २ | |||||||
| १ | १ | |||||||
| १८ | १८ | |||||||
| २२ | २२ |
इति तारादशा।
अथ वर्णदशामाह।
जन्महोरातनूयोगो विषमो वर्णदो भवेत् ।
समस्तुः चक्रतः शुद्धो वर्णदो कथ्यते बुधैः ।।९२।।
जन्मलग्न और होरालग्न का योग करने से योग राशि विषम हो तो वही वर्णद
राशि होती है यदि योग सम हो तो १२ राशि में घटाने से शेष वर्णद होती है।।९२।।
एवं द्वादशभावानां वर्णदं लग्नमानयेत् ।
ग्रहाणां वर्णदा नैव राशीनां वर्णदा दशा ।।९३।।
४२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
इसी प्रकार १२ भावों के वर्णद राशि को लाना। ग्रहों की वर्णद दशा नहीं
होती है राशियों की वर्णद दशा होती है।।९३।।
होरालग्नभयोर्नेया सबलाद् वर्णदा दशा ।
यत्संख्यो वर्णदो लग्नात्तत्संख्या क्रमेणतु ।।९४।।
क्रमव्युत्क्रमभेदेन दशा स्यात्पुरुषस्त्रियोः ।
वर्षसंख्यां विजानीयाच्चरदशा प्रमाणतः ।।९५।।
होरालग्न और जन्माग्न दोनों में जो वली हो, और विषम हो तो क्रमगणना
से यदि सम हो तो उत्क्रम गणना से वर्णद दशा होती है। यहां राशियों का वर्ष
चर दशा के समान ही लेना चाहिये।।९४-९५।।
अथपंचस्वरदशामाह-
पञ्चाङ्कान्प्रथमे दत्वा स्वरान्वर्णांश्च विन्यसेत् ।
आदावकछडाद्यांश्च अन्ते ओचटवादयः ।।९६।।
कादिहांताल्लिखेद्वर्णान्स्वराधोऽञणोज्झितान्।
तिर्यक्पंक्तिक्रमेणैव पञ्च पञ्च विभागतः ।।९७।।
पहले १ से ५ तक के अंकों को लिखकर उनके नीचे अकारादि स्वरों को
और उनके नीचे ककारादि वर्णों को लिखने से किन्तु ङ. ञ. ण. वर्णों को छोड़कर
प्रत्येक पंक्ति में ५ पांच वर्णों को लिखे।।९६-९७।।
न प्रोक्ता ङञणावर्णा नामादौ सन्ति ते नहि ।
चेद्भवन्ति तदा ज्ञेया गजडास्ते यथा क्रमात् ।।९८।।
ङ. ञ. ण. वर्ण का उच्चारण इस चक्र में नहीं होता है क्योंकि किसी के
नामके आदि में ये वर्ण नहीं होते हैं यदि कदाचित् हो तो ङ. ञ. ण. के स्थान
में क्रम से ग. ज. ड. को मानना चाहिये।।९८।।
यदि नाम्नि भवेद्वर्णी संयोगाक्षरलक्षितः ।
ग्राह्यस्तदादिमोवर्णः इत्युक्तं ब्रह्मणापुरा ।।९९।।
यदि नाम के आदि में संयोगाक्षर हो तो वहां संयुक्ताक्षर के प्रथम अंक को
लेना चाहिये।।९९।।
अकाराद्याः स्वराः पञ्च ब्रह्माद्याः पञ्चदेवताः ।
निवृत्ताद्याः कलाः पञ्च इच्छाद्या शक्तिपञ्चकम् ।।१००।।
अकारादि पांच स्वरों के ब्रह्मा आदि (ब्रह्मा विष्णु शंकर-गणेश सूर्य) ये देवता
हैं। निवृत्ति आदि (निवृत्ति, उपेक्षा, आदान, उपादान, प्रवृत्ति) पांच कलायें, इच्छा
अथ दशाध्यायः । . . ४२१
आदि (इच्छा, राग, द्वेष, अभिनिवेश, अहंकार) पांच शक्तियां ।।१००।।
मायाद्याश्चक्रभेदाश्च धराद्या भूतपञ्चकम् ।
शकादि विषयास्ते च कामबाणा इतीरिताः ॥१०१॥
प्रभवादि क्रमेणैषां स्वराणामश्वरादिकः ।
उदयोद्वादशाब्दानां प्रत्येकं द्वादशाब्दकाः ॥१०२॥
माया आदि (माया, अविद्या, तामिस्र अंधतामिस्र, मोह) पांच चक्र, धरा आदि
(पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) पांच महाभूत, और शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध, पांच विषय ये सभी पञ्चक काम के बाण हैं। इसी प्रकार से प्रभवादि संवत्सर
भी १२ वर्ष भोग तुल्य पांच स्वरों के होते हैं। प्रत्येक स्वरों का १२ वर्ष होता
है।।१०१-१०२।।
उदाहरण-पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने से नाम का प्रथम अक्षर
ककार है वह चक्र में अकार स्वर के नीचे है अतः अकार स्वर से दशा आरम्भ
होगा। शेष चक्र से स्पष्ट है।
अथपंचस्वरचक्रम्
| अ. | इ. | उ. | ऐ. | ओ | स्वराः |
|---|---|---|---|---|---|
| १२ | १२ | १२ | १२ | १२ | वर्ष |
| क. | ख. | ग. | घ. | च. | |
| छ. | ज. | झ. | ट. | ठ. | |
| ड. | ढ. | त. | थ. | द. | वर्षाः |
| ध. | न. | प. | फ. | ब. | |
| भ. | म. | य. | र. | ल. | |
| व. | श. | ष. | स. | ह. |
पंचस्वरदशाचक्रम्
| अ. | इ. | उ. | ए. | ओ | स्वराः |
|---|---|---|---|---|---|
| १२ | १२ | १२ | १२ | १२ | वर्ष |
