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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 800 में से

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पृष्ठ 297

अथ मारकप्रकरणम्। २९९
शुभयोगदृष्टचभावे पापयोगे द्विजोत्तम।
शुभवर्गो पापवर्गो तवाग्रे कथयाम्यहम्।।५२।।
अब मैं शुभ वर्ग और पाप वर्ग को कह रहा हूँ।।५२।।
अर्कारमन्दफणिनः क्रमात् क्रूरायथाक्रमम्।
चन्द्रोऽपि क्रूर एवात्र क्वचिदङ्गारकाश्रयात् ।।५३।।
सूर्य, भौम, शनि और राहु ये यथाक्रम से क्रूर होते हैं। चन्द्रमा भी कभी
भौम के संसर्ग से क्रूर होता है।।५३।।
गुरुःकविशिखिज्ञाश्च यथापूर्वं शुभग्रहाः।
क्रूरखेटा महाप्राज्ञ चार्काद्या उत्तरोत्तरम्।।५४।।
गुरु, शुक्र, केतु और बुध ये यथाक्रम से शुभग्रह हैं। सूर्यादि ग्रह क्रूर
होते हैं।।५४।।
क्रूराः क्रूरभगाश्चैव महत्क्रूरा भवन्ति च।
शुभक्षेत्रगतैः क्रूरैः क्रूरता ह्युपशाम्यति।।५५।।
क्रूर ग्रह क्रूरग्रह की राशि में हों तो बड़े क्रूर होते हैं। शुभग्रह की राशि
में क्रूरग्रह हों तो उनकी क्रूरता शान्त हो जाती है।।५५।।
गुर्वादयः शुभग्रहा यथापूर्वं बुधः कविः।
कवितः केतु विज्ञेयः केतुतो वाक्पतिर्द्विज।।५६।।
गुरु आदि शुभग्रह बुध से शुक्र यथापूर्वं बली होते हैं। शुक्र से केतु और
केतु से गुरु क्रम से उत्तरोत्तर बली होते हैं।।५६।।
क्रमेणैव विजानीयाच्छुभखेटोत्तरोत्तरम्।
यथापूर्वं क्रूरग्रहाः क्रूराश्रयसमागते।।५७।।
इसी क्रम से क्रूरग्रह क्रूरराशि में यथाक्रम से बली होते हैं।।५७।।
एवं क्रौर्यं समापन्नं क्रौर्यं तु शोभनाश्रयः।
एवं गुर्वादि सौम्याश्च शुभाः श्रेयातिशोभनाः।।५८।।
एवं गुरु आदि शुभग्रह भी शुभराशि में अत्यंत शुभद होते हैं।।५८।।
क्रूराश्रये सौम्यखेटाः सौम्यता नश्यते क्वचित्।
एवमेवापरांयुक्तिं कथयामि द्विजोत्तम।।५९।।
कभी-कभी क्रूरग्रह की राशि में गये हुए शुभग्रह अपनी शुभता को
नाश कर देते हैं।।५९।।