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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 800 में से

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पृष्ठ 409

अथ दशाध्यायः ४११
विशेष- उपर्युक्त श्लोकों में दो प्रकार की दशा का संकेत है। एक
कारक से केन्द्रादि में स्थित ग्रहों की और दूसरा आत्मादि सात कारकों
की दशा का है। किन्तु दशा के वर्ष की गणना ग्रह की राशि पर्यन्त ही क्रम-
उत्क्रम से लेना चाहिए। जिस ग्रह की दो राशियां हैं उनमें जिस राशि
से अधिक दशा वर्ष आवे उसी को लेना चाहिए। सात कारकों के दशावर्ष
लग्न से उन-२ कारकों के दशावर्ष लग्न से उन-उन कारकों तक
गिनने से जो संख्या हो उतने ही वर्ष दशा का लेना चाहिए।
अथ कारककेन्द्रदशाचक्रम्-

मं.के.बृ.शु.श.रा.चं.शु.सू.
९.६७१३३९११११
२०१५२४३०३७४०४३५२५३६४ <br> २०६५
३ <br> १८३ <br> १८

अथ मण्डूकदशा-
मण्डूक इति विख्याता त्रिकूटाख्या दशा द्विज।
लग्नसप्तमयोर्मध्ये बलवद्राशितो भवेत् ॥५५॥
त्रिकूट दशा को ही मंडूक दशा कहते हैं। लग्न सप्तम में
जो बलवान् राशि हो॥५५॥
क्रमव्युत्क्रमभेदेन दशाश्चिन्त्या द्विजोत्तम ।
चरस्थिरद्विस्वभावे सप्ताष्टनवसंख्यया ॥५६॥
वहाँ (ओज-सम के अनुसार) क्रम-उत्क्रम भेद से चर आदि राशियों
की दशा होती है। चर राशियों की ७ वर्ष, स्थिर राशियों की ८ वर्ष
और द्विस्वभाव राशियों की ९ वर्ष की दशा होती है॥५६॥
क्रमेण प्रोक्तरीत्या च प्रवृत्तः स्यात् त्रिकूटका ।
मण्डूकेति समाख्याता पुरा शम्भुप्रणोदितम् ॥५७॥
इस प्रकार चर-स्थिर-द्विस्वभाव राशियों की त्रिकूट दशा के मध्य में
२ राशियों का अन्तर होने से इसे मंडूक गति के समान होने से मंडूक
दशा कहते हैं॥५७॥