| २०१३ | २५ | ३७ | ४९ | ६१ | ७३ |
| ३ | ३ | ||||
| १८ | १८ |
इतिपंचस्वरदशा।
अथयोगिनीदशामाह-
मङ्गला पिङ्गला धान्या भ्रामरी भद्रिका तथा ।
योगिन्यष्टौ समाख्याताउल्का सिद्धाच संकटा ॥१०३॥
मङ्गला, पिङ्गला, धान्या, भ्रमरी, भद्रिका, उल्का, सिद्धा, संकटा, ये आठ
योगिनी होती हैं।।१०३।।
पिङ्गलातो भवेत्सूर्यो मङ्गलातो निशाकरः ।
भ्रामरीतो भवेद्भौमो भद्रिकातो बुधस्तथा ॥१०४॥
४२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
पिङ्गला से सूर्य, मङ्गला से चन्द्रमा, भ्रामरी से भौम, भद्रिका से बुध ।।१०४।।
धन्यकातो गुरुरभूत्सिद्धात् कविसम्भवः ।
उल्कातो भानुतनथः संकटातस्तमोऽभवत् ।।१०५।।
धान्या से गुरु, सिद्धा से शुक्र, उल्का से शनि और संकटा से राहु हुये
हैं।।१०५।।
स्वक्षं शिखिना संयुक्तं वसुभिर्भागमाहरेत् ।
शेषेण योगिनी ज्ञेया शून्यपातेन संकटा ।।१०६।।
जन्म नक्षत्र में ३ जोड़कर ८ से भाग देने से एकादि शेष से योगिनी को
जानना शून्य शेष बचे तो संकटा होती है।।१०६।।
एकाभिवृध्या वर्षाणि मङ्गला प्रमुखासुच ।
भुक्तं भोग्यं च संसाध्यं पुरावद्गणकोत्तमैः ।।१०७।।
इनका दशा वर्ष १ से आरम्भ कर एक वृद्धि करने से क्रम से १, २, ३,
४, ५, ६, ७, ८ वर्ष होता है। इनका भुक्त भोग्य पूर्ववत् साधन करना
चाहिये।।१०७।।
उदाहरण-जन्मनक्षत्र पुनर्वसु की संख्या ७ इसमें ३ और जोड़ने से १०
हुआ इसमें ८ का भाग देने से २ शेष रहा अतः पिङ्गला से दशा का आरम्भ हुआ।
इसका भुक्त भोग्य पूर्ववत् भयात भभोग द्वारा निकालने से भुक्त वर्षादि ०, ४,
१६, २१, १९ हुआ।
अथ योगिनीदशाचक्रम् -
| पि. | धा. | भ्रा. | भ. | उ. | सिं. | सं. | मं. | यो. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १<br>७<br>१३<br>३८<br>४१ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | १ | |
| २०१३ | २०१४ | १७ | २१ | २६ | ३२ | ३९ | ४७ | २०४८ |
| ३<br>१८<br>२६<br>३४ | ११<br>२<br>५<br>१५ | ११<br>२<br>५<br>१५ | ||||||
| इतियोगिनीदशा। |
३. विंशोत्तरी, अष्टोत्तरी, कालचक्र आदि दशा-फल एवं अन्तर्दशा विचार
अथ दशाध्यायः । ४२३
अथ पिंडांशादिदशामाह-
पैंड्याेंशनैसर्गिकदशामायुः परिचिंतयेत् ।
तथाह्यष्टकवर्गे च विजानीहि द्विजोत्तम ॥१०८॥
पिंडायु, अंशायु नैसर्गिकायु और अष्टकवर्गायु पर से इनके दशा को लाना
चाहिये॥१०८॥
अथ सन्ध्यादशामाह-
परमायुर्द्वादशांशाः स्फुटं सन्ध्याभवेत्ततः ।
स्वलग्नाधिपतेरादौ क्रमेणान्यग्रहेषु च ॥१०९॥
परमायु १२० का १२ वां भाग सन्ध्या होता है उसी के तुल्य पहले लग्नेश
की दशा इसके बाद क्रम से अन्य ग्रहों की दशा उतने ही वर्ष की होती है॥१०९॥
उदाहरण-परमायु १२० का १२ वां भाग १० वर्ष यह लग्नेश शनि की
दशा हुई इसी के तुल्य सभी सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, राहु और केतु
की दशा होगी।
सन्ध्यादशाचक्रम्-
| श. | रा. | के. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | ग्रह |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | वर्ष |
| २०१३ | २३ | ३३ | ४३ | ५३ | ६३ | ७३ | ८३ | ९३ | २१०३ |
| ३ | ३ | ||||||||
| १८ | १८ | ||||||||
| अथ पाचकदशामाह- | |||||||||
| सन्ध्या रसगुणा कार्या चन्द्रवह्निहृता फलम् । | |||||||||
| संस्थाप्य प्रथमे कोष्ठे ह्यर्थमर्धत्रिकोष्ठके ॥११०॥ | |||||||||
| सन्ध्या को ६ से गुणाकर गुणनफल में ३१ का भाग देने से जो वर्षादि फल | |||||||||
| मिले उसे प्रथम कोष्ठ में लिखे। इसके आधे को अगले तीन कोष्ठों में | |||||||||
| लिखे॥११०॥ | |||||||||
| त्रिभागं वसुकोष्ठेषु लिखेद्द्विज् प्रयत्नतः । | |||||||||
| एवं द्वादशभावेषु पाचकानि प्रकल्पयेत् ॥१११॥ | |||||||||
| फिर लब्ध के तीसरे भाग को आगे के आठ कोष्ठों में लिखने से १२ भावों | |||||||||
| की पाचक दशा होती है॥१११॥ |
४२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
