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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 800 में से

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पृष्ठ 295

अथ मारक प्रकरणम्। २९७
पापदृष्टिमात्रमेवं योगनिर्वाहकारणे।
अपवादविहीनेन इत्येवोक्तं तृतीयेके।।३७।।
केवल पापग्रह मान्य की दृष्टि से योग होने के कारण तीसरा योग होता
है।।३७।।
रुद्राभ्यां प्राणिगौणाभ्यां ताभ्यामाश्रितमेव च।
गुणविशेषे आयुरन्तं वक्ष्यामीह महामते।।३८।।
अब दोनों रुद्रों से और उनके आश्रित गुण-विशेष से आयु का निर्णय
कर रहा हूँ।।३८।।
गौणरुद्रे शुभैर्योगेशुभदृष्टिसमन्विते।
रुद्रशूलान्तमायुश्च योजनीयं द्विजोत्तम।।३९।।
गौणरुद्र शुभ ग्रह से योग करता हो और शुभदृष्टि से युक्त हो तो
रुद्रशूलान्त आयु होती है।।३९।।
पूर्वोक्त प्राणिरुद्रेण द्वियोगप्राणकेन च।
द्वाभ्यां शूलान्तमायुश्च तवाग्रे कथितं मया।।४०।।
पूर्वोक्त बली (प्राणि) रुद्र से जो दो योग कहे हैं उनमें दोनों रुद्रों की
शूलान्त पर्यन्त आयु होती है।।४०।।
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि द्वयोर्निर्वाहकारणम्।
तयो रूपं भिन्नभिन्नं शृणुष्व मुनिसत्तम।।४१।।
अब दोनों के निर्वाह के कारण कह रह हूँ। दोनों के भिन्न-भिन्न रूप
होते हैं।।४१।।
प्राणिरुद्रे शुभैर्दृष्टे योगोऽयं द्विजसत्तम।
शुभयोगेति का वार्ता शूलान्तायुर्विनिश्चितम्।।४२।।
प्राणिरुद्र शुभग्रहों से देखा जाता हो और शुभयोग हो तो रुद्रशूलान्त
आयु होती है।।४२।।
गौणरुद्रे शुभैर्दृष्टे योगोऽयं क्लेशदायकः।
रोगशोकभयं कर्त्ता मृत्युं नैव करोति च।।४३।।
गौणरुद्र शुभग्रहों से दृष्ट हो तो क्लेशदायक, रोग-शोकदायक तथा
भयकारक होता है, न कि मृत्युकारक।।४३।।
शुभयोगे महाप्राज्ञ योगोऽयं बलवत्तरः।
तस्य शूलान्तमायुश्च निर्विशङ्कं न संशयः।।४४।।