बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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अथ नवमोऽध्यायः ।
अथ भावानां संज्ञा।
आत्मा शरीरं होरा च कल्पं लग्नं च मूर्तयः ।
स्वं कुटुम्बं च दुश्चिक्यं विक्रमं सहजं सह ॥१॥
लग्न के आत्मा, शरीर, होरा, कल्प, लग्न, मूर्ति नाम हैं। दूसरे भाव के
स्वं और कुटुम्ब ये दो नाम हैं। तीसरे भाव का दुश्चिक्य, विक्रम, सहज, सह ये
नाम हैं॥१॥
पातालं हिवुकं वेश्म मित्रवंधूदकं सुखम् ।
त्रिकोणं प्रतिभाबुद्धिमातृविद्यासुतास्ततः ॥२॥
चतुर्थभाव के पाताल, हिवुक, वेश्म, मित्र, वंधु, उदक, सुख नाम हैं, पंचम
भाव के त्रिकोण, प्रतिभा, बुद्धि, मातृ; विद्या, सुत नाम हैं।।२।।
व्याधिक्षतारिभंगाश्च क्रोधो लोभोऽथ मत्सर ।
कामो विवाहो यात्रा स्त्री रतिद्यूतं मदोऽज्ञता ॥३॥
छठे भाव के व्याधि, क्षत्र, अरि, भंग, क्रोध, लोभ, मत्सर नाम हैं। सप्तम
भाव के काम, विवाह, स्त्री, रति, द्यूत, मद, अज्ञता नाम हैं।।३।।
पराभवो मृतिर्वधो रंध्रायुर्निधनं च्युतिः ।
शुभं धर्मस्ततो भाग्यं त्रिकोणं च गुरुर्विभुः ॥४॥
अष्टम भाव के पराभव, मृति, वंध, रंध्र, आयु, निधन, च्युति नाम हैं।
नवमभाव के शुभ, धर्म, भाग्य, त्रिकोण, गुरु, विभु नाम हैं।।४।।
व्यापारस्पदमैषूरणमानाज्ञा कर्मखम् ।
भावाय लाभाप तपो रिःफं हानिव्ययःस्मृतः ॥५॥
दशमभाव के व्यापार, आस्पद मेषूरण, मान, आज्ञा, कर्म, रव, नाम हैं।
एकादश भाव के आय, लाभ, अप, तप नाम हैं। व्ययभाव के रिःफ, हानि और
व्यय नाम है।।५।।
यात्रायां दशमेनैव निवृत्तिं सप्तमेन तु ।
वृद्धिश्चतुर्थलग्नेन त्रितयं संप्रकीर्तितम् ॥६॥
दशम भाव से यात्रा का विचार करना चाहिये और सातवें भाव से यात्रा में,
निवृत्ति का विचार करना चाहिये। चतुर्थ से वृद्धि का विचार, इन तीनों को मिलाकर
कुल ७० विषय हुये।।६।।