उदाहरण-संध्या की दशा वर्ष १० इसको ६ से गुणा किया तो ६० हुये
इसमें ३१ से भाग देने से वर्षादि १, ११, ६, ४६, २७ हुआ इसे पहले कोष्ठ
में रखकर इसका आधा ०, ११, १८, २३, १३ आगे के तीन कोष्ठों में रख
दिया इसके बाद लब्ध (१, ११, ६, ४६, २७) का तीसरा भाग ०, ७, २२,
१५, २९ को शेष ८ कोष्ठों में रखने से १२ भावों के पाचक दशा चक्र होता
है।
पाचकदशाचक्रम् -
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | भावाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | |
| ११ | ११ | ११ | ११ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | |
| ६ | १८ | १८ | १८ | २२ | २२ | २२ | २२ | २२ | २२ | २२ | २२ | |
| ४६ | २३ | २३ | २३ | १५ | १५ | १५ | १५ | १५ | १५ | १५ | १५ | |
| २७ | १३ | १३ | १३ | २९ | २९ | २९ | २९ | २९ | २९ | २९ | २९ | |
| २०१३ | १५ | १६ | १७ | १८ | १८ | १९ | २० | २० | २१ | २२ | २२ | २०२३ |
| ३ | २ | २ | २ | १ | ९ | ५ | ० | ८ | ४ | ० | ७ | ३ |
| १८ | २५ | १३ | १ | २० | १२ | ४ | २७ | १९ | ११ | ३ | २६ | १८ |
| २६ | १३ | ३६ | ५९ | २२ | ३८ | ५३ | ९ | २४ | ४० | ५५ | ११ | २६ |
| ३४ | १ | १४ | २७ | ४० | ९ | ३८ | ७ | ३६ | ५ | ३४ | ३ | ३२ |
| इतिपाचकदशा। | ||||||||||||
| अथ नवांशकनवदशामाह- | ||||||||||||
| अथ राशिक्रमं वक्ष्ये शृणुष्व द्विजपुङ्गव । | ||||||||||||
| ग्रहे राश्यादिकं चाल्पे दशा तस्यादिमाभवेत् ॥१९२॥ | ||||||||||||
| हे द्विजपुङ्गव ! अब मैं राशियों के क्रम को कहता हूँ, ग्रहों में जिस ग्रह का | ||||||||||||
| राश्यादि सभी ग्रहों से अल्प हो उसकी प्रथम दशा ॥१९२॥ | ||||||||||||
| ततस्तदधिकस्यैवं तुल्ये नैसर्गिकाद्बलात् । | ||||||||||||
| राशीशात्सप्तमांगेशाच्चिन्त्या राशिक्रमाद्दशा ॥१९३॥ | ||||||||||||
| इसके बाद उससे अधिक अंशादि की फिर इससे अधिक अंशादि वाले की | ||||||||||||
| इसी भाव से ९ ग्रहों की दशा होती है।।१९३।। | ||||||||||||
| यस्मिन्नवांशकस्थेऽङ्गे दशा तस्यादिमा मता । | ||||||||||||
| लग्नादब्जाच्च येखेटाः केत्वंताः संस्थिताः क्रमात् ॥१९४॥ |
अथ दशाध्यायः । ४२५
यह प्रथम प्रकार हुआ। इसके बाद सभी ग्रहों में जो सबसे अधिक अंशवाला
हो उसकी प्रथम दशा इसके वाद इससे न्यूनांश की इसी क्रम से नवों ग्रहों की दशा
होती है। यह दूसरा प्रकार है। सभी ग्रहों में नैसर्गिक बल में न्यून बलवाले की
प्रथम दशा इसके बाद इससे अधिक बलवाले की इसी क्रम से सभी ग्रहों की दशा
लिखना। यह तीसरा प्रकार हुआ। जन्म राशीश से दशा का आरम्भ करना। यहां
दशा वर्ष ९ वर्षक ही सबका होता है। यह चौथा प्रकार है। लग्न से सप्तमेश के
राशि से दशा का आरम्भकरना, यह पांचवां प्रकार है। इसी प्रकार लग्नेश का प्रथम,
द्वितीयेश का दूसरा इसी क्रम से सभी भावों के राशीशों के राशि से दशा लिखना
यह छठां प्रकार है। जिस नवांश में लग्न है उस नवांश के स्वामी से दशा का आरम्भ
करना यह सातवां प्रकार है। अंतिम नवांश के स्वामी से क्रमशः ग्रहों का दशा आरम्भ
करना, यह आठवां प्रकार है। चन्द्रमा से आरम्भ कर रवि पर्यन्त सभी ग्रहों के दशा
को लिखना, यह नवां प्रकार है।।१९४।।
दशामानं प्रवक्ष्यादि यथोक्तं ब्रह्मणापुरा ।
लिप्तीकृत्य ग्रहं व्योमखाश्विभिर्भाजिते फलम् ।।१९५।।
ग्रहों की कला बनाकर २०० का भाग देने से जो फल मिले।।१९५।।
पुनः सूर्यै हृते लब्धं समाद्यांशकला दशा ।
सर्वेषां मानवानां च दशास्त्वेता विचिंतयेत् ।।१९६।।
उसमें १२ से भाग देने से वर्षादि लब्ध होगा वही दशा का मान होता
है।।१९६।।
इतिनवांशनवदशा।
अथ राश्यंशकदशामाह-
तन्वादिभावाः संस्पष्टाः प्रोक्तमार्गेणचानयेत् ।
लग्नेशसंस्थितो यत्र दशास्तस्यादिमो स्मृताः ।।१९७।।
लग्नादि द्वादशभावों को स्पष्ट करने लग्न और लग्नेश में जो बली हो उसके
नवांश राशि की प्रथम दशा।।१९७।।
द्वितीयेशादितश्चाग्रे ज्ञेया राश्ययंशका दशा ।
चिंत्या लग्ने बलवती लग्नेशे वा बलान्विते ।।१९८।।
