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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 800 में से

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पृष्ठ 452

४५४ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
चोर आदि तथा फोड़ा आदि का भय स्त्री पुत्रादि को कष्ट होता हैं। इसके
बाद सुख होता है। राहु शुभग्रह से युक्त और शुभग्रह के अंश में हो तो।।४१।।
देहारोग्यं मनस्तुष्टी राजप्रीतिकरं सुखम्।
लग्नादुपचये राहौ योगकारकसंयुते।।४२।।
शरीर में आरोग्यता, मन को संतोष, राजा से मित्रता और सुख होता है।
लग्न से उपचय (३।६।११) स्थान में योगकारक ग्रह से युक्त हो।।४२।।
दायेशाच्छुभराशिस्थे राजसन्मानकीर्त्तिदम्।
भाग्यवृद्धिं यशोलाभं दारपुत्रादिपीडनम्।।४३।।
और दशेश से शुभ स्थान में हो तो राजा से सम्मान और कीर्त्ति में वृद्धि,
भाग्य वृद्धि, यश का लाभ, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा।।४३।।
पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणशोभनम्।
दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रंध्रे वा बलवर्जिते।।४४।।
पुत्रोत्सव आदि उत्सव गृह में होते हैं। दशेश से ६।१२।८ भाव में राहु
हो और निर्बल हो तो।।४४।।
बंधनं स्थाननाशश्च कारागृह निवेशनम्।
चौराहिब्रणभीतिश्च दारपुत्रादिवर्द्धनम्।।४५।।
बंधन स्थान हानि, जेलखाना, चोर, सूर्य, फोड़ा से भय, स्त्री पुत्रादि को
सुख।।४५।।
चतुष्पाज्जीवनाशश्च गृहक्षेत्रादिनाशनम्।
गुल्मक्षयादिरोगश्च अतिसारादिपीडनम् ।।४६।।
चौपाये जानवर की हानि, गृह क्षेत्र की हानि, गुल्म, क्षय और अतिसार रोग
से पीड़ा होती है।।४६।।
द्विसप्तस्थे तथा राहौ तत्स्थानाधिपसंयुते ।
अपमृत्युभयं चैव सर्वभीतिश्च सम्भवेत् ।।४७।।
२।७ भाव में इन स्थानों के स्वामी से युत राहु हो तो अपमृत्यु का भय
तथा अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ता है।।४७।।
दुर्गाजपं च कुर्वीत छागदानं समाचरेत् ।
कृष्णांगां महिषीं दद्याच्छान्तिमाप्नोत्यसंशयम् ।।४८।।