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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 800 में से

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पृष्ठ 414

४१६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
द्विस्वभाव राशि यदि विषम है तो क्रम से और स्त्री राशि (सम) में उत्क्रम
से गणना करना चाहिए। इनमें पार्श्व चौथी और दशम राशि होती है।।७८।।
स्त्रीराशिर्द्विस्वभावेऽपि व्युत्क्रमेण द्विजोत्तम।
चतुर्थदशमौ ग्राह्यौ पार्श्वभं तु न संशयः।।७९।।
विषम राशि में क्रम से चौथी और दशम राशि तथा सम में उत्क्रम से
क्रम से चौथी और दशम राशि लेनी चाहिए।।७९।।
ओजसंज्ञा द्विस्वभावे क्रमेण तुर्यव्योमके।
समे व्युत्क्रमतो ज्ञेया सा ग्राह्या व्योमतुर्यकौ।
राशीनां तु समा ज्ञेया स्थिरवत्तु द्विजोत्तम।।८०।।
राशियों का दशावर्ष स्थिर दशा के समान ही लेना चाहिए।।८०।।
उदाहरण— जन्मकुंडली में लग्न से नवम कन्या राशि है, द्विस्वभाव
विषम है, अतः क्रम से इसकी दृष्ट राशि धन, मीन और मिथुन की
दशा होगी। पुनः दशम तुला राशि की और इसकी दृष्ट राशियों की उत्क्रम
से सिंह, वृष, कुम्भ की दशा, इसके बाद एकादश वृश्चिक की और
क्रमगणना से इससे दृष्ट राशि मकर, मेष, कर्क की दशा होगी। शेष चक्र
से स्पष्ट है।
दृग्दशाचक्रम्—

क.ध.मी.मि.तु.सिं.वृ.कुं.वृ.म.मे.कं.
९९९९७८८८८७७७
२०१३२२३१४०४९५६६४७२८०८८९५२००२२००९
३३३
१८१८१८
इति दृग्दशा।
अथ त्रिकोणदशा—
दशात्रिकोणनाम्नाया यथान्यायप्रकल्पना।
चरपर्यायरीत्यादि श्लोकोक्तेन प्रदर्शितः।।८१।।
त्रिकोण दशा की यथान्याय कल्पना की गई है। वह चरपर्याय दशा
की रीति से है।।८१।।
लग्नत्रिकोणयोर्मध्ये यो राशिर्बलवान्द्विज।
तदारभ्योन्नयेद्धीमान् चरपर्या भवेद्दशा।।८२।।