इसके द्वितीयादि भावों के स्वामियों के नवांश राशि की दशा होती
है।।१९८।।
इति राश्यंशकदशा।
४२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ नक्षत्रदशामाह-
नक्षत्रायुर्महाप्राज्ञ पूर्णमग्रे प्रभाषितम् ।
विंशोत्तरी पंचधा द्विधा चाष्टोत्तरी मता ।। ११९९ ।।
नक्षत्रायु के अनुसार ५ प्रकार की विंशोत्तरी दशा और दो प्रकार की अष्टोत्तरी
दशा कहा गया है।।१९९।।
अष्टवर्गोपरि दशा सर्वेषां चिंतयेद्विज ।
ततो निर्याणमालेख्यं निर्विशंकं भविष्यति ।। १२०० ।।
इन सभी का फल अष्टक वर्ग के ऊपर विचार कर निर्याण दशा को लिखना
यही नक्षत्र दशा होगी ।।१२०।।
वलावलविवेकेन फलं ज्ञेयं दशासुच ।
विपरीतं फलं वाच्यं खेटे वक्रगते सदा ।। १२०१ ।।
ग्रहों के बल और निर्बलता के अनुसार ही दशा का फल कहना चाहिये यदि
ग्रह वक्री हो तो विपरीत (बली ग्रह में अशुभ और दुर्बल में शुभं) फल कहना
चाहिये ।।१२१।।
आदिद्रेष्के स्थिते खेटे दशारम्भे फलं वदेत् ।
दशामध्ये फलं वाच्यं मध्यद्रेष्काणके स्थिते ।। १२०२ ।।
यदि दशेश प्रथम द्रेष्काण में हो तो अपना शुभ अशुभ फल दशा के आरम्भ
में दूसरे द्रेष्कारा में हो तो दशा के मध्य में ।।१२२।।
अन्ते फलं तृतीयस्थे व्यस्तं खेटे च वक्रिणि ।
इति ते कथिता विप्र दशाभेदा अनेकशः ।
यस्मै कस्मै न दातव्यं ज्ञानमेतत्सुदुर्लभम् ।। १२०३ ।।
और तीसरे द्रेष्काण में हो तो दशा के अंत में अपने फल को देता है। यदि
ग्रह वक्री हो तो इससे विपरीत फल देता है। हे विप्रः यह अनेक प्रकार के दशा
के भेदों को कहा इस दुर्लभ ज्ञान को जिस किसी को नहीं देना चाहिये ।।१२३।।
इति दशाभेदाध्यायः ।
अथ दशाफलाध्यायः ।
तत्रादौ विंशोत्तरीमतेन सूर्यमहादशाफलम् -
सूर्योत्कृष्टदशा करोति सुतधीप्रज्ञाधिकारोच्चय-
ज्ञानार्थागमकीर्तिपौरुषसुखप्राप्तीश्वरानुग्रहात् ।
३५थ दशाफलाध्यायः । ४२७
भानोः पापदशा करोति विफलोद्योगार्थहान्यामया-
त्राजक्षोभमहीशकोपजनकारिष्टाग्निवाथोदयात् ॥१॥
उत्तमबली सूर्य की दशा में पुत्र, बुद्धि, अधिकार, ऊचेंज्ञान, धन का लाभ,
यश, पौरुष, सुख की प्राप्ति होती है। सूर्य की निकृष्ट दशा में उद्योग में विफलता,
द्रव्य की हानि, व्याधि, राजा की अप्रसन्नता से कष्ट, अरिष्ट, अग्नि से भय होता
है॥१॥
मूलत्रिकोणे स्वक्षेत्रं स्वोच्चे वापरमोच्चके ।
केन्द्रत्रिकोणलाभस्थे भाग्यकर्माधिपैर्युते ॥२॥
यदि सूर्य अपने मूलत्रिकोण राशि, स्वराशि, अपने उच्च वा परमोच्च में होकर
केन्द्र वा त्रिकोण वा एकादश भाव में भाग्येश कर्मेश से युत हो॥२॥
बलं सूर्ये समायुक्ते निजवर्गे बलैर्युते ।
तस्मिन्दाये महासौख्यं धनलाभादिकं शुभम् ॥३॥
और अपने वर्ग में हो तो इसके दशा में अत्यंत सुख, धन का लाभ आदि
शुभ फल होता है॥३॥
अत्यंतं राजसन्मानमश्वांदोल्यादिकं शुभम् ।
सुताधिप समायुक्ते पुत्रलाभं च विदंति ॥४॥
पंचमेश से युत हो तो राजा से सन्मान घोड़ा आदि सवारियों का सुख तथा
पुत्र का लाभ होता है॥४॥
धनेशस्य च संबंधे गजांतैश्वर्यमादिशेत् ।
वाहनाधिप सम्बंधे वाहनत्रयलाभकृत् ॥५॥
धनेश से युत हो तो हाथी घोड़ा आदि ऐश्वर्य से संपन्न होता है। वाहनेश
से युत हो तो वाहनों का लाभ होता है॥५॥
नृपालतुष्टिर्वित्ताढ्यः सेनाधीशः सुखीनरः ।
वस्त्रवाहनलाभश्च इतिदाये रवौबली ॥६॥
तथा राजा की प्रसन्नता से धनी, सेनाधीश और सुखी होता है॥६॥
नीचे षडष्टके रिष्फे दुर्बले पापसंयुते ।
राहु केतु समायुक्ते दुःस्थानाधिपसंयुते ॥७॥
यदि सूर्य अपने नीच राशि में ६, ८, १२ भाव में हो दुर्बल हो पापग्रह
से युत हो वा राहु केतु से युत हो वा ६, ८, १२ वें भावों के स्वामी से युत
हो तो॥७॥
४२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
तस्मिन्दाये महापीड़ा धनधान्य विनाशकृत् ।
राजकोपं प्रवासं च राजदंडाद्धनक्षयम् ।।८।।
उसकी दशा में महापीड़ा, धन, धान्य की हानि राजकोप, विदेश यात्रा, राजदंड
से धन की हानि।।८।।
