बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सातवें स्थान में सूर्य हो, दशम स्थान में भौम और बारहवें स्थान में
राहु हों तो पिता कष्ट से जीता है।।३६।।
दशमस्थो यदा भौमः शत्रुक्षेत्रसमन्वितः ।
म्रियते तस्य जातस्य पिता शीघ्रं न संशयः ।।३७।।
यदि दशम स्थान में शत्रु की राशि में भौम हो तो पिता की शीघ्र ही
मृत्यु होती है।।३७।।
रिपुस्थाने यदा चन्द्रो लग्नस्थाने शनैश्चरः ।
कुजश्च सप्तमस्थाने पिता तस्य न जीवति ।।३८।।
यदि छठें स्थान में चन्द्रमा, लग्न में शनि और सातवें में भौम हो तो
पिता नहीं जीता है।।३८।।
भौमांशकस्थिते भानौ स्वपुत्रेण निरीक्षिते ।।३९।।
प्राग्जन्मनो निवृत्तिः स्यान्मृत्युर्वापि शिशोः पितुः ।।३९।।
भौम के नवांश में सूर्य हो और शनि से देखा जाता हो तो पिता नहीं
जीता है।।३९।।
पाताले चाम्बरे पापा द्वादशे च यदा स्थितौ ।
पितरं मातरं हत्वा देशाद्देशान्तरं व्रजेत् ।।४०।।
चतुर्थ, दशम और बारहवें स्थान में पापग्रह हों तो माता-पिता दोनों
की मृत्यु होती है।।४०।।
राहुजीवौ रिपुक्षेत्रे लग्ने वाथ चतुर्थके।
त्रयोविंशतिमे वर्षे पुत्रस्तातं न पश्यति ।।४१।।
राहु, गुरु छठे, लग्न या चौथे भाव में हों तो २३वें वर्ष में पुत्र पिता
को नहीं देखता है।।४१।।*
भानुः पिता च जन्तूनां चन्द्रो माता तथैव च ।
पापदृष्टियुतो भानुः पापमध्यगतोऽपि वा ।
पित्रारिष्टं विजानीयाच्छिशोर्जातस्य निश्चितम् ।।४२।।
यदि सूर्य पापग्रह से दृष्ट-युत होकर पापग्रह के मध्य में हो तो बालक
के पिता का नाश होता है।।४२।।
भानोः षष्ठाष्टमर्क्षस्थैः पापैः सौम्यविवर्जितैः ।
चतुरस्रगतैर्वापि पित्रारिष्टं विनिर्दिशेत् ।।४३।।
*जीव के पिताकारक सूर्य और मातृकारक चन्द्रमा होता है।