बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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अभिशापे तथा व्याधौ स्वैकल्पे मूर्त्तिवेश्मसु ।
विद्याबुद्धिसुखेभावे शांत्यादिषु फलप्रदः ॥१९४॥
अभिशाप, व्याधि, रचैकल्प, मूर्त्ति, गृह, विद्या, बुद्धि, सुख, चतुर्थ भाव
और शांति में फल देता है॥१९४॥
कामान्यस्त्रीविवाहेषु गीतनृत्य प्रीयादिषु ।
सुखे वेश्मनि दुश्चिक्ये स्वे कुटुम्बेच वेश्मनि ॥१९५॥
शुक्र से अन्य स्त्री समागम, विवाह, नृत्यगाना, सुख, गृह तृतीयभाव, धन,.
द्वितीय भाव, चतुर्थभाव॥१९५॥
आज्ञा क्रियातपो भाग्ये लाभायव्ययहानिषु ।
वदान्यत्वे दयायां च भार्गवः फलदः सदा ॥१९६॥
आज्ञा, तप, भाग्य लाभ और हानि का विचार करना चाहिये॥१९६॥
शनिर्भतौ ध्यये रिःफे दुश्चिक्येक्षत चेतसि ।
सहजे च सहे भावे बंधने फलदो भवेत् ॥१९७॥
शनि से मृत्यु, व्यय तीसरे भाव, क्षत, चित्त, सहज बंधु वंधन का विचार
करना चाहिये॥१९७॥
कालहोरादृकाणेशाः क्षेत्रार्कनवभागपाः ।
सप्तांशत्रिंशदंशेशा होरेशश्चाष्टमो भवेत् ॥१९८॥
कालहोरेश, द्रेष्काणेश, गृहेश, द्वादशांशेश, नवांशेश, सप्तमांशेश
त्रिंशांशेश और होरेश ये क्रम से यथोत्तर बली होते हैं॥१९८॥
क्रमादावृत्तितः प्रोक्ता बलिष्ठः पूर्वतो यथा ।
सूर्यादयो ग्रहा लग्नपतिश्चावृत्तितः क्रमात् ॥१९९॥
सूर्यादि सात ग्रह और आठवां लग्न इनमें जो वली हो वही प्रथम फल देने
वाला होता है॥१९९॥
इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे लोकयात्रायां नवमोऽध्यायः॥९॥
दशमोऽध्यायः ।
अथ आयुषः प्रकारांतराणि।
वक्ष्येऽहं दायोत्थं नृणामायुः परं मुने ।
पैड्यो द्वादशधा प्रोक्तो ध्रुवरश्मि समुद्भवौ ॥१॥