ज्वरपीडा यशोहानिर्बन्धुमित्र विरोधकृत् ।
प्रवासं रोगविद्वेषं ह्यपमृत्युभयं भवेत् ।।९।।
ज्वर, यश की हानि, बन्धुओं मित्रों से विरोध, प्रवास, रोग, शत्रुता अकाल
मृत्यु का भय।।९।।
चौराहिब्रणभीतिश्च ज्वरबाधा भविष्यति ।
पितृक्षयंभयं चैव गृहे त्वशुभमेव च ।।१०।।
चौर का भय, घोड़ा आदि का भय, पिता को अरिष्ट, चाचा आदि से मन
में संताप, लोगों से द्वेष होता है।।१०।।
पितृवर्गे मनस्तापं जनद्वेषं च विंदति ।
शुभदृष्टि युते सूर्ये मध्ये तस्मिन्क्वचित्सुखम् ।
पापग्रहेण संदृष्टे वदेत्पापफलं नरः ।।११।।
सूर्य शुभ दृष्ट.हो तो मध्य में शुभफल भी होता है और पापदृष्ट हो तो पापफल
ही होता है।।११।।
इति रविदशाफलम्।
अथ चन्द्रदशाफलम् -
चन्द्रोत्कृष्टदशा करोति जननीश्रेयस्तडागादिकं
क्षेत्रारामगृहासनद्विजवरश्रीशोभनांदोलिका ।
इन्दोः पापदशान्हीनकृपणानंतार्थनाशामय-
प्रज्ञाहीनजुगुप्सुमातुमरणक्षोभातिशीतज्वरान् ।।१२।।
चन्द्रमा के उत्तम दशा में माता का सुख, तालाब, खेत, बगीचा, गृह आसन,
ब्राह्मण, लक्ष्मी, यश, सवारी का सुख होता है। चन्द्रमा के पापदशा में धन की
क्षति, कृपण बुद्धि, धन की हानि, द्रव्य की हानि, माता को कष्ट, शीतज्वर से
कष्ट होता है।।१२।।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे चैव केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
शुभग्रहेण संयुक्ते वृद्धिचन्द्रेवलैर्युते ।।१३।।
अथ दशाफलाध्यायः । ४२९
यदि चन्द्रमा अपने उच्चराशि में होकर केन्द्र व त्रिकोण में हो शुभग्रह से
युक्त शुक्लपक्षीय चन्द्र हो और बली हो ।। १३ ।।
कर्मभाग्याधिपे चन्द्रेसुखेशेन बलैर्युते ।
आद्यन्तैश्चोरुभाग्येन धन धान्यादिलाभकृत् ।।१४।।
कर्मेश वा भाग्येश हो और बली चौथे भाव के स्वामी से युत हो तो प्रथम
अवस्था और अन्तिम अवस्था में अत्यंत भाग्योदय, धन, का लाभ होता है।।१४।।
गृहे तु शुभकार्याणि वाहनं राजदर्शनम् ।
यत्नकार्यार्थसिद्धिःस्याद्गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् ।।१५।।
गृह में शुभकार्य होते हैं, वाहन का लाभ, राजा का दर्शन, यत्न, कार्य और
धन की सिद्धि, गृह में लक्ष्मी की प्रसन्नता ।।१५।।
मित्रप्रभुवशाद्भाग्यं राज्यलाभं महत्सुखम् ।
अश्वांदोल्यादिलाभं च श्वेतवस्त्रादिलाभकृत् ।।१६।।
मित्र और स्वामी के द्वारा भाग्योदय राज्यसुख का लाभ, अश्व, सवारी का
लाभ, सफेदवस्त्र का लाभ।।१६।।
पुत्रलाभादिसंतोषं गृहगोधनसंकुलम् ।
धनस्थानगते चन्द्रे तुंगे स्वक्षेत्रगेऽपि वा ।।१७।।
पुत्रलाभ, गौओं की वृद्धि होती है। यदि चन्द्रमा अपने उच्च वा अपनी राशि
का होकर दूसरे भाव में हो तो ।।१७।।
अनेकधनलाभंच भाग्यवृद्धिर्महत्सुखम् ।
निक्षेपराजसन्मानं विद्यालाभं च विंदति ।।१८।।
अनेक प्रकार के धन का लाभ, भाग्योदय और अत्यंत सुख, राजा से सम्मान
और विद्या का लाभ होता है।।१८।।
नीचे वा क्षीणचन्द्रे वा धनहानिर्भविष्यति ।
दुश्चिक्ये बलसंयुक्ते क्वचित्सौख्यं क्वचिद्धनम् ।।१९।।
दुर्बले पापसंयुक्ते देहजाड्यं मनोरुजम् ।
भृत्यपीडा वित्तहानिर्मातृवर्गजनाद्धधः ।।२०।।
यदि चन्द्रमा नीच राशि में हो वा क्षीण हो तो धन की हानि होती है। यदि
तीसरे स्थान में चन्द्रमा बली हो तो कभी सुख और कभी धन का लाभ होता
है।।२०।।
४३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
षष्ठाष्टमव्यये चन्द्रे दुर्बले पापसंयुते ।
राजद्वेषो मनोदुःखं धनधान्यादिनाशनम् ।।२१।।
यदि चन्द्रमा दुर्बल और पापयुक्त हो तो देह में जड़ता और मानसिक दुःख
होता है। नौकर को कष्ट, धन की हानि, माता को कष्ट होता है।।२१।।
मातृक्लेशं मनस्तापं देहजाड्यं मनोरुजम् ।
दुःस्थे चन्द्रेवलैर्युक्ते क्वचिल्लाभं क्वचित्सुखम् ।।२२।।
यदि दुर्बल चन्द्रमा ६, ८, १२ भाव में पापयुक्त हो तो राजा से द्वेष, मानसिक
दुःख, धन, धान्य का नाश।।२२।।
माता को कष्ट, मन में संताप, देह में जड़ता होती है। दुःस्थान में चन्द्रमा
बली हो तो कभी लाभ और कभी सुख होता है।।२२।।
