बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
राज्यप्राप्तिं महत्सौख्यं स्थानप्राप्तिं च शास्वतीम् ।
विवाहं यज्ञदीक्षां च सुधान्याम्बरभूषणम् ।।२९।।
राज्य का लाभ, अपार सुख, स्थान की प्राप्ति, विवाह, यश, दीक्षा, सुन्दर
अन्न, वस्त्र, आभूषण।।२९।।
वाहनं पुत्रपौत्रादि लभते सुखवर्द्धनम् ।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ।।३०।।
वाहन और पुत्र पौत्रादि जन्य सुख को देता है। दशेश से ६।८।१२ भाव
में चन्द्रमा हो और निर्बल हो तो।।३०।।
अकाले भोजनं चैव देशादेशं गमिष्यति ।
द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युर्भविष्यति ।
श्वेतां गां महिषीं दद्याच्छान्तिं कुर्यात्सुखं भवेत् ।।३१।।
उसके अन्तर में असमय भोजन, एक देश से दूसरे देश की यात्रा होती है।
यदि चन्द्रमा २।७ भाव का स्वामी हो तो अकाल मृत्यु होती है। शान्ति के लिये
सफेद गौ और भैंस का दान करने से सुख की प्राप्ति होती है।।३१।।
अथ रविदशायां भौमान्तर्दशाफलम्-
सूर्यस्यान्तर्गते भौमे स्वोच्चे स्वक्षेत्रलाभगे ।
लग्नात्केन्द्रत्रिकोणे वा शुभकार्यशुभादिकम् ।।३२।।
सूर्य की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में गया हुआ लग्न से ११ भाव
वा केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये भौम का अन्तर हो तो शुभ कार्य।।३२।।
भूलाभं कृषिलाभं च धनधान्यादिवृद्धिदम् ।
गृहक्षेत्रादिलाभं च रक्तवस्त्रादिलाभकृत् ।।३३।।
भूमि का लाभ, कृषि से लाभ, धन धान्य की वृद्धि गृह क्षेत्र का लाभ और
रक्तवस्त्र आदि का लाभ होता है।।३३।।
लग्नाधिपेन संयुक्ते सौख्यं राजप्रियं सुखम् ।
भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते लाभश्चैव भविष्यति ।।३४।।
लग्नेश से युक्त हो तो सुख और राजा का प्रिय पात्र बनाता है। भाग्येश लाभेश
से युक्त हो तो लाभ होता है।।३४।।