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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 800 में से

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पृष्ठ 539

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५४१
वा दशेश से ६।८।१२ राशि में हो तो तत्काल धन का नाश और बड़ा
भय करता है॥२४॥
देहायासो मनस्तापो राजद्वारे विरोधकृत् ।
विदेशगमनं चैव तीर्थयात्रादिकं फलम् ॥२५॥
देह में परिश्रम, मन में संताप, राजद्वार से विरोध, विदेश यात्रा-तीर्थयात्रा,
स्त्री-पुत्र आदि की पीड़ा, और आत्मीय बंधु से विरोध होता है॥२५॥
दारपुत्रादिपीडा च अत्मबंधुविरोधकृत् ।
दायेशात्केन्द्रलाभस्थे त्रिकोणे धनगेऽपिवा ॥२६॥
दशेश से केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण, दूसरे भाव में हो तो॥२६॥
राजप्रीतिकरं चैव देशग्रामाधिपत्यता ।
धैर्यं यशः सुखं कीर्तिर्वाहनाम्बरभूषणम् ॥२७॥
राजा से प्रीति देश-ग्राम की अधिपत्यता, धैर्य, यश, सुख-कीर्ति वाहन,
वस्त्र आभूषण॥२७॥
कूपारामतडागादिनिर्माणं धनसंग्रहः ।
भुक्त्यादौ देह सौख्यं स्यादंते क्लेशकरंभवेत् ॥२८॥
कूंआं, बगीचा, तालाब आदि का निर्माण, धन का संग्रह होता है। अन्तर
के आदि में शरीर सुख और अंत में कष्ट होता है॥२८॥
अथशुक्रदशायांभौमान्तर्दशाफलम्-
शुक्रस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वर्क्षभे भौमे लाभेवा बलसंयुते ॥२९॥
शुक्र की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में वा उच्च वा स्वराशि में वा
स्थान में बलवान्॥२९॥
लग्नाधिपेन संयुक्ते कर्मभाग्येश संयुते ।
तद्भुक्तौ राजयोगादिसंपदं शुभशोभनम् ॥३०॥
लग्नेश वा भाग्येश कर्मेश से युत भौम के अन्तर में राजयोग के सभी सुन्दर
सम्पत्ति॥३०॥
वस्त्राभरणभूम्यादेरिष्ट सिद्धिः सुखावहा ।
षष्ठाष्टमव्यये वापि दायेशाद्वातथैव च ॥३१॥