इति चन्द्रदशाफलम्।
अथ भौमदशाफलम्-
परमोच्चगते भौमे स्वोच्चे मूलत्रिकोणगे ।
स्वक्षेत्रे केन्द्रत्रिकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा ।।२३।।
मंगल परमोच्च में वा उच्च में अथवा मूलत्रिकोण में वा अपनी राशि में होकर
केन्द्र त्रिकोण में वा एकादश वा धन भाव में।।२३।।
सम्पूर्णबल संयुक्ते शुभदृष्टे शुभांशके ।
राज्यलाभं भूमिलाभं धनधान्यादिलाभकृत् ।।२४।।
पूर्ण बली हो शुभग्रह से युत दृष्ट हो और शुभग्रह के नवांश में हो तो राज्य
लाभ, भूमि लाभ, धन, धान्यादि का लाभ होता है।।२४।।
आधिक्यं राजसन्मानं वाहनाम्बरभूषणम् ।
विदेशे स्थानलाभं च सोदराणां सुखं लभेत् ।।२५।।
राजसन्मान में वृद्धि, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ होता है। विदेश में
स्थान का लाभ और भाइयों से सुख होता है।।२५।।
केन्द्रं गते सदा भौमे दुश्चिक्ये बलसंयुते ।
पराक्रमाद्वित्तलाभो युद्धे शत्रुक्षयो भवेत् ।।२६।।
यदि बली भौम केन्द्र में वा तीसरे भाव में हो तो पराक्रम से धन का लाभ
और युद्ध में विजय होती है शत्रुओं का नाश होता है।।२६।।
अथ दशाफलाध्यायः । ४३१
कलत्रपुत्रविभवं राजसन्मानमेव च ।
दशादौ सुखमाप्नोति दशांते कष्टमादिशेत् ॥१२७॥
स्त्री, पुत्र, धन का लाभ, राजा से सम्मान की प्राप्ति होती है। दशा के आदि
में सुख का लाभ और दशा के अंत में कष्ट होता है॥१२७॥
नीचादिदुःस्थगे भौमे शुभवलविधर्जिते ।
पापयुक्ते पापदृष्टे सा दशा नेष्टदायिका ॥१२८॥
मंगल नीच में दुष्टस्थान (६, ८, १२) में हो शुभग्रह के सम्पर्क से रहित
हो, पापयुक्त, पाप दृष्ट हो तो भौम की दशा कष्टप्रद होती है॥१२८॥
इति भौमदशाफलम्।
अथ राहुदशाफलम् -
राहोश्च वृषभं केतोर्वृश्चिकं तुङ्गसंज्ञकम् ।
मूलत्रिकोणं कर्कं च युग्मचापं तथैव च ॥१२९॥
राहु का वृष और केतु का वृश्चिक राशि उच्च राशि है। राहु का कर्क और
केतु का मिथुन धन राशि मूल त्रिकोण है॥१२९॥
कन्या च स्वगृहं प्रोक्तं मीनं च स्वगृहंस्मृतम् ।
तद्दाये बहुसौख्यं च धनधान्यादिसम्पदाम् ॥१३०॥
राहु का कन्या और केतु का मीन स्वराशि है। स्वगृहादि में स्थित राहु की
दशा में अनेक सुख, धन, धान्य आदि संपत्ति का लाभ होता है॥१३०॥
मित्रप्रभुवशादिष्टं वाहनं पुत्रसम्भवः ।
नूतनगृहनिर्माणं धर्मचिन्ता महोत्सवः ॥१३१॥
मित्र और स्वामी से इष्ट सिद्धि, वाहन का सुख पुत्र का लाभ, नये नये मकान
का निर्माण, धार्मिक कार्य होता है॥१३१॥
विदेशे राजसन्मानं वस्त्रालंकार भूषणम् ।
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे योगकारकसंयुते ॥१३२॥
विदेश यात्रा और राजा से सम्मान की प्राप्ति वस्त्र आभूषण का लाभ॥१३२॥
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा दुश्चिक्ये शुभराशिगे ।
महाराजप्रसादेन सर्वसम्पत्सुखावहम् ॥१३३॥
४३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
यदि राहु शुभग्रह से देखा जाता हो वा शुभयुक्त हो योग कारक ग्रह से देख
जाता हो केन्द्र त्रिकोण में वा क्रूर भाव में हो तो राजा की कृपा से सभी प्रकार के
सुखों की प्राप्ति।।३३।।
यवनप्रभूसन्मानं गृहे कल्याणसम्भवम् ।
रन्ध्रे वा व्ययगे राहौ तद्दाये कष्टमालभेत् ।।३४।।
म्लेक्ष राजा से सम्मान और गृह में सुख का प्रादुर्भाव होता है। यदि राहु आठवें
वा बारहवें भाव में हो तो उसके दशा में कष्ट की प्राप्ति होती है।।३४।।
पापग्रहेण सम्बन्धे मारकग्रह संयुते ।
नीचराशिगते वापि स्थानभ्रंशं मनोरुजम् ।।३५।।
पापग्रह से सम्बंध करता हो और मारकेश से युक्त हो वा नीचाशि में गया
हो तो स्थान भ्रष्ट और मानसिक कष्ट होता है।।३५।।
विनश्येद्दारपुत्राणां कुत्सितानां च भोजनम् ।
दशादौ देहपीडा च धनधान्य परिच्युतिः ।।३६।।
स्त्री पुत्र के सुख की हानि, खराब भोजन मिलता है। दशा के आरम्भ में
शरीर में पीड़ा, धन, धान्य की हानि।।३६।।
दशामध्ये च सौख्यं स्यात्स्वदेशे धनलाभकृत् ।
दशान्ते कष्टमाप्नोति स्थानभ्रंशो मनोव्यथा ।।३७।।
दशा के मध्य में सुख और स्वदेश में धन का लाभ होता है। दशा के अन्त
में कष्ट, स्थानच्युति और मानसिक कष्ट होता है।।३७।।
इति राहुदशाफलम्।
अथ गुरुदशाफलम् –
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे जीवे केन्द्रे लाभत्रिकोणगे ।
मूलत्रिकोणलाभे वा तुङ्गांशे स्वांशगेऽपि वा ।।३८।।
यदि गुरु अपने उच्चराशि में, अपने राशि में केन्द्र, लाभ वा त्रिकोण में,
अपने मूलत्रिकोण राशि में, उच्चांश में वा अपने नवांश में हो।।३८।।
राज्यलाभं महत्सौख्यं राजसन्मानकीर्तनम् ।
गजवाजिसमायुक्तं देवब्राह्मणपूजनम् ।।३९।।
तो उसकी दशा में राज्य का लाभ, सुख, राजा से सम्मान और कीर्ति हाथी
घोड़े का सुख, देवता ब्राह्मण का पूजन।।३९।।
अथ दशाफलाध्यायः । ४३३
दारपुत्रादि सौख्यं च वाहनाम्बरलाभदम् ।
यज्ञादिकर्मसिद्धिः स्याद्वेदान्तश्रवणादिकम् ।।४०।।
यज्ञ आदि कार्यों की सिद्धि, वेदादि का श्रवण कीर्तन ।।४०।।
महाराज प्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा ।
आंदोलिकादिलाभश्च कल्याणं च महत्सुखम् ।।४१।।
राजा की प्रसन्नता से इष्ट सिद्धि और सुख का लाभ, सवारी का लाभ कल्याण
और सुख ।।४१।।
पुत्रदारादिलाभश्च अन्नदानं महत्प्रियम् ।
नीचास्तपापसंयुक्ते जीवे रिष्फाष्टसंयुते ।।४२।।
पुत्र स्त्री का लाभ और अन्नदान आदि कर्म होते हैं। यदि गुरु नीच राशि में,
अस्तंगत, पापयुक्त और ६, ८, १२ भाव में हो तो ।।४२।।
स्थानभ्रंश मनस्तापं पुत्रपीडा महद्भयम् ।
पश्चादिधनहानिश्च तीर्थयात्रादिकं लभेत् ।।४३।।
स्थान भ्रष्ट, मन में संताप, पुत्र को पीडा, भय, पशु आदि की हानि तीर्थयात्रा
आदि होती है ।।४३।।
आदौ कष्टफलं चैव चतुष्पाज्जीव लाभकृत् ।
मध्यान्ते सुखमाप्नोति राजसन्मान वैभवम् ।।४४।।
दशा के आदि में कष्ट चतुष्पद आदि का लाभ, और मध्य तथा अंत्य में
सुख राजा से सन्मान की प्राप्ति होती है ।।४४।।
इति गुरुदशाफलम् ।
अथ शनिदशाफलम् -
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे मन्दे मित्रक्षेत्रेऽथवा यदि ।
मूलत्रिकोणे भाग्ये वा तुङ्गांशेस्वांशगेऽपिवा ।।४५।।
यदि शनि अपनी उच्च राशि, अपनी राशि, मित्र की राशि, अपनी मूलत्रिकोण
राशि, भाग्यभाव, अपने उच्चांश में, अपने नवांश में ।।४५।।
दुश्चिक्ये लाभगे चैव राजसन्मानवैभवम् ।
सत्कीर्तिर्धनलाभश्च विद्यावादविनोदकृत् ।।४६।।
तीसरे वा लाभ भाव में हो तो राजा से सम्मान और वैभव का लाभ, कीर्ति,
धन का लाभ, विद्या का विनोद ।।४६।।
४३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
महाराजप्रसादेन गजवाहनभूषणम् ।
राजयोगं प्रकुर्वीत सेनाधीशान्महत्सुखम् ॥४७॥
राजा की प्रसन्नता से हाथी आदि वाहन का सुख, आभूषण का लाभ, राजयोग,
सेनाधीश होने से सुख ॥४७॥
लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि राज्यलाभं करोति च ।
गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिलाभकृत् ॥४८॥
लक्ष्मी की प्रसन्नता से राज का लाभ, गृह में कल्याण, सम्पत्ति का लाभ,
स्त्री पुत्रादि का सुख होता है॥४८॥
षष्ठाष्टमव्यये मंदे नीचेवास्तङ्गतेऽपि वा ।
विषशस्त्रादिपीडा च स्थानभ्रंशं महद्भयम् ॥४९॥
यदि शनि ६, ८, १२ भाव में हो नीच राशि में वा अस्तंगत हो तो विष,
शस्त्र आदि से पीड़ा होती है, स्थानच्युति और भय होता है॥४९॥
पितृमातृवियोगं च दारपुत्रादिपीडनम् ।
राजवैषम्य कार्याणि ह्यनिष्टं बंधनं तथा ॥५०॥
पिता माता से वियोग, स्त्री पुत्र आदि को पीडा, राज के विलोम कार्य अनिष्ट
और बंधन होता है॥५०॥
शुभयुक्तेक्षिते मंदे योगकारक संयुते ।
केन्द्रत्रिकोणलाभे वा मीनगे कार्मुके शनौ ॥५१॥
शनि शुभग्रह से युत हो केन्द्र त्रिकोण वा लाभ भाव में हो मीन वा धन राशि
में हो तो॥५१॥
राज्यलाभं महोत्साहं गजाश्वाम्बरसंकुलम् ॥५२॥
राज्य लाभ, उत्साह हाथी तथा प्रभूत वस्त्रादि का लाभ होता है॥५२॥
इति शनिदशाफलम्।
अथ बुधदशाफलम् -
स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुक्ते केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
मित्रक्षेत्रसमायुक्ते सौम्यदाये महत्सुखम् ॥५३॥
बुद्ध अपनी उच्चराशि अपनी राशि में हो, केतु त्रिकोण में, मित्र की राशि
में हो तो इसकी दशा में अत्यन्त सुख॥५३॥
अथ दशाफलाध्यायः । ४३५
धनधान्यादिलाभश्च सत्कीर्त्तिधनसम्पदाम् ।
ज्ञानाधिक्यं नृपप्रीति सत्कर्मगुणवर्धनम् ।।५४।।
धन, धान्य आदि का लाभ, कीर्ति, धन सम्पत्ति की वृद्धि, ज्ञान की वृद्धि,
राजा से प्रीति, अच्छे कर्म और गुण में वृद्धि।।५४।।
पुत्रदारादिसौख्यंच देहारोग्यं महत्सुखम् ।
क्षीरेण भोजनं सौख्यं व्यापारेण धनागमम् ।।५५।।
पुत्र-स्त्री का सुख, शरीर की आरोग्यता, सुख, दूध का भोजन, सुख व्यापार
से लाभ होता है।।५५।।
शुभदृष्टियुते सौम्ये भाग्ये कर्माधिपे यदा ।
आधिपत्ये बलवती सम्पूर्ण फलदायिका ।।५६।।
बुध शुभग्रह से दृष्ट युत हो, भाग्य स्थान में हो, कर्मेश हो तो प्रोक्ति सभी
फल सम्पूर्ण होते हैं।।५६।।
पापग्रहयुतेदृष्टे राजद्वेषं मनोरुजम् ।
वन्धुजन विरोधं च विदेशगमनं तथा ।।५७।।
बुध पापग्रह से युत दृष्ट हो तो राजा से द्वेष, मानसिक कष्ट, बन्धुओं से विरोध,
विदेशयात्रा।।५७।।
परप्रेष्यं च कलहं मूत्रकृच्छ्रान्महद्भयम् ।
षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये लाभभोगविनाशनम् ।।५८।।
दूसरे की दासता, कलह मूत्रकृच्छ्र (सुजाक) का भय होता है। ३, ८, १२
भाव में बुध हो तो लाभ आदि की हानि होती है।।५८।।
वातपीडां धनं चैव पाण्डुरोगं तथैव च ।
नृपचौराग्निभीतिंच कृषिगोभूमिनाशनम् ।।५९।।
वात पीडा, पाण्डुरोग, राजा, चोर से भय, कृषि, गौ तथा भूमि की हानि
होती है।।५९।।
दशादौ धनधान्यं च विद्यालाभं महत्सुखम् ।
पुत्रकल्याणसम्पत्तिः सन्मार्गे धनलाभकृत् ।
मध्ये नरेन्द्रसन्मानमंते दुःखं भविष्यति ।।६०।।
दशा के आदि में धन, धान्य, विद्या का लाभ और सुख होता है। पुत्र प्राप्ति
होती है सन्मार्ग में धन का व्यय होता है। मध्य में राजा से सन्मान का लाभ और
अंत में दुःख होता है।।६०।।
इति बुधदशाफलम्।
: ४३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ केतुदशाफलम् -
केन्द्रलाभत्रिकोणे वा शुभराशौ शुभेक्षिते ।
स्वोच्चे वा शुभवर्गे वा राजप्रीतिंमनोत्साहम् ।।६१।।
केतु केन्द्र, लाभ, त्रिकोण में हो.वा शुभ ग्रह की राशि में शुभ दृष्ट से अथवा
अपने उच्च राशि में वा शुभ ग्रह के वर्ग में हो तो उसकी दशा में राजा से प्रेम,
मन में उत्साह ।।६१।।
देशग्रामाधिपत्यं च वाहनं पुत्रसम्भवम् ।
देशान्तरेप्रयाणं च अन्यदेशे सुखावहम् ।।६२।।
देश ग्राम का आधिपत्य, वाहन, और पुत्र का लाभ, देशान्तर की यात्रा और
वहाँ सुख का लाभ ।।६२।।
पुत्रदारसुखंचैव चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।
दुश्चिक्ये षष्ठलाभे वा केतोर्दये सुखंभवेत् ।।६३।।
पुत्र-स्त्री का सुख, चतुष्पद का सुख होता है। ३, ६, ११ भाव में केतु
हो तो इसकी दशा में सुख होता है।।६३।।
राज्यं करोति मित्रांशे गजवाजिसमन्वितम् ।
दशादौ राजयोगाश्च दशामध्ये महद्भयम् ।।६४।।
मित्र के अंश में हो तो राज्य का लाभ और हाथी घोड़े से युक्त होता है।
दशा के आरम्भ में राजयोग का सुख, मध्य में बड़ा भय ।।६४।।
अंते दूराटनं चैव देहविश्रवणं तथा ।
धने रंध्रेव्यये केतौ पापद्दष्टियुतेक्षिते ।।६५।।
और अंत में दूरयात्रा देह पीडा यदि केतु २, ८, १२ भाव हो तो और पापग्रह
से दृष्टयुत हो तो ।।६५।।
निगडं बन्धुनाशं च स्थानभ्रंशं मनोरुजम् ।
शूद्रक्षुद्रादिलाभं च नानारोगाकुलं भवेत् ।।६६।।
बन्धन, बन्धुओं की हानि, स्थानच्युति और मानसिक कष्ट होता है। शुद्र
द्वारा क्षुद्र लाभ और अनेक रोग से मनुष्य व्यग्र होता है।।६६।।
इति केतुदशाफलम्।
अथ शुक्रदशाफलम्।
परमोच्चगते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे ।
नृपाभिषेक सम्प्राप्तिर्वाहनाम्बरभूषणम् ।।६७।।